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सिर्फ सुरक्षा नहीं, भू-अर्थशास्त्र के नए दौर में भारत को चाहिए स्पष्ट आर्थिक सुरक्षा रणनीति

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बदलते भू-राजनीतिक माहौल में भारत को सुरक्षा और जन-कल्याण दोनों उद्देश्यों को एक साथ साधने के लिए एक सुसंगत 'आर्थिक सुरक्षा रणनीति' बनाने की सख्त जरूरत है

Last Updated- July 17, 2026 | 10:07 PM IST
Economics
प्रतीकात्मक तस्वीर | फाइल फोटो

लंबे समय से, आर्थिक नीति दुनिया भर में ज्यादा मूल्य तैयार करने और लोगों की भलाई को बढ़ावा देने का एक जरिया रही है। लेकिन अब सरकारों को विवश होकर आर्थिक नीति को सुरक्षा या यहां तक कि प्रभुत्व हासिल करने के साधन के रूप में इस्तेमाल करना पड़ रहा है। भू-राजनीतिक दबावों ने यह सुनिश्चित कर दिया है कि मूल्य सृजन के लिए बनाए गए आर्थिक साधन अब संपदा तक पहुंचने या उससे भी बुरा कहें तो उसे नष्ट करने के लिए उपयोग किए जा रहे हैं।

सरल शब्दों में कहें तो भू-अर्थशास्त्र का अर्थ है राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए आर्थिक साधनों का उपयोग। चीन तथा अमेरिका के मामले में तो यह वैश्विक प्रभुत्व तक जाता है। समस्या यह है कि मूल्य सृजन के लिए बनाए गए ये उपकरण न तो सुरक्षा प्रदान करने में अच्छे हैं और न ही आर्थिक प्रभुत्व सुनिश्चित करने में। इन्हें सही ढंग से लक्षित करना कठिन है और इन्हें सीमित करना असंभव। सबसे बुरी बात यह है कि इनकी प्रवृत्ति उपयोगकर्ता और लक्ष्य दोनों को नुकसान पहुंचाने की होती है।

अपनी तमाम स्वघोषित सफलताओं के बावजूद अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप अपनी ही जनता को संतुष्ट नहीं कर पा रहे हैं क्योंकि उनकी नीतियों ने महंगाई के हालात बना दिए हैं। यही स्थिति शी चिनफिंग की भी है क्योंकि चीनी प्रभुत्व जताने की उनकी जल्दबाजी ने भारत समेत कई देशों को व्यापार और निवेश के मोर्चे पर सख्ती बरतने पर मजबूर कर दिया है। आज चीन को सबसे अधिक जरूरत वैश्विक बाजारों की है और उसकी नीतियों ने उसे उन्हीं बाजारों से वंचित कर दिया है जिनकी उसे सबसे अधिक आवश्यकता है।

जो बात ट्रंप और शी चिनफिंग तथा उनके प्रभुत्व की आवश्यकता पर लागू होती है वही छोटे देशों पर भी लागू होती है जिन्हें अपनी सुरक्षा के लिए ऐसे ही उपकरणों या साधनों का उपयोग करना पड़ेगा। औद्योगिक नीति और इसी तरह के उपायों का गलत उपयोग उसी अर्थव्यवस्था को गंभीर नुकसान पहुंचा सकता है जिसे हम बढ़ावा देना चाहते हैं। दुनिया भर में ऐसे कई उदाहरण मौजूद हैं। भारत का स्वयं का 1991 से पहले का अनुभव इस बात से भरा पड़ा है कि सरकार द्वारा बड़े पैमाने पर संसाधन डालने के बावजूद नतीजे में केवल राजकोषीय दबाव ही सामने आया।

कई लोगों का मानना है कि संभावित नुकसान के बावजूद भू-अर्थशास्त्र भारत के लिए बड़े अवसर ला सकता है। वे पूरी तरह गलत भी नहीं हैं। वर्तमान और उभरती हुई कई संभावनाएं हैं जहां भारत सामरिक आर्थिक उपकरणों का उपयोग करके अधिक आजीविका और कल्याण पैदा कर सकता है। साथ ही वह भू-राजनीतिक लक्ष्यों को भी हासिल कर सकता है। लेकिन ऐसा करने के लिए भारत को एक सुसंगत दृष्टि की आवश्यकता है जिसमें सरकार और बाहर के कई हितधारकों की सहमति शामिल हो।

दूसरे शब्दों में कहें तो अब समय आ गया है कि भारत के पास एक आर्थिक सुरक्षा रणनीति हो। लेकिन सामान्य सुरक्षा सिद्धांतों का उद्देश्य जहां सुरक्षा और प्रभाव होता है वहीं भारत की आर्थिक सुरक्षा रणनीति का उद्देश्य सभी के लिए बेहतर खुशहाली पैदा करते हुए वैसी ही सुरक्षा हासिल करना होना चाहिए।। यह अंतर महत्त्वपूर्ण है। यदि आजीविका और कल्याण को स्पष्ट रूप से ऐसे सिद्धांत में शामिल नहीं किया गया तो खतरा है कि संसाधनों और प्रयासों का बड़ा हिस्सा सुरक्षा उद्देश्यों में लग जाए।

सुरक्षा तो हासिल हो सकती है लेकिन विकास प्रक्रिया पर इसकी एक दीर्घकालिक लागत भी नजर आ सकती है। इसमें कोई संदेह नहीं कि गंभीर बहुक्षेत्रीय सुरक्षा आवश्यकताएं मौजूद हैं और भविष्य में इनके बढ़ने की संभावना है।

हमें दो मोर्चों पर अधिक मेहनत करनी होगी। पहला, उन सामान्य तत्वों को खोजना जहां सुरक्षा और कल्याण के उद्देश्य मिलते हों। उदाहरण के लिए जैव ईंधन। भारत के खेतों से मिलने वाले जैव ईंधन अधिक ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित कर सकते हैं और किसानों को आय भी दे सकते हैं। लेकिन यदि वे खाद्य पदार्थों का उपभोग करें या उन्हें प्रतिस्थापित करें तो इससे खाद्य सुरक्षा कमजोर पड़ जाएगी। ऐसी नीति जो कृषि अपशिष्ट से कम लागत वाले जैव ईंधन विकल्पों को बढ़ावा दे वह दोनों उद्देश्यों को हासिल करने में मदद कर सकती है। हालांकि ऐसे कम लागत वाले कृषि अपशिष्ट विकल्पों के लिए प्रारंभ में अधिक शोध एवं विकास, अलग प्रकार का बुनियादी ढांचा और पर्यावरणीय उद्देश्यों के अनुरूप आपूर्ति श्रृंखला की आवश्यकता होगी। 

दूसरा, भारत के आर्थिक सुरक्षा उद्देश्यों को सबसे अच्छी तरह तब पूरा किया जा सकता है जब विभिन्न क्षेत्र मिलकर काम करें। जिन विशिष्ट बिंदुओं पर कार्रवाई की आवश्यकता है उनमें आपूर्ति श्रृंखला, महत्त्वपूर्ण बुनियादी ढांचा, डेटा केबल और पाइपलाइन आदि शामिल हैं। सरकार के भीतर अंतर-विभागीय समन्वय स्पष्ट रूप से आवश्यक है। साथ ही कूटनीति को भी वैश्विक साझेदारियां बनाने और नए प्रकार की सहयोगी आर्थिक व्यवस्थाएं विकसित करने में अपनी भूमिका बढ़ानी होगी। हाल ही में द्विपक्षीय मुक्त व्यापार समझौतों में मिली सफलताएं इसका उदाहरण हैं।

भारत पहले से ही अपनी सुरक्षा और संरक्षण के लिए कई साधनों का उपयोग कर रहा है। कुछ वर्तमान और संभावित साधनों में व्यापार नीति उपाय जैसे शुल्क, निर्यात नियंत्रण, मुक्त व्यापार समझौते, चयनात्मक निवेश नियंत्रण, दोहरे उपयोग वाली तकनीक की सीमाएं और कुछ क्षेत्रों को प्राथमिकता देने वाली औद्योगिक नीति शामिल हैं। इसके साथ ही हमें एक व्यापक शोध एवं विकास ढांचा जोड़ना होगा जिसमें कहीं अधिक संसाधन हों और शोध-विकास संस्थानों से बहुत विशिष्ट मांगें की जाएं। साथ ही, अधिक चयनात्मक प्रतिस्पर्धा की आवश्यकता होगी। विशेषकर उन क्षेत्रों में जहां भारत वैश्विक नेतृत्व की आकांक्षा रखता है। 

दूसरे शब्दों में भारत जितना अधिक हासिल करना चाहता है और उसे जितने अधिक भू-राजनीतिक लाभ की आवश्यकता है, अर्थव्यवस्था के स्तर पर उतना ही ज्यादा तालमेल जरूरी है। प्रस्तावित आर्थिक सुरक्षा रणनीति इसी आवश्यकता को संबोधित करती है क्योंकि यह विभिन्न संस्थाओं के लिए एक साझा ढांचा सार्वजनिक करती है ताकि वे समन्वय कर सकें।

भविष्य की बात करें तो आर्थिक समृद्धि पहल की तुलना में सुरक्षा से कहीं अधिक गहराई से जुड़ी होगी। लेकिन बढ़ती सुरक्षा आवश्यकताएं दक्षता और उत्पादकता की कीमत पर नहीं होनी चाहिए। इसलिए भारत के लिए यह महत्त्वपूर्ण है कि वह ऐसी आर्थिक सुरक्षा नीति विकसित करे जो दोनों उद्देश्यों यानी सुरक्षा और कल्याण को हासिल करने का प्रयास करे।

(लेखक सेंटर फॉर सोशल ऐंड इकनॉमिक प्रोग्रेस के प्रमुख हैं। ये उनके निजी विचार हैं)

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First Published - July 17, 2026 | 10:07 PM IST

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