क्या वस्तुओं कामूल्य कम होना उपभोक्ताओं के लिए अच्छी बात है? शुरू में स्वाभाविक तौर पर इसका जवाब हां आएगा लेकिन बाद में यह भी महसूस हो सकता है कि कीमतें एक वाजिब स्तर से नीचे आने पर किसी वस्तु की गुणवत्ता लंबे समय तक बरकरार नहीं रखी जा सकती है। इसी तरह सटीक योजना के अभाव में और वास्तविकता से दूर नीतियों के साथ अति महत्त्वाकांक्षी लक्ष्य प्राप्त नहीं किए जा सकते हैं और इस राह में कठिनाइयों और अस्थिरता के अलावा कुछ हाथ नहीं लगता। कोयला आधारित बिजली संयंत्र के लिए वित्त की कमी ऐसा ही एक उदाहरण है। इससे यह भी साफ हो जाता है कि दूसरे स्रोतों से आपूर्ति सुनिश्चित होने तक बिजली का अभाव बना रहेगा। ऊर्जा उत्पादन और इससे जुड़ी समस्याओं का समाधान खोजने के लिए हमें उन सभी पहलुओं पर एक साथ विचार करना चाहिए जो एक दूसरे के बिना अधूरे हैं। एक और अहम विषय बिजली बाजार में व्यवस्था एवं स्थिरता सुनिश्चित करने से संबंधित है। इस दिशा में कारगर उपाय करने के लिए भारत को ऐसे निवेशकों की जरूरत होगी जो बड़े पैमाने पर निवेश करने के लिए तैयार हैं और लाभ कमाने की जल्दबाजी में भी नहीं है।
बड़े आकार की परियोजनाओं को लक्ष्य तक पहुंचाने के लिए जमीनी स्तर पर तैयारी पुख्ता होनी चाहिए। बड़ी कंपनियां अक्सर बड़े स्तर पर काम करती हैं और छोटे-मोटे निवेश करने में रुचि नहीं रखती है। इस लिहाज से उन्हें सब कुछ पहले से ही दुरस्त चाहिए ताकि एक बार परियोजना शुरू होने पर बीच में कोई बाधा नहीं आए। बिजली वितरण कंपनियों की वित्तीय क्षमता बढ़ाना भी एक महत्त्वपूर्ण पहलू है जिस पर ध्यान देने की आवश्यकता है। भारत में सौर ऊर्जा क्षेत्र में सॉफ्टबैंक का निवेश और उसके बाद इसका बाहर निकलना भारत के ऊर्जा क्षेत्र में व्यवस्था एवं क्षमता लाने में आ रही दिक्कतों का एक नमूना है।
सॉफ्टबैंक का सौर ऊर्जा पर दांव
वर्ष 2015 में जापान के सॉफ्टबैंक ग्रुप के मुख्य कार्याधिकारी माशायोशी सन ने एसबी एनर्जी (एसबीई) के जरिये भारत में सौर ऊर्जा परियोजनाओं में 20 अरब डॉलर निवेश करने की घोषणा की थी। एसबीई भारती एंटरप्राइजेज और ताइवान की फॉक्सकॉन के बीच की संयुक्त उद्यम है। भारत के लिए यह घोषणा आदर्श दिखी। भारत में सूर्य की रोशनी प्रचुर मात्रा में उपलब्ध रहती है और यह एक बड़ा बाजार भी है इसलिए यहां बड़ी सौर ऊर्जा परियोजनाएं लगाना हमेशा दूर से लाभकारी एवं आकर्षक दिखता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2022 के लिए सौर ऊर्जा का लक्ष्य 20 गीगावॉट से बढ़ाकर 100 गीगावॉट कर दिया है। भारत में 4 गीगावॉट सौर ऊर्जा ग्रामीण एवं रूफटॉप परियोजनाओं से उपलब्ध थी और इसकी कीमत कोयले से प्राप्त बिजली से 50 प्रतिशत अधिक थी। शुरुआत अच्छी रहने के बावजूद सॉफ्टबैंक ने कीमतों को लेकर अपेक्षाएं अधिक रखीं।
चीन से सस्ते सोलर मॉड्यूल और बढ़ती प्रतिस्पद्र्धा के कारण सौर ऊर्जा दरें कम होने लगीं। सॉफ्टबैंक की हर तरफ मौजूदगी ने भी प्रतिस्पद्र्धा बढ़ाने में अहम भूमिका निभाई। एसबीई ने दिसंबर 2015 में आंध्र प्रदेश में 4.63 रुपये प्रति यूनिट की बोली लगाकर परियोजना अपनी झोली में डाली थी लेकिन राजस्थान में मई 2017 में इसने 2.45 रुपये प्रति यूनिट की बोली लगाई। हालांकि तब भी एसबीई ने कहा कि यह दर भी उसके लिए लाभकारी है। सौर ऊर्जा दरें कोयले से प्राप्त बिजली के मुकाबले कम होकर आधी रह गईं। पेंशन फंडों के मैदान में आने के बाद दिसंबर 2020 में यह दर और कम होकर 1.99 रुपये प्रति यूनिट हो गई। हालांकि अब कीमतें फिर अधिक हो गई हैं और मई में सफल बोलियां 2.51 से 2.69 रुपये प्रति यूनिट के बीच रहीं।
इस बीच सॉफ्टबैंक ने भारत के सौर ऊर्जा क्षेत्र में 60-100 अरब डॉलर निवेश करने की घोषणा की थी, बावजूद इसके वह 900 गीगावॉट की भारी भरकम निविदा जारी करने के लिए सरकार को तैयार नहीं कर पाई। बाद में पारेषण लाइनों के लिए जमीन की किल्लत, भुगतान में देरी और आंध्र प्रदेश में बिजली खरीद समझौते पर मतभेद के बाद सॉफ्टबैंक की रुचि कम होती गई। दिलचस्प बात है कि सौर ऊर्जा की कीमत इस समय 2.70 रुपये प्रति यूनिट है और एसबीई ने 2018 में 1 गीगावॉट निविदा के लिए इतनी ही बोली लगाई थी। उस समय सरकार को एसबीई से पूरे 3 गीगावॉट निविदा के लिए सस्ती बोली आने की उम्मीद थी। सरकार ने इसी तरह की दूसरी बोलियां भी रद्द कर दीं और एसबीई पर दूसरी कंपनियों के साथ मिलकर सांठगांठ करने का आरोप लगाया था। पिछले महीने सॉफ्टबैंक ने अपनी सौर ऊर्जा परिसंपत्तियां अदाणी ग्रीन एनर्जी लिमिटेड (एजीईएल) को बेच दी और अब वह अमेरिका में इस क्षेत्र में निवेश करने पर ध्यान केंद्रित कर रही है। दूसरी तरफ, कंपनी भारत में उच्च-तकनीक खंड में लगातार निवेश कर रही है और मई 2021 के अंत तक इसने 2 अरब डॉलर निवेश करने की बात कही है। पर्यावरण के लिए लिहाज से देश की सौर ऊर्जा क्षमता अपर्याप्त है और जितनी उत्पादन क्षमता है उस दृष्टिकोण से भी देश पीछे है।
सॉफ्टबैंक जिस सीमा तक निवेश के लिए तैयार थी सरकार उसके लिए बड़ी बोलियां स्वीकार नहीं कर पाईं। भारत की इस समय मौजूदा निविदा जारी करने की सालाना क्षमता 6-8 गीगावॉट है और इस लिहाज से अभी कोयले पर निर्भरता बनी रहेगी। इसका मतलब है कि जब तक सरकार बड़े निवेशकों को शामिल नहीं करती है तब तक कार्बन उत्सर्जन पर भी नियंत्रण नहीं होगा। इसके लिए राज्य वितरण कंपनियों की समस्याएं दूर करने होगी और बड़ी सौर ऊर्जा परियोजनाओं के लिए निविदाएं जारी करने के साथ ही और दरों को लेकर वास्तविक एवं व्यावहारिक रवैया रखना होगा।
गुणवत्ता एवं मात्रा पर केंद्रित एसबीई ने सौर ऊर्जा परियोजनाओं के ढांचे और इसकी स्थापना से जुड़े कार्य उच्च गुणवत्ता वाले अभियांत्रिकी, क्रय एवं निर्माण (ईपीसी) ठेकेदारों को दे दिए। सस्ती रकम और क्षमता से लैस होने की कंपनी की खूबियों पर सस्ती बोली एवं अधिक ढांचागत लागत ने पानी फेर दिया। भारत ऐसे निवेशकों के लिए तैयार नहीं दिख रहा है क्योंकि कम कीमतें गुणवत्ता पनपने नहीं देती हैं, भले ही गुणवत्ता के लिए एक वाजिब मूल्य ही क्यों नहीं मांगा जा रहा है। लेकिन हमें बिजली और अन्य आधारभूत परियोजनाओं में निवेश की इच्छा रखने वाले गंभीर निवेशकों को तैयार करने की जरूरत है। भारत में बिजली, दूरसंचार और ब्रॉडबैंड बाजार कम एवं अस्थिर कीमतों की वजह से परेशान हैं। हमारा लक्ष्य तभी पूरा होगा जब हम एक वाजिब कीमत पर एकीकृत एवं स्थिर सेवाएं देने के लिए नीतियां तैयार करेंगे। जरूरी नहीं है इसके लिए कीमतें कम ही रखी जाएं जिससे बाद में गुणवत्ता से समझौता करने की नौबत आ जाए। ऐसा करने से ही हम अपनी अर्थव्यवस्था को निरंतर आगे बढ़ा सकते हैं और इसकी बुनियाद एवं वृद्धि दर मजबूत बना सकते हैं।
सरकारी नीतियों एवं नियमन के बीच आपसी तालमेल होना जरूरी है, कम से कम इनमें विरोधाभास तो नहीं होना चाहिए। लक्ष्य की पूर्ति के लिए विभिन्न क्षेत्रों में संबंधित एवं एक दूसरे के पूरक संसाधनों का एकीकरण होना चाहिए। ऐसा तभी होगा जब केंद्र और राज्य सरकारें एकीकृत योजना तैयार कर ऊर्जा क्षेत्र को आगे बढ़ाने के लिए विभागों के बीच आपसी सामंजस्य सुनिश्चित करेंगी। हालांकि इससे भी पहले भुगतान में नियमितता सहित राज्य बिजली वितरण कंपनियों की वित्तीय दिक्कतें दूर करनी होंगी। अगर इस दिशा में वाजिब प्रयास किए जाएं और 5 से 10 गीगावॉट क्षमता की व्यावहारिक निविदाएं जारी की जाएं और इसमें समय-समय पर इजाफा किया जाए तो सरकार ऐसे अनुबंधों के लिए दो या तीन निवेशकों से बातचीत शुरू कर सकती है।