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शुद्ध-शून्य उत्सर्जन का नारा काफी नहीं

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बीएस संवाददाता
Last Updated- December 12, 2022 | 12:26 AM IST

जलवायु परिवर्तन पर गठित अंतरराष्ट्रीय पैनल (आईपीसीसी) की हालिया रिपोर्ट ने खतरे की घंटी बजाई है और ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन कम करने और वैश्विक तापमान में तीव्र वृद्धि के खतरे को कम करने के लिए अधिक कारगर कदम उठाने की मांग रखी है। विकसित देशों ने इसके जवाब में वर्ष 2050 तक कार्बन उत्सर्जन को शुद्ध-शून्य तक ले जाने की प्रतिबद्धता जताई है जबकि चीन ने इस लक्ष्य को वर्ष 2060 तक हासिल करने का वादा किया है। अब भारत पर भी शुद्ध-शून्य उत्सर्जन के लिए एक समयसीमा घोषित करने का दबाव है।

शुद्ध-शून्य उत्सर्जन का यह लुभावना नारा आईपीसीसी की हालिया रिपोर्ट में उल्लिखित बयान के संदर्भ में देखा जाना चाहिए। उस बयान के मुताबिक, ‘कार्बन डाई ऑक्साइड (सीओ2) उत्सर्जन का शुद्ध शून्य स्तर तक पहुंचना इंसानी असर से हो रही वैश्विक तापवृद्धि को स्थिर करने के लिए जरूरी है लेकिन तापमान में वृद्धि को एक खास स्तर तक सीमित करने के लिए समेकित सीओ2 उत्सर्जन को एक कार्बन बजट के भीतर रखना होगा।’ इस बयान का यह मतलब है कि अगर हमने वैश्विक तापमान का एक लक्ष्य तय किया हुआ है तो शुद्ध-शून्य उत्सर्जन को एक लक्षित समय तक हासिल करना ही काफी नहीं है। समेकित उत्सर्जन को भी लक्षित  समय तक स्थिर बनाए रखना होगा। क्या अभी तक किए गए ऐलान इस पैमाने पर सटीक बैठते हैं?

मान लें कि वादे के अनुरूप अमेरिका, यूरोपीय संघ, ब्रिटेन एवं जापान में 2018 से लेकर 2050 तक उत्सर्जन में एक स्थिर गिरावट बनी रहती है और चीन में यह क्रम 2030 से 2060 तक जारी रहता है तो भी शुद्ध-शून्य उत्सर्जन के लिए प्रतिबद्ध इन सभी देशों का समेकित सीओ2 उत्सर्जन 485 गीगाटन का हो जाएगा। आईपीसीसी की इस रिपोर्ट में कहा गया है कि वैश्विक तापवृद्धि को 1.5 डिग्री सेल्सियस के करीब रखने का 50 फीसदी अवसर भी तभी होगा जब इसके लिए उपलब्ध कार्बन बजट 500 गीगाटन का हो। अगर कार्बन बजट 400 गीगाटन का होगा तो इस लक्ष्य को हासिल करने की 67 फीसदी संभावनाएं रहेंगी। लिहाजा शुद्ध-शून्य प्रतिबद्धता के बावजूद बड़े उत्सर्जक देश ही उपलब्ध कार्बन बजट का पूरा इस्तेमाल कर लेंगे और बाकी देशों के लिए कोई गुंजाइश ही नहीं बचेगी। इसके अलावा 1850 से लेकर 2019 तक बड़े उत्सर्जक देशों द्वारा किए गए कुल 2390 गीगाटन सीओ2 उत्सर्जन के लिए किसी को भी दोषी नहीं ठहराया गया है।

बात इतनी ही नहीं है। निर्धारित लक्ष्य भविष्य में कई दशक बाद का है और इसे कानूनी तौर पर बाध्यकारी बनाने का कोई मोल नहीं है। कार्बन उत्सर्जन में 2030 तक कटौती की हालिया घोषणा को छोड़कर उस सुदूर लक्ष्य की राह में उत्सर्जकों को जवाबदेह ठहराने का कोई मध्यवर्ती मुकाम भी नहीं तय किया गया है। ये कटौतियां समेकित सीओ2 उत्सर्जन के 485 गीगाटन रहने के अनुमान को ध्यान में रखते हुए तय की गई हैं।

अमेरिका, यूरोपीय संघ, ब्रिटेन एवं जापान की तरफ से की गईं प्रतिबद्धताओं को एक और नजर से देखने की जरूरत है। वे अपने इलाकों में उत्पादन से होने वाले वाले कार्बन उत्सर्जन का जिक्र कर रहे हैं, न कि उनके उपभोग से पैदा होने वाले उत्सर्जन की। खपत-आधारित ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन की विस्तृत गणना अभी उपलब्ध नहीं है लेकिन कुछ शोध अध्ययन बताते हैं कि 1991 के बाद से विकसित देशों में कार्बन का क्षेत्रीय उत्सर्जन घटा है, वहीं आयातित कार्बन-बहुल उत्पादों की वजह से बढ़ते उपभोग का असर बढ़ा है।

अगर एक देश अपनी कार्बन-बहुल मांगों को दूसरे देशों पर थोपकर अपना शुद्ध-शून्य लक्ष्य हासिल कर भी लेता है तो उससे जलवायु संबंधी साझा लक्ष्यों को पाने में मदद नहीं मिलेगी। जलवायु कार्ययोजना के तहत सभी देशों में उच्च आय वाले उपभोक्ताओं के कार्बन फुटप्रिंट को सीमित करने की प्रतिबद्धता भी शामिल होनी चाहिए क्योंकि आय पिरामिड के शीर्ष 10 फीसदी तबके का वैश्विक कार्बन उत्सर्जन में 48 फीसदी अंशदान है। उच्च आय वाले करीब आधे प्रदूषक अधिक आय वाले देशों में ही हैं और बाकी प्रदूषकों में से ज्यादातर मध्यम आय वाले देशों के निवासी हैं।

शुद्ध-शून्य नारे से जुड़ा तीसरा बिंदु भी जरूरी है। प्रतिबद्धता शून्य कार्बन उत्सर्जन के लिए न होकर शुद्ध-शून्य कार्बन उत्सर्जन के लिए है। इसका निहितार्थ है कि कुछ ऐसी गतिविधियां जारी रहेंगी जिनमें कार्बन उत्सर्जन होता रहेगा और इसकी भरपाई कार्बन सोखने वाले कदमों से की जाएगी। यह आवश्यक है कि कार्बन उत्सर्जन की वास्तविक स्थिति देशों से कार्बन क्रेडिट खरीदकर नहीं बल्कि कार्बन अवशोषित करने के लिए वनीकरण जैसे वास्तविक कदमों से निर्मित होनी चाहिए। साफ है कि वैश्विक ताप-वृद्धि को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित रखने के लक्ष्य की तरफ जाने वाला शुद्ध-शून्य उत्सर्जन का रास्ता और दूसरे देशों के लिए गुंजाइश पैदा करने वाली राह निर्धारित समय से कहीं ज्यादा महत्त्वपूर्ण है। लेकिन बड़े उत्सर्जक देशों की घोषित प्रतिबद्धताएं ऐसा नहीं करती हैं। ऐसी स्थिति में भारत जैसे देशों को आईपीसीसी के अनुमानों के अनुरूप उपलब्ध कार्बन क्षेत्र की साझेदारी के लिए एक वैश्विक समझौते की पुरजोर मांग करनी चाहिए जो जलवायु न्याय के ठोस सिद्धांत पर आधारित हो।

जलवायु चुनौतियों से निपटने का आशय इनके शमन से कहीं ज्यादा है। असल में, हमें जलवायु से जुड़े तीन संबद्ध चुनौतियों- शमन, अनुकूलन एवं लचीलेपन पर ध्यान देने की जरूरत है। अगर ताप-वृद्धि पेरिस समझौते के अनुरूप ही रहती है तब भी पारिस्थितिकी में अहम बदलाव हो चुके होंगे और उनके हिसाब से हमें अपने जीवन एवं कामकाज में बदलाव करने होंगे। इसके लिए विकास रणनीति के लगभग हरेक क्षेत्र का पुन:परीक्षण और तापमान, जल उपलब्धता एवं समुद्री जल स्तर जैसे कारकों में अपेक्षित बदलावों के हिसाब से रणनीति में बदलाव करने की जरूरत है।

लेकिन संभव है कि खुद अनुकूलन कर लेना बढ़ती जलवायु अस्थिरता का सामना करने के लिए काफी न हो। आईपीसीसी रिपोर्ट के मुताबिक, 1850-1950 की अवधि में 10 साल में एक बार होने वाली घटना के उलट हमें ताप वृद्धि को 1.5-2 डिग्री सेल्सियस तक रोकने पर भी भीषण गर्मी के मामले 4.1-5.6 गुना ज्यादा, भारी बारिश के मामले 1.5-1.7 गुना ज्यादा और सूखे के मामले 2.0-2.4 गुना अधिक देखने को मिलेंगे। अभी इस अनुमान में महासागरों से उठने वाले चक्रवात एवं तूफान शामिल नहीं हैं। इस तरह हमें इस साल कनाडा एवं यूरोप में देखी गई भीषण गर्मी की घटनाएं और देखने को मिलेंगी। एक ही दिन में भारी बारिश होने से शहरों में बाढ़ जैसे हालात और अचानक ही सूखा पडऩे की घटनाएं बढ़ सकती हैं। हमें इसीलिए इन तीन तनावों से निपटने के लिए लचीलापन दिखाने की जरूरत है क्योंकि हमारे सामने ऐसी घटनाएं आने लगी हैं।

अगर पिरामिड के निचले स्तर पर मौजूद लोगों के समक्ष उत्पन्न चुनौतियों और उनके कामकाज एवं जीवन के हालात पर नजर डालें तो अनुकूलन एवं लचीलापन खास तौर पर अहम हो जाते हैं। समस्या पैदा करने के लिए अमूमन वे जिम्मेदार नहीं होते हैं और ऊर्जा उपभोग के उनके निम्न स्तर को देखें तो वे इन चुनौतियों को दूर करने के लिए कुछ खास कर नहीं सकते हैं। उन्हें सबसे ज्यादा जरूरत इस बात की है कि इन खतरों की जद में आने से पहले ही अनुकूलन एवं लचीलेपन की दिशा में कदम उठा लें। इसके लिए असरदार स्थानीय प्रतिक्रिया की जरूरत है और हमारी जलवायु परिवर्तन रणनीति का केंद्रीय बिंदु होना चाहिए।

इस समय भारत समेत पूरी दुनिया को जलवायु चुनौतियों के शमन, अनुकूलन एवं लचीलेपन के लिए एक सुसंगत कार्यक्रम की जरूरत है। वैश्विक जलवायु विमर्श साफ तौर पर उपलब्ध कार्बन क्षेत्र के आवंटन पर केंद्र्रित होना चाहिए। कार्बन क्षेत्र से ही देशों के लिए ऐसी रणनीति बनाने की गुंजाइश बनेगी। 

First Published : October 7, 2021 | 11:27 PM IST