सूचना प्रौद्योगिकी (मध्यवर्ती दिशानिर्देश एवं डिजिटल मीडिया आचार संहिता) नियम 2021, अथवा आईटी नियम 2021 ने कई न्यायिक चुनौतियों को जन्म दिया है और सार्वभौमिक मानवाधिकार उल्लंघन के लिए उसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आलोचना का सामना करना पड़ा है। इन नियमों के कारण ट्विटर और सरकार के बीच विवाद पैदा हो गया है। अन्य बड़े मंच मसलन गूगल, फेसबुक और व्हाट्सऐप आदि ने भारत में एक ‘मुख्य अनुपालन अधिकारी’, एक ‘शिकायत अधिकारी’ और ’24 घंटे संपर्क का केंद्र’ स्थापित करने का नियम मान लिया है। ट्विटर ने इनके अनुपालन में देरी की, हालांकि उसका दावा है कि उसने अंतरिम नियुक्तियां कर दी हैं। वह सूचना प्रौद्योगिकी संबंधी संसदीय समिति के सवालों का जवाब दे रही है और ‘फेक न्यूज’ (फर्जी खबर) के एक मामले में उत्तर प्रदेश पुलिस ने भी उसे समन जारी किया है।
इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री ने भी जोर देकर कहा है कि अब मध्यवर्ती के रूप में इन मंचों का सुरक्षित दर्जा समाप्त हो चुका है और इन पर प्रकाशित या प्रसारित किसी भी सामग्री के लिए इन्हें जवाबदेह ठहराया जा सकता है। इन आईटी नियमों के सामने कई चुनौतियां भी हैं। व्हाट्सऐप ने दिल्ली उच्च न्यायालय में एक याचिका दायर करके आरोप लगाया है कि ये नियम एंड टु एंड इनक्रिप्शन को भंग करने की मांग करके निजता के अधिकार को तोड़ रहे हैं। गूगल ने भी दिल्ली उच्च न्यायालय से संपर्क कर मीडिया प्लेटफॉर्म की परिभाषा को चुनौती दी है। द वायर और द क्विंट जैसे ऑनलाइन मीडिया चैनलों ने एक अन्य याचिका में नियमों को चुनौती देते हुए कुछ अन्य बातों के अलावा दावा किया है कि ये नियम मूल विधान सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम 2000 के दायरे का उल्लंघन करते हैं। केरल उच्च न्यायालय ने ऑनलाइन पोर्टल लाइव लॉ की एक याचिका स्वीकार की है जिसमें कहा गया है कि ये नियम डिजिटल समाचार मीडिया को मनमाने, अस्पष्ट और असंगत रूप से प्रतिबंधित करते हैं। अदालत ने कहा है कि याचिका की सुनवाई होने तक कोई कदम न उठाया जाए।
इसके अलावा मानवाधिकार को लेकर संयुक्त राष्ट्र के तीन विशेष प्रतिवेदकों ने सरकार से अनुरोध किया है कि वह कुछ अहम पहलुओं की समीक्षा करे और उन्हें वापस ले। इन पत्रों में कहा गया है कि पहला संदेश भेजने वाले को चिह्नित करने, मध्यवर्ती की जवाबदेही और डिजिटल मीडिया सामग्री की कार्यकारी निगरानी आदि सभी निजता के अधिकार और अभिव्यक्ति की आजादी का हनन करते हैं। उन्होंने फर्जी खबर जैसे शब्दों की अस्पष्टता की ओर भी संकेत किया क्योंकि ये अच्छी तरह परिभाषित नहीं है और स्वतंत्र मीडिया को बुरी तरह प्रभावित कर सकता है। अभिव्यक्ति की आजादी और निजता दोनों को संवैधानिक गारंटी हासिल है। ये अधिकार नागरिक और राजनीतिक अधिकारों की अंतरराष्ट्रीय प्रतिज्ञा में शामिल हैं। प्रधानमंत्री हाल ही में इसके प्रति भारत की प्रतिबद्धता जता चुके हैं।
नियमों की परिभाषा वाकई बहुत व्यापक है। इसमें हर वह ऑनलाइन प्लेटफॉर्म शामिल है जिसके 50 लाख से अधिक भारतीय उपयोगकर्ता हों। फिर चाहे वह प्लेटफॉर्म कुछ भी करता हो। नियम सामग्री पर बहुत कठोर नियंत्रण थोपते हैं जिनके बारे में मध्यवर्तियों से कहा जा सकता है कि वे उन्हें हटाएं। इसकी शर्तें अस्पष्ट हैं। इनक्रिप्शन तोडऩा निजता के अधिकार का उल्लंघन करता है। कोई लोकतांत्रिक देश ऐसे नियंत्रण नहीं लगाता।
सरकार को इन नियमों पर पुनर्विचार करना चाहिए क्योंकि इसी समय वह अंतरराष्ट्रीय मंचों पर मानवाधिकार को लेकर प्रतिबद्धता जता रही है। नियम बनाने का तरीका भी दिक्क्तदेह है। लोकतंत्र में यह पूछा जाना चाहिए कि क्या वैश्विक सार्वजनिक मंचों का संचालन कुछ सरकारी अधिकारियों के हाथ में छोड़ा जा सकता है। आशा की जानी चाहिए कि अदालतें इस विषय पर समग्रता से विचार करेंगी और यह विषय इस प्रकार निपटाया जाएगा कि कोई सरकार अभिव्यक्ति की आजादी को चुनौती नहीं देगी।