क्रिप्टोकरेंसी के कारोबार में बढ़ती रुचि को देखते हुए सरकार को चाहिए कि वह प्राथमिकता के साथ इन आभासी परिसंपत्तियों के लिए नियामकीय ढांचा तैयार करे। निश्चित तौर पर भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के गवर्नर शक्तिकांत दास कह चुके हैं कि क्रिप्टोकरेंसी से जुड़े विधायी और नियामकीय कदम ‘बहुत जल्दी’ घोषित किए जा सकते हैं। उन्होंने स्पष्ट कहा कि आरबीआई इन परिसंपत्तियों को लेकर ‘बहुत गंभीर रूप से चिंतित’ है क्योंकि ये वृहद अर्थव्यवस्था और वित्तीय स्थिरता के लिए बड़ा खतरा साबित हो सकती हैं। हालांकि इन परिसंपत्तियों के अध्ययन के लिए बनी केंद्रीय बैंक की समिति के दिसंबर तक अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करने की आशा है। सरकार अगले सप्ताह क्रिप्टो कारोबार करने वाले एक्सचेंजों के प्रतिनिधियों तथा अन्य अंशधारकों के साथ बैठक भी करने जा रही है। मार्च 2020 में सर्वोच्च न्यायालय ने इनकेकारोबार को वैध करार दिया था और कहा था कि भारतीय बैंक क्रिप्टो एक्सचेंजों को वित्तीय सेवा की पेशकश कर सकते हैं, तब से इनका कारोबार तेजी से बढ़ा है। मोटा मोटा अनुमान लगाया जाए तो भारत के लोग रोज करीब 50 करोड़ रुपये मूल्य का क्रिप्टो कारोबार करते हैं। इस बात के प्रचुर प्रमाण हैं कि अनिवासी भारतीय इससे बहुत अधिक राशि का निवेश क्रिप्टोकरेंसी में कर रहे हैं। भारतीय, नॉन फंजिबल टोकंस (एनएफटी) के इससे संबद्ध क्षेत्र में भी रुचि दिखा रहे हैं। कई सेलिब्रिटीज इन दिनों इस आभासी क्षेत्र से जुड़े विज्ञापन कर रहे हैं।
क्रिप्टोकरेंसी और एनएफटी को लेकर विज्ञापनों की जो बाढ़ आई हुई है उससे यही संकेत मिलता है कि भारत को इन आभासी परिसंपत्तियों का बड़ा बाजार माना जा रहा है। ऐसे तमाम प्रमाण हैं जो बताते हैं कि विदेशों से धनप्रेषण के प्रभावी प्रबंधन के लिए इनका बढ़चढ़कर इस्तेमाल किया जा रहा है। इनका लेनदेन तेज है और इन पर स्थानांतरण शुल्क भी कम है। क्रिप्टोकरेंसी की लोकप्रियता में धनप्रेषण की सहूलियत की बड़ी भूमिका है। अल सल्वाडोर ने बिटकॉइन को अपनी आधिकारिक मुद्रा बनाने की वजह यही बताई है कि वह धनप्रेषण पर बहुत अधिक निर्भर है। फेसबुक भी धनप्रेषण बाजार में प्रवेश के लिए क्रिप्टोकरेंसी गठजोड़ के लिए प्रयासरत है। हालांकि यह भी सच है कि यह अत्यंत अस्थिर और जोखिम भरी परिसंपत्ति है। यह भी सच है कि कई धोखेबाज जल्दी पैसे कमाने के लिए भी क्रिप्टोकरेंसी जारी करते हैं। ऐसी परिसंपत्तियों का इस्तेमाल साइबर अपराधों में भी हो सकता है।
हालांकि ये कमियां जगजाहिर हैं लेकिन इनकी मौजूदगी नकारी नहीं जा सकती। बीते दशक के तमाम वैश्विक वित्तीय संकटों के बीच इन्होंने अपना अस्तित्व बचाए रखा। कई निवेशक इन्हें मुद्रास्फीति के जोखिम और नोटबंदी जैसे जोखिम से बचाव के रूप में भी देखते हैं। कई आभासी मुद्राओं ने जबरदस्त प्रतिफल दिया है। यह दलील भी है कि मुद्रा परिवर्तनीयता के अवरोध हटाकर तथा हस्तांतरण और धनप्रेषण को सहज बनाकर ये आभासी मुद्राएं प्रेषण शुल्क में कमी लाएंगी तथा स्थानांतरण प्रक्रिया को तेज करेंगी। कई भारतीय इन मुद्राओं में सदिच्छा से कारोबार कर रहे हैं इसलिए इन पर प्रतिबंध लगाना उचित नहीं होगा। बिना कड़े मुद्रा नियंत्रण के प्रतिबंध असंभव भी होगा। मुद्रा नियंत्रण लगाने का प्रयास बहुत पुरातनपंथी होगा। इससे आयातकों, निर्यातकों और विदेश में रहने वाले छात्रों को दिक्कत होगी। ऐसे में बेहतर होगा कि नीति निर्माता इनसे जुड़ी व्यापक योजना पेश करें। इससे न केवल केंद्रीय बैंक को वित्तीय स्थिरता से जुड़े जोखिम से बचाव और निवेशकों के हितों का बचाव करने में मदद मिलेगी, बल्कि कर को लेकर भी हालात स्पष्ट होंगे। अगर सरकार निवेशकों को इनसे जुड़े जोखिम को लेकर जागरूक करने के अभियान चलाए तो और भी अच्छा होगा।