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तकनीकी सामंतवाद का खतरा: क्या अब देशों की सरकारों से भी ताकतवर हो रही हैं कॉरपोरेट कंपनियां?

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दुनिया भर में सरकारों के मुकाबले कॉरपोरेट और टेक कंपनियों की ताकत तेजी से बढ़ रही है, जिससे 'तकनीकी सामंतवाद' और वैश्विक असंतुलन का खतरा मंडरा रहा है

Last Updated- July 31, 2026 | 9:56 PM IST
Corporate Governance
प्रतीकात्मक तस्वीर | फाइल फोटो

जैसे-जैसे दुनिया अलग-अलग देशों के छोटे और संकरे गुटों में बंटती जा रही है, यह खतरा खड़ा हो गया है कि राज्य से परे कॉरपोरेट हित वैश्विक निर्णयों पर हावी होने लगेंगे। कई तरह के व्यवधानों के इस दौर में प्रौद्योगिकी पर संप्रभु नियंत्रण और ऐसी भरोसेमंद आपूर्ति श्रृंखलाओं के निर्माण का चलन है, जिन पर भरोसा किया जा सकता है।

एक सीमा तक यह अच्छी बात है किंतु प्रौद्योगिकी पर संप्रभु नियंत्रण का अर्थ यह भी है कि इन प्रौद्योगिकियों का निर्माण करने वाले ताकतवर केंद्रों को और भी बड़ा तथा अधिक शक्तिशाली बनने दिया जाएगा। अगर यह संप्रभु शक्ति के लिए इतना जरूरी है तो क्या राष्ट्रीय सरकारें उनकी शक्ति कम करने का प्रयास नहीं करेंगी? अब हम उस निर्णायक मोड़ पर पहुंच चुके हैं, जहां कॉरपोरेट शक्तियां राज्य की शक्ति के बराबर पहुंच सकती हैं या उनसे भी बड़ी हो सकती हैं।

हालिया अतीत में हमने देखा है कि कैसे अमेरिका उन्न चिप्स और मिथॉस जैसे आर्टिफिशल इंटेलिजेंस (एआई) टूल्स को दूसरे देशों तक पहुंचने से रोकने का प्रयास किया। लेकिन इन फैसलों में जल्द ही बदलाव करना पड़ा क्योंकि वैश्विक प्रभुत्व की चाह में कोई भी देश बुनियादी वाणिज्यिक हितों के साथ समझौता नहीं कर सकता।

सत्ता पर कम्युनिस्ट पार्टी के एकाधिकार वाले चीन को जैसे ही लगा कि अलीबाबा की ताकत उसके नियंत्रण के परे चली गई है, उसने फौरन अलीबाबा के पर कतर दिए। लेकिन चीन भी अपनी तकनीकी कंपनियों की वैश्विक ताकत कभी खत्म नहीं होने देगा। अलीबाबा के जैक मा को सार्वजनिक जीवन से जबरदस्ती गायब करके सख्त संदेश जरूर दिया गया होगा मगर अलीबाबा को खत्म नहीं होने दिया गया।

भारत में भी ‘अदाणी और अंबानी’ की ताकत पर तमाम सियासी बयानबाजी के बावजूद यह कल्पना करना मुश्किल है कि वे टूट सकते हैं क्योंकि वे उन चुनिंदा समूहों में शामिल हैं, जो दुनिया की आला कंपनियों के सामने टिके रह सकते हैं। कंपनियों की ताकत में कमी राज्य की किसी कार्रवाई से होने के बजाय परिवारों के अंदरूनी झगड़ों से होने का आशंका ज्यादा होती है क्योंकि कई बार उत्तराधिकारी अपनी-अपनी कंपनियां चलाना चाहते हैं।

पश्चिम में पारिवारिक कारोबार भारत के मुकाबले कम हैं और वहां कॉरपोरेट ताकत उन मुख्य कार्य अधिकारियों (सीईओ) और निदेशक मंडलों के पास चली गई हैं, जिनका चुनाव नहीं होता।

जब दुनिया राजनीति और अर्थशास्त्र में नई शक्ति व्यवस्थाओं के अनुरूप ढल रही है तब किसी भी बड़ी कंपनी को एक सीमा से ज्यादा नहीं रोका जा सकता। बल्कि कंपनियां ही सरकारों पर ताकत दिखाएंगी, अमेरिका पर भी। इसका अर्थ है कि एमेजॉन, ऐपल, अल्फाबेट (गूगल), मेटा, माइक्रोसॉफ्ट, एनवीडिया और टेस्ला/स्पेसएक्सज जैसी बड़ी कंपनियों का अमेरिकी सरकार और वॉल स्ट्रीट पर हमेशा भारी रुतबा होगा।

इन कंपनियों में जल्द ही ऐंथ्रॉपिक और ओपनएआई जैसी बड़ी कंपनियों का नाम भी जुड़ सकता है, जिनका मूल्यांकन 1 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंचने वाला है और जो बाजार में सूचीबद्ध होने की तैयारी कर रही हैं। ओपनएआई कमाई और मूल्यांकन आदि में ऐंथ्रॉपिक से पीछे क्यों न रह जाए, उसे कभी विफल नहीं होने दिया जाएगा। उसे बचा लिया जाएगा बल्कि मजबूत कंपनियों में उसका विलय भी कराया जा सकता है क्योंकि उसमें बहुत ज्यादा रकम दांव पर लगी है।

यह तस्वीर काफी समय से उभर रही है, डॉनल्ड ट्रंप के आने से पहले भी, जिनकी अराजक नीतियों से तकनीकी राष्ट्रवाद का उदय तेज हो रहा है। ग्रीस के वित्त मंत्री रहे यानिस वरूफाकिस आदि ने जिस ‘तकनीकी सामंतवाद’ शब्द को लोकप्रिय बनाया था, उसका अर्थ यह है कि संप्रभुता अब सरकारों के पास ही नहीं रह गई है। वह भारीभरकम तकनीकी प्लेटफॉर्मों और कंपनियों तक पहुंच गई है, जो मोबाइल फोन से लेकर चिप्स और इंटरनेट तक लगभग हर मानवीय गतिविधि पर हावी हैं।

जरा सोचिए कि अमेरिका में एक सदी से भी ज्यादा समय से एकाधिकार रोधी कानून मौजूद है मगर वहां कितनी बड़ी एंटी ट्रस्ट कार्रवाई सफल हो पाई हैं? कॉरपोरेट ताकत के दो बड़े विघटन 1911 और 1984 में हुए। 1911 में स्टैंडर्ड ऑयल को 34 कंपनियों में बांट दिया गया और 1984 में एटीऐंडटी को अपने क्षेत्रीय टेलीफोन कारोबार अलग करने पर मजबूर किया गया।

अमेरिकी न्याय विभाग ने 2000 में माइक्रोसॉफ्ट को तोड़ने की कोशिश की मगर अपने एकाधिकारवादी तरीकों में बदलाव पर रजामंद होकर कंपनी उस झटके से बच गई। इस समय गूगल, एमेजॉन और ऐपल के खिलाफ एंटी ट्रस्ट कार्रवाई चल रही हैं मगर इस बात की आशंका कम है कि उनकी कॉरपोरेट ताकत पर ज्यादा कैंची चलाई जाएगी।

कायदे में ऐसी कार्रवाई अमेरिका और चीन से शुरू होनी चाहिए। लेकिन अगर वे खुद को जी2 (दो देशों का समूह) मानने लगते हैं तो इस बात की संभावना ज्यादा है कि वे अपने घर की कंपनियों के बजाय जी2 से बाहर के देशों में ताकतवर तकनीकी कंपनियों का कद कम करने के लिए मिलीभगत करें। यह सोचना भी कठिन है कि अमेरिका गूगल, एमेजॉन, ऐपल, माइक्रोसॉफ्ट, मेटा या स्पेसएक्स यानी मैग-7 को उस तरह तोड़ेगा, जैसे चीन बायडू, अलीबाबा, टेनसेंट या शाओमी के साथ किया।

जरा सोचिए कि केवल एक कंपनी का कितनी जगह दबदबा है। सर्च बाजार के 90 प्रतिशत और ऐंड्रॉयड, क्रोम और गूगल मैप्स के 60-70 प्रतिशत पर गूगल का अधिकार है। ज्यादा विवेक वाली दुनिया में गूगल (या इसकी मूल कंपनी अल्फाबेट) को कम से कम चार या पांच अलग-अलग कंपनियों में बांटा जाना चाहिए था और एमेजॉन को भी इतनी ही कंपनियों में। किंतु राजनीतिक शक्ति के विखंडन के इस दौर में तकनीकी सामंतवाद के खिलाफ देशों  की एकजुट कार्रवाई की गुंजाइश घट रही है।

तकनीकी सामंतवाद को तभी सीमित किया जा सकता है, जब प्रमुख शक्तियों के बीच वैश्विक समझौता हो। इन कॉरपोरेट दिग्गजों को तोड़ने के लिए अमेरिका और चीन ही नहीं, एशिया, अफ्रीका, यूरोप और लैटिन अमेरिका की उभरती शक्तियों को भी शामिल करना होगा। लेकिन जब भूराजनीतिक ताकत खुद टूट रही हो तो ऐसा होना असंभव लगता है।

जब सामूहिक संप्रभु ताकत दुनिया भर में कंपनियों के आकार पर अंकुश नहीं लगा सके तो वैश्विक निर्णय प्रक्रिया में तकनीकी सामंतवाद की प्रमुख भूमिका रहेगी चाहे उनके निर्णय नागरिकों को केवल उपभोक्ता बनाकर न छोड़ दें, जिनकी निजता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का हनन होता रहे। भारत जैसी मझोली शक्तियां इन बड़ी कंपनियों को चुनौती कैसे दे पाएंगी, जब अमेरिका और यूरोप तक ऐसा नहीं कर पा रहे हैं।

यह बेशक कल्पना लगे मगर हकीकत यही है। इसे बदलने का दूसरा तरीका यही है कि नागरिक गैर-जवाबदेह कॉरपोरेट दिग्गजों को इतनी अधिक शक्ति देने के खिलाफ बड़ विरोध करें। लेकिन ऐसे विद्रोहों के साथ अपनी तरह की अराजकता आती है क्योंकि वे स्थापित कानून और आर्थिक व्यवस्था को उलट देते हैं। भारत समेत दुनिया भर में असहनीय स्तर तक मुफ्त की रेवड़ी और सब्सिडी इसलिए बांटी जाती हैं ताकि नागरिकों की बेचैनी काबू में रखी जाए और वे सड़कों पर नहीं उतरें।

सरकार की ताकत और कंपनियों की ताकत तथा मतदाताओं की परिवर्तन लाने की ताकत और सरकार एवं तकनीकी सामंतों की साझा ताकत के बीच स्पष्ट असंतुलन है, जो लगातार बढ़ रहा है। हमें नहीं पता कि यह असंतुलन दूर कैसे होगा मगर इसे दूर करना होगा। पश्चिम को यह मानना पसंद है कि ऑलिगार्क (सत्ता और राजनीति को प्रभावित करने वाले धनकुबेर) केवल रूस में हैं मगर ऐसा नहीं है।


(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। लेख में उनके निजी विचार हैं)

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First Published - July 31, 2026 | 9:47 PM IST

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