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लंबित कृषि सुधार

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बीएस संवाददाता
Last Updated- December 15, 2022 | 7:54 PM IST

सरकार ने हाल ही में कृषि विपणन में खुलापन लाने और अनुबंधित कृषि को औपचारिक करने के जो कदम उठाए हैं उसकी तुलना कुछ लोग सन 1991 के आर्थिक उदारीकरण के कदमों से कर रहे हैं लेकिन इसके बावजूद कृषि सुधार की प्रक्रिया का पूरा होना अभी दूर है। भूमि क्षेत्र से जुड़ा एक बड़ा सुधार यानी जमीन को पट्टे पर देने को वैधानिक बनाना अभी भी बाकी है। इसके अलावा विश्लेषकों ने सुधारों को अंजाम देने वाले अध्यादेशों में भी कई खामियों की ओर संकेत किया है जिन्हें हल किया जाना आवश्यक है। ऐसा करके ही उनसे वांछित परिणाम हासिल किए जा सकते हैं।
अच्छी बात यह है कि फिलहाल जो कदम उठाए जाने हैं उनकी राह इतनी भी कठिन नहीं नजर आ रही। अध्यादेशों से संबंधित दिक्कतों को संसद में कानून पारित होते समय दूर किया जा सकता है या इन कानूनों के तहत बनने वाले नियमों में उनका ध्यान रखा जा सकता है। परंतु जमीन को पट्टे पर देने के मामले में सहमति के लिए केंद्र को राज्य सरकारों की सहमति की आवश्यकता होगी।
जमीन को पट्टे पर देने को वैधानिक बनाना, मोदी सरकार के पहले कार्यकाल से ही आधिकारिक थिंक टैंक नीति आयोग द्वारा प्रस्तुत कृषि सुधार एजेंडे का हिस्सा रहा है। इसे किसानों की आय दोगुनी करने संबंधी उच्चस्तरीय समिति का भी समर्थन हासिल है जिसकी अध्यक्षता कृषि मंत्रालय के अधिकारी अशोक दलवई ने की थी। इस समिति ने गत वर्ष नवंबर में सरकार को अपनी रिपोर्ट दी थी। माना जा रहा है कि छोटे किसानों के लिए वैध जमीन पट्टे का बाजार अब आवश्यकता बन चुका है। ये वे किसान हैं जो या तो खेती छोड़कर अपनी कृषि भूमि दूसरों को पट्टे पर देना चाहते हैं या फिर अपने रकबे को बेहतर बनाए रखने के लिए दूसरों की जमीन पट्टे पर लेना चाहते हैं।
फिलहाल कृषि भूमि को पट्टे पर देने पर या तो प्रतिबंध है या फिर उस पर कई तरह के नियंत्रण लागू हैं। केवल कुछ ही राज्यों में ऐसे लोगों को जमीन पट्टे पर देने की अनुमति है जो या तो दिव्यांग हैं, विधवा हैं या सशस्त्र बलों में कार्यरत हैं। इसके परिणामस्वरूप कृषि भूमि का बहुत बड़ा हिस्सा कई छोटे भूखंडों और प्रवासी श्रमिकों के रकबे के रूप में है जो इसलिए इस्तेमाल नहीं हो पाता है क्योंकि उनके मालिक स्वामित्व अधिकार गंवाने के डर से उन्हें पट्टे पर नहीं देते।
जमीन की पट्टेदारी को वैधानिक बनाना इसलिए भी महत्त्वपूर्ण है क्योंकि इसके अभाव में किराये पर खेती करने वालों और फसल साझा करने वालों के साथ अन्याय होता है। दरअसल फसल नुकसान की स्थिति में उन्हें कोई हर्जाना नहीं मिलता और न ही उन्हें सस्ते बैंक ऋण और अन्य सरकारी सब्सिडी का कोई लाभ मिल पाता है। वे सरकार की प्रत्यक्ष आय समर्थन जैसी योजना का भी लाभ नहीं ले पाते।
कृषि लागत एवं मूल्य आयोग के पूर्व अध्यक्ष टी हक की अध्यक्षता वाली नीति आयोग की एक समिति इस दिशा में राह दिखाने वाला एक मसौदा तैयार कर चुकी है जिसके आधार पर विभिन्न राज्य इस दिशा में पहल कर सकते हैं। कई राज्य जहां इस सुधार के इच्छुक हैं वहीं अब तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया जा सका है।
भूमि अधिग्रहण कानून जटिल था क्योंकि अपनी पुश्तैनी जमीन बचाने के लिए किसानों ने उसका तीव्र विरोध किया था लेकिन जमीन को पट्टे पर देने का प्रावधान विवादास्पद नहीं होगा क्योंकि इससे स्वामित्व प्रभावित नहीं होता। केंद्र को राज्यों को इस बात के लिए मनाना है कि वे अपने भू कानूनों में जरूरी प्रावधान शामिल करें ताकि जमीन पट्टे पर दी जा सके। ऐसे में कृषि क्षेत्र के इस अहम सुधार में और देरी की कोई वजह नहीं दिखती। यह सुधार ग्रामीण निर्धनों को गरीबी के दायरे से बाहर लाने में मदद करेगा।

First Published : June 10, 2020 | 11:11 PM IST