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राजस्थान में कांग्रेस के लिए घर दुरुस्त करने का समय

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बीएस संवाददाता
Last Updated- December 12, 2022 | 2:07 AM IST

पंजाब के बाद अब राजस्थान की बारी है। असंतोष को खत्म करने का मन बना लेने के बाद कांग्रेस के राजस्थान प्रभारी एवं पार्टी महासचिव अजय माकन बीते सप्ताह जयपुर पहुंचे थे। वह पार्टी के 115 में से करीब 100 विधायकों से मिले। दरअसल राज्य के पूर्व उप मुख्यमंत्री और पिछले साल कांग्रेस से करीब बगावत कर चुके सचिन पायलट से मिले कड़े संकेतों के बाद पार्टी हरकत में आई है। पायलट ने संकेत दिए हैं कि अगर उनकी चिंताएं नहीं दूर की गईं तो वह फिर से बगावत कर सकते हैं। इस बीच अशोक गहलोत मंत्रिमंडल में फेरबदल अगस्त के पहले पखवाड़े में होने जा रहा है।
पंजाब में हुए सांगठनिक बदलावों के बाद कांग्रेस के लिए राजस्थान चिंता का सबब बना हुआ है। करीब एक साल पहले उप मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे चुके पायलट कई बार पार्टी नेतृत्व से उन्हें एवं उनके समर्थकों को पेश आ रही मुश्किलों पर ध्यान देने की गुहार लगाते रहे हैं। उनके एक समर्थक हेमाराम चौधरी ने इस साल मई में विधानसभा की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया था। वह छह बार के विधायक रहे हैं और गहलोत सरकार में मंत्री बनना चाहते थे। पायलट के समर्थक मंत्रिमंडल में जगह देने की मांग लगातार करते रहे हैं।
इसी तरह चाकसू से कांग्रेस विधायक वेद प्रकाश सोलंकी ने भी अपने कार्यकर्ताओं की शिकायतें नहीं सुने जाने और अपने  क्षेत्र में काम की मांगें नहीं पूरी होने पर इस्तीफा देने की धमकी दी है। सोलंकी कहते हैं, ‘सरकार के कामकाज पर अफसरशाही का दबदबा है। ऐसी स्थिति में हमारे लिए अपने क्षेत्र में काम करा पाना या अपने कार्यकर्ताओं की शिकायतें दूर कर पाना खासा मुश्किल हो रहा है।’
पिछले साल जुलाई में नाटकीय ढंग से बगावत करने और फिर वापस लौट आने वाले पायलट की पीड़ा इस दौरान बढ़ी ही है। उन्हें लगता है कि न केवल उनकी कड़ी मेहनत का इनाम उन्हें नहीं दिया गया है बल्कि उनके समर्थकों को भी निशाना बनाया जा रहा है। बगावत के दौरान पदों से हटाए गए किसी भी समर्थक को पद पर बहाल नहीं किया गया है। पायलट अपने दोस्तों के बीच यह कहते सुने गए हैं, ‘मुझे उप मुख्यमंत्री पद न दीजिए। लेकिन अशोक गहलोत के गलत तौर-तरीकों के खिलाफ आवाज उठाने वाले नेताओं के साथ तो ऐसा न किया जाए।’
माकन ने अपने जयपुर दौरे में यह ऐलान किया कि कुछ लोग सरकार का पद छोड़कर संगठन के लिए काम करने को तैयार हैं और पार्टी को ऐसे लोगों पर गर्व है। माकन ने कहा, ‘कांग्रेस 2023 में होने वाले विधानसभा चुनाव जीतकर फिर से सरकार बनाएगी। इसमें सब कुछ छोड़कर संगठन के लिए काम करने वाले हमारे सदस्यों की भूमिका अहम होगी।’
अगर मान-मनौवल की इस कोशिश पर आई प्रतिक्रिया फीकी रही है तो शायद ही किसी को अचरज हुआ है। गहलोत एवं पायलट के बीच की खाई काफी गहरी है। गहलोत के आवास पर पार्टी विधायकों के लिए दी गई दावत में पायलट शामिल नहीं हुए। इसके अलावा उन्होंने टोंक जिले के विधायकों की माकन के साथ हुई मुलाकात से भी खुद को दूर रखा जबकि वह खुद भी टोंक से ही विधायक चुने गए हैं।
पायलट का कामकाज देख चुके लोगों का कहना है कि वह अथक मेहनत में यकीन करते हैं। अजमेर लोकसभा सीट के लिए वर्ष 2018 में हुआ उपचुनाव इसका एक उदाहरण है। उन्हें 2014 के लोकसभा चुनाव में अजमेर सीट से हार का सामना करना पड़ा था और वह उपचुनाव में भी अपनी जीत को लेकर आश्वस्त नहीं थे। ऐसी स्थिति में उन्होंने रघु शर्मा को कांग्रेस उम्मीदवार के तौर पर उतारा और उन्हें जिताने के लिए पूरा जोर लगा दिया। उन्होंने प्रदेश अध्यक्ष रहते हुए हर छोटे-बड़े चुनाव में जान लगाई। उनके एक सहयोगी कहते हैं, ‘वह लोगों से मिलते हैं, संपर्क बनाते हैं और हरदम लोगों की बात सुनने की कोशिश करते हैं। कांग्रेस ने पंचायत चुनावों के साथ नगर निकायों के चुनाव में भी जीत हासिल की थी। इन जीतों का श्रेय पायलट को भी दिया जाना चाहिए।’
हालांकि उनके आलोचकों का कहना है कि इस दावे के उलट पायलट का चुनाव जीतने का रिकॉर्ड उतना शानदार नहीं है। वर्ष 2018 के पिछले विधानसभा चुनाव में 12 कांग्रेस उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो गई थी जबकि 17 प्रत्याशी तीसरे स्थान पर रहे थे। दरअसल प्रदेश अध्यक्ष की कुर्सी पर काबिज पायलट अधिकृत प्रत्याशियों के खिलाफ बगावत करने वाले उम्मीदवारों को मैदान से हटने के लिए नहीं मना पाए और 11 बागी प्रत्याशियों ने अधिकृत पार्टी उम्मीदवारों को हरा दिया। आलोचकों का मानना है कि उस चुनाव में कांग्रेस की जीत करीब 40 सीटों पर इस खेल बिगडऩे की ही वजह से फीकी पड़ गई थी।
गहलोत हर किसी को इसकी याद दिलाते रहते हैं। उनके समर्थकों की दलील है कि पायलट नहीं बल्कि गहलोत लोगों के असली आदमी हैं। लेकिन माकन भी यह स्वीकार कर चुके हैं कि राजस्थान में समस्याएं हैं। विधायकों से मुलाकात के बाद माकन ने कहा, ‘हमने मुख्य रूप से इस पर चर्चा की कि 2023 में कांग्रेस की सरकार किस तरह बन सकती है। राज्य कार्यसमिति की बैठक में भी हमने सत्ता में वापसी के लिए सरकार एवं संगठन के बीच बेहतर तालमेल के बारे में ही चर्चा की।’
कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व का मत है कि संगठन को काबू में कर राजस्थान की अधिकांश समस्याएं दूर की जा सकती हैं। पार्टी के मौजूदा प्रदेश अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा को पायलच की बगावत के बाद ही संगठन को मजबूत करने के लिए नियुक्त किया गया था।
लेकिन पंजाब में अमरिंदर सिंह की तरह राजस्थान में भी गहलोत अपना शिकंजा ढीला करने को तैयार नहीं हैं। मंत्रिमंडल में फेरबदल उन्हें काबू में करने का ही एक तरीका होगा। लेकिन एक विश्लेषक आगाह करते हैं, ‘पंजाब के उलट राजस्थान में बागियों के पास भाजपा के रूप में एक विकल्प भी है।’

First Published : August 4, 2021 | 11:34 PM IST