facebookmetapixel
Advertisement
रूसी तेल खरीद पर भारत पर 100% अमेरिकी शुल्क का प्रस्ताव, संशोधित प्रतिबंध विधेयक से बढ़ सकती है चुनौतीकैबिनेट ने सेमीकंडक्टर मिशन 2.0 को दी मंजूरी, ₹1.27 लाख करोड़ की योजना से चिप और मोबाइल मैन्युफैक्चरिंग को मिलेगा बूस्ट ₹250 वाली छोटी SIP का बढ़ा दायरा, लेकिन निवेश बंद होने की दर अब भी चिंता का विषयEditorial: सेवा उत्पादन सूचकांक से मिलेगी अर्थव्यवस्था की सटीक तस्वीरमानव पूंजी की खाई पाटे बिना अधूरा रहेगा भारत का विकासAI से एंट्री-लेवल नौकरियों पर खतरा, स्किलिंग बनी राष्ट्रीय प्राथमिकताInstamart-HPCL की साझेदारी, अब ऑन-डिमांड मिलेगी 10 किलो HP Navya LPG सिलिंडर की डिलिवरीAI से खुलेंगे आईटी कंपनियों के लिए नए अवसर, ग्राहकों को बदलाव में मदद करने की बेहतर स्थिति में हैं: प्रेमजीCCI के समझौता ढांचे को दिल्ली हाईकोर्ट में चुनौती, उपभोक्ताओं के अधिकारों की अनदेखी का आरोपIPO प्राइस से नीचे फिसला SpaceX का शेयर, निवेशकों की बढ़ी चिंता; वैल्यूएशन पर फिर उठे सवाल

मानव पूंजी की खाई पाटे बिना अधूरा रहेगा भारत का विकास

Advertisement

परंपरागत रूप से शास्त्रीय अर्थशास्त्रियों ने आर्थिक वृद्धि को अधिक श्रमिकों, अधिक भूमि और अधिक मशीनों को जोड़ने की यांत्रिक प्रक्रिया के रूप में देखा

Last Updated- July 15, 2026 | 11:05 PM IST
Human Capital
प्रतीकात्मक तस्वीर

आम तौर पर यह माना जाता है कि आगामी कुछ दशकों तक भारत सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में सालाना 7-8 फीसदी की वृद्धि दर कायम रखेगा और जल्दी ही उच्च-मध्य आय वर्ग वाले देशों की श्रेणी में और यहां तक कि उच्च आय वाले देशों की श्रेणी में पहुंच जाएगा  (विकसित भारत का सपना)। ऊपर से देखने पर तो यह रफ्तार प्रभावशाली लगती है। नए एक्सप्रेसवे ग्रामीण इलाकों को चीरते हुए निकल रहे हैं, छोटे शहरों में चमचमाते हवाई अड्डे खुल रहे हैं और विश्वस्तरीय डिजिटल ढांचा अरबों के लेनदेन को रियल टाइम या तात्कालिक समय में संभाल रहा है।

लेकिन भारत ऊपरी-मध्य-आय वाले देशों की श्रेणी में प्रवेश करने से पहले ही एक तरह की बाधा का जोखिम उठा रहा है। इसकी वजह एकदम साधारण, स्पष्ट और कम संबोधित है। वह वजह है मानव पूंजी के विकास में गहरी और प्रणालीगत विफलता जिसे अब किसी देश की समृद्धि का सबसे महत्त्वपूर्ण कारक माना जा रहा है।

परंपरागत रूप से शास्त्रीय अर्थशास्त्रियों ने आर्थिक वृद्धि को अधिक श्रमिकों, अधिक भूमि और अधिक मशीनों को जोड़ने की यांत्रिक प्रक्रिया के रूप में देखा। लेकिन जब इसे आधुनिक वैश्विक अर्थव्यवस्था पर लागू किया जाता है तो यह काम नहीं करता है। भौतिक निवेश जैसे कोई कारखाना, कठोर घटते रिटर्न के नियम के अधीन होता है। कोई देश अपने ट्रैक्टरों या कंप्यूटरों का भंडार दोगुना कर सकता है लेकिन उसे तकनीकी रूप से सक्षम कामगारों की संख्या भी दोगुनी करनी होगी ताकि वे उन्हें चला सकें।  वर्ष 1992 में अर्थशास्त्री ग्रेगरी मैनकिव, डेविड रोमर और डेविड वील ने मानव पूंजी यानी शिक्षा, स्वास्थ्य और विशिष्ट कौशल के सामूहिक मिश्रण को उत्पादन के स्वतंत्र कारक के रूप में अलग किया।

अब भूगोल, संस्कृति या प्राकृतिक संसाधन नहीं ब​ल्कि मानव पूंजी यह तय करती है कि आखिर क्यों कुछ देश अमीर बन जाते हैं जबकि अन्य ठहरे रहते हैं। पुराने मॉडलों में कोई देश यदि भौतिक मशीनरी में किसी अन्य की तुलना में चार गुना अधिक निवेश करता था तो वह अंततः केवल दोगुना ही समृद्ध होता था। लेकिन मैनकिव-रोमर-वेल मॉडल यह साबित करता है कि जब उच्च भौतिक पूंजी निवेश को उच्च मानव पूंजी निवेश से गुणा किया जाता है तो यह एक चक्रवृद्धि प्रभाव पैदा करता है। यानी प्रति श्रमिक संपदा में 16 गुना उछाल।

इसके अलावा विकास सिद्धांतकार रॉबर्ट लुकास और पॉल रोमर ने दिखाया कि मानव पूंजी के पास एक अनूठा आर्थिक लाभ है। यह घटते रिटर्न के नियम से प्रभावित नहीं होती। 

पूर्वी एशियाई खाका

यह केवल एक शैक्षणिक अवधारणा नहीं है। यह 20वीं सदी के सबसे बड़े आर्थिक चमत्कारों के पीछे की सच्चाई है। 1953 में दक्षिण कोरिया एक युद्धग्रस्त राष्ट्र था, जहां वयस्क साक्षरता दर केवल 20 फीसदी थी। उसके पास न तेल था, न खनिज, और न ही कोई उल्लेखनीय भौतिक संपत्ति। राज्य ने शिक्षा नीति को अपनी मुख्य औद्योगिक नीति माना। उसने 1960 के दशक में हल्के विनिर्माण को बढ़ावा देने के लिए निरक्षरता समाप्त की, 1970 के दशक में भारी उद्योगों को आपूर्ति देने के लिए व्यावसायिक तकनीकी स्कूलों का विस्तार किया और 1980 के दशक में विश्वविद्यालयों को विज्ञान और प्रौद्योगिकी संसाधनों से भर दिया। आज यह एक वैश्विक नवाचार महाशक्ति के रूप में खड़ा है। 

अचानक 1965 में आज़ादी मिलने पर सिंगापुर को भी वैसी ही मुश्किल शुरुआत का सामना करना पड़ा। घरेलू जल आपूर्ति तक न होने के कारण तत्कालीन प्रधानमंत्री ली कुआन यू ने कहा कि द्वीप की एकमात्र संपत्ति उसके लोग हैं। इस नगर-राज्य ने अपने शिक्षा तंत्र को विदेशी बहुराष्ट्रीय कंपनियों की सटीक तकनीकी आवश्यकताओं के साथ तालमेल वाला बनाया। बाद में, कौशल को अप्रचलित होने देने के बजाय इसने सतत राज्य-वित्त पोषित वयस्क पुनः प्रशिक्षण की पहल की।

चीन ने भी मानव पूंजी को ही अपनाया। 1978 में तंग श्याओफिंग द्वारा अर्थव्यवस्था खोले जाने से पहले दशकों के सार्वजनिक निवेश ने पहले ही व्यापक बुनियादी साक्षरता और ग्रामीण स्वास्थ्य देखभाल सुनिश्चित कर दी थी। जब वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाएं पहुंचीं तो उन्हें केवल सस्ता श्रम ही नहीं मिला बल्कि एक अत्यधिक अनुशासित, साक्षर कार्यबल भी मिला जो खाकों को पढ़ने और जटिल असेंबली को निष्पादित करने में सक्षम था। इसके बाद चीन ने मानव इतिहास में सबसे बड़ा उच्च शिक्षा विस्तार किया। आज वह हर साल 1 करोड़ से अधिक छात्रों को स्नातक कर रहा है, जिनमें भारी संख्या इंजीनियरिंग की होती है,ताकि बिजली से चलने वाले वाहनों और हरित प्रौद्योगिकी में विश्व का नेतृत्व कर सके। 

भारत का विरोधाभास

हमारे देश ने उच्च शिक्षा को माध्यमिक की जगह तरजीह दी जिससे एक विश्वस्तरीय शिक्षित अभिजात वर्ग पैदा हुआ। इसके प्रमुख तकनीकी संस्थान और बिजनेस स्कूल सिलिकॉन वैली के मुख्य कार्यकारी अधिकारियों और बेंगलूरु में वैश्विक क्षमता केंद्रों को शक्ति देने वाले इंजीनियरों की आपूर्ति करते हैं। लेकिन 1.4 अरब लोगों की अर्थव्यवस्था कुछ लाख टेक पेशेवरों के सहारे ऊपरी-मध्य-आय का दर्जा हासिल नहीं कर सकती। अरबों डॉलर भौतिक अधोसंरचना में लगाए जा रहे हैं वहीं बुनियादी शिक्षा और सार्वजनिक स्वास्थ्य उपेक्षित पड़े हैं। 

यदि भारत अपने बहुचर्चित जनांकिकीय लाभांश को एक टिक-टिक करते टाइम बम से आर्थिक इंजन में बदलना चाहता है तो उसे दिशा में भारी बदलाव करना होगा। सबसे पहले, सार्वजनिक वित्तपोषण को आक्रामक रूप से शुरुआती सालों में बच्चों के स्वास्थ्य और शिक्षा पर केंद्रित करना होगा। दूसरा, व्यावसायिक प्रशिक्षण को सीधे स्कूल चक्र में एकीकृत करना होगा, जिससे शिक्षा का पैमाना रोजगार-योग्यता पर स्थानांतरित हो। तीसरा, राज्य को उद्योगों और प्रशिक्षण केंद्रों के बीच गहरी संस्थागत साझेदारी बनानी चाहिए, पाठ्यक्रम को गतिशील रूप से अद्यतन करते हुए। ये न्यूनतम कदम हैं। लेकिन ये विचार पहले से ही जाने-पहचाने हैं और विशेषज्ञों द्वारा कई बार व्यक्त किए जा चुके हैं। सवाल यह है कि क्या हम इन्हें परिणाम और जवाबदेही के साथ लागू करने के लिए पर्याप्त गंभीर हैं? 


(लेखक मनीलाइफडॉटइन के सह-संस्थापक और मनीलाइफ फाउंडेशन के न्यासी हैं। ये उनके निजी विचार हैं)

Advertisement
First Published - July 15, 2026 | 11:02 PM IST

संबंधित पोस्ट

Advertisement
Advertisement
Advertisement