अगर कृषि क्षेत्र राज्य सूची का एक विषय है तो फिर हमें केंद्रीय स्तर पर इतने बड़े मंत्रालय की जरूरत ही क्यों है? एक विशाल इमारत में इस मंत्रालय का मुख्यालय है और बजट में इसके लिए आवंटन भी तमाम विभागों से अधिक होता है। वर्ष 2020 में कृषि मंत्रालय को बजट में 1.42 लाख करोड़ रुपये आवंटित किए गए थे।
संसद पर कृषि संबंधी मुद्दों से बहुत फर्क नहीं पड़ता है क्योंकि कृषि से जुड़े असली मसले इतने स्थानीय होते हैं कि अधिकांशत: उनका निपटारा वहीं हो जाता है और राज्य विधानसभाओं में ही उन्हें सुलझा लिया जाता है।
यह भी नहीं समझा जाता है कि यह मंत्रालय न तो वित्त या वाणिज्य मंत्रालय की तरह विशुद्ध रूप से अर्थशास्त्र पर केंद्रित मंत्रालय है और न ही गृह मंत्रालय की तरह विशुद्ध रूप से राजनीति पर ही केंद्रित है। असल में यह मंत्रालय सत्ता में बैठी सरकार की किसानों को लेकर अधिक फिक्रमंद होने वाली छवि का निर्माण करने में ही लगा रहता है।
लेकिन असल में ऐसा हुआ नहीं है। सच है कि कृषि उत्पादन कई गुना बढ़ा है। लेकिन यह अभी तक असंतुलित ढंग से ही बढ़ा है। इस दौरान किसान तो गरीब ही बना हुआ है। इसकी वजह यह है कि प्रति एकड़ औसत आय शायद ही 20,000 रुपये से अधिक होती है और करीब 10 करोड़ परिवारों के पास महज 2-3 एकड़ कृषि-योग्य जमीन ही है। लिहाजा एक संशयग्रस्त एवं दुविधा के शिकार मंत्रालय के तौर पर कृषि मंत्रालय को मात दे पाना मुश्किल है। फिर भी यह मंत्रालय 1947 से ही वजूद में बना हुआ है।
एक अहम कारण है कि आपको मंत्रालय द्वारा खर्च किए जाने वाले भारी-भरकम खर्च पर संसद में सवालों के जवाब देने के लिए एक मंत्री की दरकार है। लेकिन दूसरा अहम कारण क्या है? शायद इसका जवाब कोई नहीं जानता है। इससे भी बुरा यह है कि कोई भी इसकी फिक्र नहीं करता है।
ऐसी स्थिति में क्या करना है? कम-से-कम इस मंत्रालय का पुनर्गठन कर आकार में कटौती तो की ही जानी चाहिए। अगर इस प्रस्ताव को सिद्धांत रूप में स्वीकार किया जाता है तो प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) इसे बेहतर ढंग से अंजाम देने के लिए एक निगरानी समिति बना सकता है। इसकी शुरुआत इस बात को साफ तौर पर स्वीकार कर की जा सकती है कि कृषि संबंधी समस्याओं का निपटारा सिर्फ राज्य ही कर सकते हैं क्योंकि वे इसके लिए सबसे अच्छी स्थिति में होते हैं।
हमारे संविधान-निर्माताओं ने भी यही सोचा था। उन्होंने कृषि को राज्य सूची का विषय बनाया लेकिन इसे समवर्ती सूची में भी जगह दी गई थी। कृषि कानूनों में बदलाव को लेकर जारी तनातनी इस बात का माकूल उदाहरण है कि गलत एजेंसी किस तरह सही काम कर रही है?
इस तरह, फसलों के समर्थन मूल्य का निर्धारण राज्य सरकारों पर छोड़ दिया जाना चाहिए। इसके बजाय केंद्र कृषि मंत्रालय के माध्यम से सब पर एक ही नीति लागू करने की कोशिश करता है जो इतनी विविध एवं विभेदीकृत गतिविधि में कारगर नहीं हो सकती है।
खुद से पूछें- क्या भारी केंद्रीय सब्सिडी के बगैर खेतों में नहीं उगाई जा सकने वाली फसलों को उन राज्यों में नहीं उगाया जाना चाहिए जो पूरी सब्सिडी का भुगतान खुद ही करने की स्थिति में दिवालिया हो सकते हैं? या फिर फसलों की अदला-बदली करना मुश्किल है तो फिर उससे समर्थन मूल्य कम नहीं होगा?
पंजाब इसका माकूल उदाहरण है। वहां पर पानी के पूरी तरह या लगभग मुफ्त होने से किसान अपनी जमीन के लिए पूरी तरह मुफीद नहीं रहने वाली फसलें भी उगाने लगे हैं। लेकिन इसकी लागत देश भर के करदाताओं को चुकानी होती है। देश के अग्रणी कृषि विशेषज्ञों में शुमार किए जाने वाले अशोक गुलाटी कहते हैं, ‘पंजाब में हरेक कृषक परिवार को वित्त वर्ष 2019-20 में करीब 1.22 लाख रुपये की सब्सिडी मिली थी। यह भारत में एक कृषक परिवार को दी जाने वाली सर्वाधिक सब्सिडी है। पंजाब के कृषक परिवार की औसत आय भारत में सबसे अधिक है। असल में देश के भीतर एक औसत कृषक परिवार की आय से पंजाब के किसान की आय लगभग ढाई गुनी है।’
इस असमानता से बचने का केवल एक तरीका है: राज्यों को वह काम खुलकर करने दें जिनके लिए वे सक्षम हैं। और अगर वे इन नीतियों को लागू करने पर आमादा रहते हैं तो उन्हें इनकी खामियों का खमियाजा खुद ही भुगतने दें।
नैतिक जोखिम
करीब पांच दशकों से घटित हो रही इस स्थिति को अर्थशास्त्र में ‘नैतिक जोखिम’ समस्या कहा जाता है। ऐसा होने का कारण यह है कि ऐसी बेवकूफी के अंजामों से संरक्षण दिए जाने पर ऐसी बेवकूफी भरी चीजें ही होंगी। या फिर जैसी कहावत है कि ‘मुफ्त का चंदन, घिस मोरे नंदन’।