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आत्मप्रशंसा नहीं

Last Updated- December 11, 2022 | 9:31 PM IST

वर्ष 2021-22 की आर्थिक समीक्षा पिछले वर्षों से कुछ अलग स्वरूप में सोमवार को संसद में प्रस्तुत की गई। पिछली आर्थिक समीक्षाओं के दो खंडों की जगह इस बार एक खंड की समीक्षा पेश की गई और इसके लगभग सभी अध्याय ढांचागत विषयों पर केंद्रित हैं। एक अलग खंड में अंकविवरण संबंधी परिशिष्ट भी प्रकाशित किया गया है। भारत सरकार के प्रमुख आर्थिक सलाहकार संजीव सान्याल ने अपनी भूमिका में लिखा है कि यह बदलाव दिखाता है कि विषयवस्तु को लेकर अधिक एकीकृत रुख अपनाने का अवसर बना है तथा पहले के दो खंड ‘पर्याप्त संबद्ध’ नहीं थे। सान्याल की यह आलोचना गलत नहीं है। इसके बावजूद यह बात ध्यान देने लायक है कि बीते वर्षों की समीक्षाओं में उपयोगिता अथवा रुचि से जुड़ी सामग्री का बड़ा हिस्सा उन अध्यायों से निकलता था जो जुटाए गए आंकड़े अथवा विश्लेषित क्षेत्रों से संबद्ध नहीं थे। उनसे कल्याण प्रणाली, शहरीकरण जैसे विषयों तथा निजी निवेश के सामने उत्पन्न बाधाओं आदि को लेकर सरकार की विचार प्रक्रिया सामने आती थी।
आर्थिक नीति से संबंधित विषयों को लेकर सरकार की विचार प्रक्रिया के बारे में संकेत देने के अलावा आर्थिक समीक्षा में आमतौर पर इसलिए दिलचस्पी ली जाती है क्योंकि इसमें उपलब्ध आंकड़ों के आधार पर भविष्य के वर्षों में होने वाली वृद्धि और निवेश की संभावनाओं के बारे में अनुमान जताए जाते हैं। जरूरी नहीं कि ये अनुमान अगले दिन प्रस्तुत होने वाले आम बजट से मेल खाएं लेकिन फिर भी ये दिलचस्पी का विषय होते हैं। इस आर्थिक समीक्षा में कहा गया है कि भारतीय अर्थव्यवस्था अच्छी स्थिति में है और 2021-22 में 8.8 फीसदी की वृद्धि के बाद आगामी वर्ष में सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में 8.0 से 8.5 फीसदी की वृद्धि दर्ज की जा सकती है। हालांकि सोमवार को जारी पहले संशोधित अनुमान में यह भी कहा गया है कि महामारी के पहले वर्ष यानी 2020-21 में इसमें 6.6 फीसदी की गिरावट आई थी।
ये आंकड़े मोटे तौर पर विश्वसनीय हैं। समीक्षा में यह भी सही कहा गया है कि आखिरकार भारत मात्रात्मक संदर्भों में महामारी की छाया से उभर रहा है और वह उत्पादन के मामले में महामारी के पहले वाले स्तर पर पहुंच रहा है। हालांकि कम से कम इतनी उम्मीद तो की ही जा सकती है और यह कोई ऐसी घटना नहीं है जिसके लिए सरकार खुद को बधाई दे सके। समीक्षा में कहा गया है कि जब अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) द्वारा 2023 में भारत की वृद्धि के लिए जताए गए 7.1 फीसदी के अनुमान को शामिल किया जाए तो भारत तीन वर्ष में दुनिया की सबसे तेज गति से बढऩे वाली अर्थव्यवस्था बन जाता है। हालांकि यह पूरी तरह आश्वस्त करने वाली बात नहीं है क्योंकि महामारी के पहले वर्ष में भारत में आयी तेज गिरावट का अर्थ यही है कि एक बार फिर आईएमएफ के आंकड़ों के अनुसार 2020 से गिने जाने वाले चार वर्षों में भारत, असाधारण प्रदर्शन करने वाले उभरते एशियाई देशों में शामिल नहीं रहेगा। 2021 से 2024 के बीच के अनुमान यही संकेत देते हैं कि समकक्ष देशों से तुलना की जाए तो हमारे देश में सुधार की प्रक्रिया बहुत तीक्ष्ण नहीं है।
आर्थिक समीक्षा में इकलौती बड़ी उपलब्धि है सरकार द्वारा महामारी से निपटने के लिए किए गए उपायों का बचाव। कहा गया है कि सरकार ने अत्यधिक कुशल प्रतिक्रिया दी। उसके पास हस्तक्षेप के लिए पहले से किया गया आकलन मौजूद नहीं था लेकिन उसने उच्च तीव्रता वाले आंकड़ों का इस्तेमाल करके समय पर सही हस्तक्षेप किए। नीति ऐसे ही बननी चाहिए। परंतु आलोचक कहेंगे कि ऐसी प्रतिक्रिया इसलिए रही क्योंकि कल्याण तंत्र की नाकामी के कारण सरकार कुछ और कर ही नहीं सकी। उसकी वित्तीय स्थिति भी खस्ता थी। कुशलता का दावा ऐसा ही है जैसे जरूरत को गुण बनाकर पेश किया जाए।

First Published - January 31, 2022 | 10:56 PM IST

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