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प्लास्टिक पुनर्चक्रण की राजनीति बदस्तूर जारी

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बीएस संवाददाता
Last Updated- December 15, 2022 | 4:13 AM IST

कोविड-19 महामारी सब कुछ समाहित कर रही है। इससे अतीत में हमारी जिंदगी को प्रभावित कर रहे और भविष्य में भी बने रहने वाले मुद्दों पर सोचना या कदम उठाना मुश्किल हो रहा है। ऐसा ही एक मुद्दा प्लास्टिक का है। प्लास्टिक हमारी जमीन एवं समुद्रों तक पसरा हुआ है, उन्हें दूषित कर रहा है और हमारे स्वास्थ्य पर असर डाल रहा है। मौजूदा स्वास्थ्य आपातकाल ने प्लास्टिक के उपयोग को सामान्य कर दिया है। हम कोरोनावायरस से बचाव के लिए एहतियात के तौर पर अधिक से अधिक प्लास्टिक उत्पादों का इस्तेमाल कर रहे हैं। इस महामारी के खिलाफ जंग में बेहद अहम माने जा रहे दस्तानों और मास्क से लेकर सुरक्षात्मक पोशाक पीपीई तक में प्लास्टिक का इस्तेमाल होता है और अगर इन चिकित्सा कचरे का सही तरह से नियंत्रण एवं प्रबंधन नहीं किया गया तो ये आने वाले समय में हमारे शहरों में कचरे का ढेर बढ़ाएंगे।
प्लास्टिक की राजनीति रिसाइक्लिंग यानी पुनर्चक्रण कहे जाने वाले सौम्य शब्द में निहित है। वैश्विक स्तर पर प्लास्टिक उद्योग की यह दलील रही है कि हम इस बेहद टिकाऊ तत्त्व का उपयोग जारी रख सकते हैं क्योंकि एक बार फेंकते पर यह रिसाइकल हो जाएगी। हालांकि कोई भी नहीं जानता है कि इसका क्या मतलब है? जब चीन ने पुनर्प्रसंस्करण के लिए प्लास्टिक अवशिष्ट के आयात पर रोक लगाने के लिए 2018 में एक नीति की घोषणा की तब जाकर अमीर देशों को कड़वी सच्चाइयों का अहसास हुआ। प्लास्टिक अवशिष्टों से भरे जहाज मलेशिया एवं इंडोनेशिया जैसे कुछ अन्य देशों से भी वापस लौटाए जाने लगे। कोई भी देश यह कचरा नहीं लेना चाहता था। उनके पास घरेलू स्तर पर ही बहुत सारा प्लास्टिक कचरे से निपटने की समस्या थी। वर्ष 2018 में लगी इस पाबंदी के पहले यूरोपीय संघ का 95 फीसदी एवं अमेरिका का 70 फीसदी प्लास्टिक अवशिष्ट रिसाइक्लिंग के लिए चीन को भेज दिया जाता था। चीन पर इस निर्भरता का यह मतलब था कि रिसाइक्लिंग के मानकों को ढीला कर दिया गया था जिससे खाद्य अवशिष्टों को प्लास्टिक के साथ मिला दिया जाता था और उस कचरे के पुनर्चक्रण से नए तरह के उत्पाद बनकर आ जाते थे। इसका यह नतीजा था कि अवशिष्टों में अधिक मिलावट होने से पुनर्चक्रण काफी मुश्किल हो जाता था। यह मिलावट इतनी अधिक होती थी कि किसी भी हालात से कारोबार पैदा करने वाले चीन के लिए भी पुनर्प्रसंस्करण मुनाफे का सौदा नहीं रह गया।
भारत की प्लास्टिक कचरा समस्या अमीर देशों जितनी बड़ी नहीं है लेकिन यहां पर भी यह बढ़ती जा रही है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की तरफ से प्लास्टिक कचरे पर जारी नवीनतम रिपोर्ट सारी कहानी बयां कर देती है। जहां गोवा जैसे समृद्ध राज्य में प्रतिदिन प्रति व्यक्ति 60 ग्राम प्लास्टिक अवशिष्ट पैदा होता है वहीं दिल्ली में यह 37 ग्राम प्रति व्यक्ति है। राष्ट्रीय औसत तो प्रति व्यक्ति 8 ग्राम प्रतिदिन का है।
हालांकि अपने शहरों में हम अभी ही प्लास्टिक का बेशुमार कचरा देख सकते हैं लिहाजा इस बात को लेकर आशावादी नहीं हो सकते हैं कि हम इस कचरे को इक_ा कर उसके पुनर्चक्रण को अधिक तेजी से अंजाम देने लगेंगे। जब तक हम अलग ढंग से नहीं सोचते हैं और निर्णायक ढंग से कदम उठाते हैं तब तक हम यह काम नहीं कर पाएंगे। लेकिन आज तो यह चीज पूरी तरह नदारद है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले साल स्वतंत्रता दिवस पर प्लास्टिक के इस्तेमाल की आदत छोडऩे का आह्वान करते हुए कहा था कि उनकी सरकार प्लास्टिक उपयोग में कटौती के लिए कुछ महत्त्वपूर्ण योजनाएं लेकर आएगी। लेकिन उनकी सरकार तो काफी हद तक इसका ठीक उलट काम कर रही है।
एक बार फिर राजनीति रिसाइक्लिंग को लेकर है। प्लास्टिक उद्योग एक बार फिर नीति-निर्माताओं को यह समझाने में सफल रहा है कि लगभग हरेक चीज का रिसाइकल कर सकने की क्षमता होने से प्लास्टिक अवशिष्ट कोई समस्या ही नहीं है। यह मामला तंबाकू जैसा है जिसमें धूम्रपान छोडऩे से तंबाकू उगाने वाले किसान प्रभावित होंगे। अगर हम प्लास्टिक का उपयोग रोक देते हैं तो रिसाइक्लिंग उद्योग धराशायी हो जाएगा जिसमें काफी हद तक छोटी इकाइयां ही सक्रिय हैं और वहां गरीब लोग बेहद प्रतिकूल हालात में काम करते हैं। इससे उनकी नौकरियां भी चली जाएंगी।
पहले इस बात पर चर्चा करते हैं कि रिसाइकल नहीं किए जा सकने वाले प्लास्टिक कचरे का क्या होता है? तमाम अध्ययन दिखाते हैं कि नालों में जमा या कूड़े के ढेर में मौजूद प्लास्टिक कचरे में अधिक हिस्सा उन चीजों का है जिनका पुनर्चक्रण नहीं किया जा सकता है। इनमें खाने-पीने के सामान की बहु-स्तरीय पैकेजिंग, गुटखा या शैंपू के सैशे और प्लास्टिक बैग शामिल हैं। वर्ष 2016 के प्लास्टिक प्रबंधन नियमों में इसे स्वीकार करते हुए कहा गया कि सैशे पर पाबंदी लगेगी और सभी तरह के बहु-स्तरीय प्लास्टिक उपयोग को दो साल में चरणबद्ध तरीके से बंद कर दिया जाएगा। लेकिन वर्ष 2018 में इन नियमों में नुकसानदेह बदलाव कर दिए गए और अब केवल गैर-पुनर्चक्रीय प्लास्टिक उत्पादों को ही धीरे-धीरे बंद किया जाएगा। सैद्धांतिक तौर पर बहुस्तरीय प्लास्टिक या सैशे को पूरी तरह रिसाइकल नहीं किया जा सकता है, उन्हें सीमेंट कारखानों या सड़कों के निर्माण में इस्तेमाल किया जा सकता है। लेकिन हर कोई जानता है कि प्लास्टिक के इन खाली एवं मिट्टी लगे थैलों को छांटना, इकट्ठा करना और दूसरी जगह भेजना लगभग नामुमकिन है। लिहाजा कारोबार पहले की ही तरह चलता रहता है। हमारी कचरा समस्या दूर नहीं होने वाली है।
दूसरा मुद्दा यह है कि पुनर्चक्रण से हमारा मतलब क्या है? यह सही है कि पुनर्चक्रण के लिए घरों में ही प्लास्टिक को सावधानी से अलग करने की जरूरत है। इससे जिम्मेदारी हम पर और स्थानीय निकायों पर आ जाती है। समय आ गया है कि हम पुनर्चक्रण की दुनिया को अलग कर दें।

First Published : July 27, 2020 | 11:34 PM IST