दिल्ली उच्च न्यायालय में दायर याचिका में प्रतिस्पर्धा अधिनियम के तहत समझौता ढांचे की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई है। याचिका में तर्क दिया गया है कि यह ढांचा उपभोक्ताओं, मुखबिरों और अन्य प्रभावित पक्षों को भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग (सीसीआई) द्वारा पारित समझौते के आदेशों पर सवाल उठाने से रोकता है।
एक वकील की इस रिट याचिका में समझौता नियमों पर इस आधार पर सवाल उठाए गए हैं कि वे संबंधित प्रतिस्पर्धा-विरोधी आचरण से सीधे प्रभावित होने वाले उपभोक्ताओं, मुखबिरों, प्रतिस्पर्धियों या अन्य हितधारकों से टिप्पणियां या आपत्तियां मांगने के लिए कोई तंत्र प्रदान नहीं करते हैं।
प्रतिस्पर्धा (संशोधन) अधिनियम, 2023 ने अधिनियम की धारा 48ए और 48बी पेश की थी ताकि समझौता और प्रतिबद्धता तंत्र बनाया जा सके। यह समझौता और प्रतिबद्धता तंत्र उन कंपनियों को अनुमति प्रदान करता है जो भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग की प्रतिस्पर्धा-विरोधी जांच का सामना कर रही हैं ताकि वे स्वेच्छा से सुधार के उपाय पेश कर सकें या लंबे समय तक मुकदमेबाजी के बिना मामलों को सुलझाने के लिए कुछ शर्तों पर सहमत हों सकें। इस समझौते में किसी राशि का भुगतान, व्यावहारिक उपाय और निगरानी की शर्तें शामिल हो सकती हैं।
इस ढांचे के तहत प्रतिबद्धताओं की पेशकश आम तौर पर जांच के शुरुआती चरण में की जाती है, जबकि समझौते की पेशकश जांच रिपोर्ट के बाद की जा सकती है, जिससे नियामकीय देरी और मुकदमेबाजी की लागत कम करने में मदद मिलती है।