भारतीय रिजर्व बैंक ने विदेशी उधारी को प्रोत्साहन देकर रुपये को सहारा देने के लिए पिछले हफ्ते कई उपायों की घोषणा की। वे उपाय अभी तक तो कारगर नजर आ रहे हैं और रुपया ठहर गया है। लेकिन बड़ा प्रश्न यह है कि यह स्थिरता बनी रहेगी या नहीं। उत्तर इस बात पर निर्भर करता है कि समस्या स्थायी है या अस्थायी। अगर अस्थायी है तो रिजर्व बैंक की रणनीति समझ में आती है। जब तक स्थिति नहीं सुधरती तब तक उधारी के जरिये डॉलर की किल्लत खत्म की जा सकती है। लेकिन समस्या स्थायी है तो उधारी उस बदलाव को कुछ समय तक टाल भर सकती है। आखिर में यही समस्या लौट आएगी और तब देश को ज्यादा नाजुक हालत में रहकर उससे निपटना होगा क्योंकि उस बीच में बहुत कर्ज चढ़ चुका होगा।
तो क्या यह समस्या अस्थायी है? हां, मगर थोड़ी बहुत। पश्चिम एशिया में जंग छिड़ने से तेल की कीमतें उछल पड़ी हैं। इससे आयात पर होने वाला भारत का खर्च बढ़ गया है और भुगतान संतुलन पर दबाव उत्पन्न हुआ है। परंतु यह समस्या का केवल छोटा सा हिस्सा है। अगर तनाव कुछ और महीने चलता रहा और तेल की कीमतें वापस 100 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गईं तो भी भारत का चालू खाते का घाटा सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी के 2 फीसदी की पुरानी सुरक्षित सीमा में रह सकता है।
बड़ी समस्या पूंजी खाते में है। 1991 के सुधारों के बाद लंबे समय तक भारत ने काफी विदेशी पूंजी आकर्षित की। 2000 के दशक के मध्य में जब निवेश बढ़ा तो इतनी अधिक पूंजी आई कि उससे चालू खाते के घाटे (सीएडी) को भरपाई तो आसानी से हो ही गई, रिजर्व बैंक के पास विदेशी मुद्रा भंडार भी जमा हो गया। यही कारण है कि जीडीपी का लगभग 2 प्रतिशत चालू खाते का घाटा सुरक्षित माना जाने लगा। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में पूंजी की आवक लगातार कम हुई है और इस समय जितनी विदेशी पूंजी आ रही है, उससे चालू खाते का मामूली घाटा भी नहीं पाटा जा सकता।
विदेशी पूंजी का महत्त्व एक और कारण से भी है। सरकार का लक्ष्य भारत को 2047 तक विकसित राष्ट्र बनाना है और इसके लिए अर्थव्यवस्था को अगले दो दशकों तक हर वर्ष लगभग 8 प्रतिशत की वास्तवकि वृद्धि करनी होगी। इसे हासिल करने के लिए और भी अधिक निवेश की आवश्यकता होगी। केवल घरेलू बचत पर्याप्त नहीं होगी। इसलिए इस अंतर का कुछ हिस्सा विदेशी पूंजी की मदद से भी पाटा जाएगा।
क्रमिक पूंजी-उत्पादन अनुपात (आईसीओआर) पर विचार कीजिए। इससे पता चलता है कि जीडीपी में एक रुपया अधिक उत्पन्न करने के लिए कितने रुपये निवेश करने होंगे। भारत का आईसीओआर लंबे समय से 4.5 से 5 के बीच रहा है। यही दर रही तो जीडीपी में 8 प्रतिशत वार्षिक की वास्तविक वृद्धि के लिए हर वर्ष जीडीपी का 36 से 40 प्रतिशत निवेश करना होगा।
आज भारत की कुल बचत जीडीपी की लगभग 30 प्रतिशत है और निवेश भी इतना ही है। इसलिए निवेश का जो स्तर उच्च वृद्धि बनाए रखने के लिए आवश्यक है, वहां तक पहुंचने के लिए हर साल 6 से 10 प्रतिशत जीडीपी और निवेश करना होगा। आज जीडीपी लगभग 4 लाख करोड़ डॉलर है। इस हिसाब से केवल 6 प्रतिशत भी निवेश करें तो सालाना लगभग 240 अरब डॉलर लगाने होंगे। जब तक घरेलू बचत पर्याप्त नहीं बढ़ जाती तब तक भारत को यह कमी पूरी करने के लिए विदेशी पूंजी की ही आवश्यकता होगी।
अब यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि भारत अधिक विदेशी पूंजी कैसे ला पाएगा। रिजर्व बैंक का 5 जून का पैकेज और विशेष रूप से विदेशी निवेशकों की बॉन्ड खरीद पर पूंजीगत लाभ कर हटाना सही दिशा में एक कदम है। लेकिन और भी बहुत कुछ करने की आवश्यकता है। उदाहरण के लिए प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) को बढ़ावा देने के लिए अभी तक कुछ नहीं किया गया है। यह मायने रखता है क्योंकि एफडीआई न केवल पोर्टफोलियो निवेश से अधिक स्थिर होता है बल्कि तकनीक और वैश्विक उत्पादन नेटवर्क भी उपलब्ध कराता है, जिसकी प्रतिस्पर्द्धी विनिर्माण क्षेत्र बनाने के लिए भारत को बहुत आवश्यकता है।
एफडीआई की आवक बढ़ाने के लिए तीन नीतिगत कदम महत्वपूर्ण हैं। पहला है भारत के व्यापार शासन को उदार बनाना। आयात शुल्क कम करने होंगे, सीमाशुल्क संरचना आसान बनानी होगी और विनिर्माताओं के लिए सामग्री का आयात मुश्किल बनाने वाले मात्रा नियंत्रण आदेश खत्म करने होंगे।
दूसरा, नीति-निर्माताओं को द्विपक्षीय निवेश संधियों का नेटवर्क फिर बनाना होगा, जिसे 2016 से 2024 के बीच पूरी तरह समाप्त कर दिया गया था। कारखाना लगाने के लिए लंबे समय तक भारी निवेश करना पड़ता है। विदेशी निवेशक इसका बीड़ा तभी उठाएंगे, जब उन्हें विश्वास होगा कि विवादों का निपटारा भरोसेमंद तथा ज्ञात कानूनी प्रक्रिया से होगा।
तीसरा, नीतिगत स्थिरता आवश्यक है। दीर्घकालिक निवेश करने वाले निवेशकों को यह भरोसा चाहिए कि उनके निवेश करने के बाद नियम नहीं बदलेंगे। पुरानी तारीख से कर लगाने पर वोडाफोन के साथ हुआ विवाद उस भरोसे को ठेस पहुंचाई। हालांकि उसके बाद से सरकार इस तरह का कर लगाने से मना कर चुकी है किंतु नीतियों में हाल में हुई उलटबांसी के कारण वे चिंताएं बनी हुई हैं। रिजर्व बैंक का मार्च का निर्णय इसका उदाहरण है, जिसमें बैंकों को करोड़ों डॉलर की अपनी ऑफशोर फॉरवर्ड पोजिशन खत्म करनी थी। नीति उचित रही हो या नहीं रही हो, इस तरह के अप्रत्याशित बदलाव से भारत में निवेश ज्यादा जोखिम भरा लगने लगता है।
रिजर्व बैंक के जून के उपायों ने भारत को कुछ मोहलत दी है। उस मोहलत का समझदारी से उपयोग करना अब चुनौती है। भारत को विदेशी पूंजी विशेषकर एफडीआई आकर्षित करने के लिए स्थायी रणनीति चाहिए। इसके लिए भारत में निवेश आसान बनाना होगा, निवेशकों को पहले से ज्ञात नियमों के जरिये सुरक्षा देनी होगी और निवेश के बाद नीतिगत पलटियों से बचना होगा।
भारतीय नीति निर्माता विदेशी पूंजी आने की गारंटी नहीं दे सकते। लेकिन वे सुनिश्चित कर सकते हैं कि पूंजी दूर रहने का कोई कारण नहीं हो।
(लेखिका आईजीआईडीआर, मुंबई में अर्थशास्त्र की एसोसिएट प्रोफेसर हैं। लेख में उनके निजी विचार हैं)