ITR Filing 2026: भारतीय शेयर बाजार में हाल के दिनों में रिटेल निवेशकों की संख्या में भारी उछाल देखने को मिला है। सुबह बाजार खुलते ही कंप्यूटर और मोबाइल स्क्रीन पर उंगलियां थिरकने लगती हैं। कुछ ही घंटों में लाखों-करोड़ों रुपये का लेन-देन हो जाता है। इस पूरी दौड़-भाग में सबसे ज्यादा आकर्षण ‘इंट्रा-डे ट्रेडिंग’ का होता है, जहां लोग उसी दिन शेयर खरीदते हैं और बाजार बंद होने से पहले उन्हें बेचकर मुनाफा कमाने की कोशिश करते हैं।
लेकिन एक्सपर्ट का मानना है कि इंट्रा-डे ट्रेडिंग में जल्दी मुनाफा कमाने का मौका तो मिलता है, लेकिन इसके साथ टैक्स के नियमों को समझना भी उतना ही जरूरी है। कई लोग ट्रेडिंग तो करते हैं, लेकिन टैक्स के बारे में पूरी जानकारी नहीं होने की वजह से बाद में परेशानी का सामना करते हैं। असली चुनौती तब आती है, जब इनकम टैक्स रिटर्न (ITR) भरने का समय होता है। इसलिए इंट्रा-डे ट्रेडिंग करते हैं, तो यह जानना जरूरी है कि आपके मुनाफे को टैक्स के नजरिए से कैसे देखा जाता है और उस पर टैक्स कैसे लगता है।
इंट्रा-डे ट्रेडिंग को लेकर सबसे बड़ी गलतफहमी यही है कि इससे होने वाला मुनाफा भी शेयरों में निवेश से होने वाले कैपिटल गेन की तरह माना जाएगा। जबकि ऐसा नहीं है। टैक्स के नियम इंट्रा-डे ट्रेडिंग को निवेश नहीं, बल्कि एक तरह की बिजनेस इनकम मानते हैं। यानी इस पर टैक्स के नियम भी कैपिटल गेन से अलग लागू होते हैं।
क्लियरटैक्स की टैक्स एक्सपर्ट CA चांदनी आनंदन कहती हैं, “इंट्रा-डे ट्रेडिंग से होने वाली कमाई को टैक्स के लिहाज से कैपिटल गेन नहीं, बल्कि बिजनेस इनकम माना जाता है। यानी इसे ‘Profits and Gains from Business or Profession’ के तहत टैक्स किया जाता है। खास बात यह है कि इंट्रा-डे ट्रेडिंग से होने वाला मुनाफा ‘स्पेक्युलेटिव बिजनेस इनकम’ के तहत आता है, इसलिए इस पर टैक्स के नियम भी सामान्य शेयर निवेश से अलग होते हैं।”
इसके पीछे वजह भी आसान है। आनंदन के मुताबिक, इंट्रा-डे ट्रेडिंग में शेयरों की खरीद और बिक्री एक ही दिन में हो जाती है और शेयरों की वास्तविक डिलीवरी नहीं ली जाती। इसलिए टैक्स कानून इसे निवेश नहीं, बल्कि सट्टा (Speculative) कारोबार मानता है। यही वजह है कि इससे होने वाली कमाई को कैपिटल गेन नहीं, बल्कि बिजनेस इनकम के तौर पर दिखाना पड़ता है।
एसके पटोडिया एंड एसोसिएट्स LLP में एसोसिएट डायरेक्टर (डायरेक्ट टैक्सेस) मिहिर तन्ना भी यही बात दोहराते हैं। उनके मुताबिक, इंट्रा-डे ट्रेडिंग में शेयरों की पूरी तरह डिलीवरी नहीं होती, इसलिए टैक्स नियमों के तहत इसे ‘स्पेक्युलेटिव बिजनेस’ माना जाता है। इसी वजह से इससे होने वाली कमाई को बिजनेस इनकम के तहत दिखाना होता है, न कि कैपिटल गेन के रूप में।
शेयर बाजार में कई तरह से काम किया जाता है। कोई लंबे समय के लिए पैसे लगाता है, तो कोई रोज शेयर खरीदता और बेचता है। ऐसे में क्या हर मुनाफे पर एक ही दर से टैक्स लगेगा? इसका जवाब है, बिल्कुल नहीं। टैक्स की दुनिया में आपके काम करने के तरीके से तय होता है कि आपकी जेब से कितना टैक्स जाएगा।
मिहिर तन्ना इस बारे में विस्तार से बताते हुए कहते हैं, “शेयर बाजार से होने वाले मुनाफे का टैक्स पूरी तरह से इस बात पर निर्भर करता है कि आपने किस तरह का सौदा किया है। इसे अलग-अलग श्रेणियों में बांटा जा सकता है, जिसमें ‘स्पेक्युलेटिव बिजनेस इनकम’, ‘नॉन-स्पेक्युलेटिव बिजनेस इनकम’ और ‘शॉर्ट-टर्म’ या ‘लॉन्ग-टर्म कैपिटल गेन्स’ शामिल हैं। इन सभी श्रेणियों के लिए टैक्स की दरें और नुकसान की भरपाई से जुड़े नियम एकदम अलग हैं।”
इस बात को आगे बढ़ाते हुए चांदनी आनंदन कहती हैं कि अगर आपने शेयर खरीदे और उन्हें अपने डीमैट खाते में डिलीवरी लेकर कुछ दिन या महीने बाद बेचा, तो उस मुनाफे को कैपिटल गेन माना जाएगा। वहीं, दूसरी तरफ अगर आपने बिना डिलीवरी लिए उसी दिन सौदा काट दिया, तो वह स्पेक्युलेटिव बिजनेस इनकम बन जाएगी।
इसके अलावा, फ्यूचर्स और ऑप्शंस यानी F&O के तहत किए जाने वाले काम को ‘नॉन-स्पेक्युलेटिव बिजनेस इनकम’ की श्रेणी में रखा जाता है। इस प्रकार, एक ही व्यक्ति को शेयर बाजार के अलग-अलग लेन-देन के लिए अलग-अलग टैक्स हेड के तहत अपना इनकम बताना होता है।
ट्रेडिंग की दुनिया में केवल मुनाफा ही नहीं होता, बल्कि कई बार भारी नुकसान का सामना भी करना पड़ता है। जब नुकसान होता है, तो ट्रेडर सोचते हैं कि वे इसे अपनी नौकरी की सैलरी या किसी अन्य बिजनेस के मुनाफे से घटाकर अपना टैक्स बचा लेंगे। लेकिन टैक्स के नियमों में ऐसा करना संभव नहीं है।
आनंदन आगाह करती हैं कि इंट्रा-डे ट्रेडिंग में होने वाले नुकसान को ‘सट्टा प्रकृति’ (स्पेक्युलेटिव) जैसा माना जाता है। ऐसे नुकसान को सैलरी, हाउस प्रॉपर्टी से होने वाली आय या किसी दूसरे सामान्य बिजनेस के मुनाफे के साथ एडजस्ट नहीं किया जा सकता। इसे सिर्फ किसी दूसरे स्पेक्युलेटिव (सट्टा) मुनाफे के खिलाफ ही सेट-ऑफ किया जा सकता है। इसलिए अगर नुकसान की सही कैटेगरी नहीं चुनी गई, तो सख्त नियमों की वजह से उसे बाद में एडजस्ट करना संभव नहीं होगा।
मिहिर तन्ना बताते हैं कि इंट्रा-डे ट्रेडिंग में हुआ नुकसान सिर्फ दूसरे स्पेक्युलेटिव (सट्टा) कारोबार से हुए मुनाफे के खिलाफ ही सेट-ऑफ किया जा सकता है। अगर पूरे साल में यह नुकसान पूरी तरह एडजस्ट नहीं हो पाता, तो इसे अधिकतम चार टैक्स वर्षों तक आगे (कैरी फॉरवर्ड) ले जाया जा सकता है। लेकिन इसके लिए एक अहम शर्त है। यह सुविधा तभी मिलेगी, जब आप अपना इनकम टैक्स रिटर्न (ITR) तय आखिरी तारीख (ड्यू डेट) तक या उससे पहले फाइल करें। अगर रिटर्न देर से फाइल किया जाता है, तो इस नुकसान को आगे ले जाने का अधिकार खत्म हो जाता है।
एक इंट्रा-डे ट्रेडर के लिए सबसे बड़ा सिरदर्द यह समझना होता है कि उसका टर्नओवर कितना है। कई लोग मान लेते हैं कि जितने रुपये के शेयर खरीदे और बेचे, वह पूरा जोड़ उनका टर्नओवर है, जो कि सरासर गलत है।
मिहिर तन्ना बताते हैं कि इंट्रा-डे ट्रेडिंग में टर्नओवर निकालने का तरीका सामान्य कारोबार से अलग होता है। आईसीएआई की टैक्स ऑडिट गाइडलाइंस के मुताबिक, हर ट्रेड में हुए मुनाफे और नुकसान के एब्सोल्यूट (Absolute) वैल्यू को जोड़कर टर्नओवर निकाला जाता है। यानी मुनाफे और नुकसान को आपस में एडजस्ट नहीं किया जाता, बल्कि दोनों के कुल आंकड़े जोड़े जाते हैं। इसी टर्नओवर के आधार पर तय होता है कि ट्रेडर के लिए टैक्स ऑडिट जरूरी है या नहीं। साथ ही, ट्रेडर्स को अपने सभी लेनदेन और खातों का सही रिकॉर्ड यानी बुक्स ऑफ अकाउंट्स भी व्यवस्थित तरीके से रखना चाहिए।
जबकि आनंदन के मुताबिक, इंट्रा-डे ट्रेडर्स को अपने ब्रोकर स्टेटमेंट, ट्रेड समरी और दूसरे जरूरी रिकॉर्ड संभालकर रखने चाहिए। टर्नओवर का कैलकुलेशन भी सावधानी से करनी चाहिए, क्योंकि इसी के आधार पर कई टैक्स नियम तय होते हैं। चूंकि इंट्रा-डे ट्रेडिंग से होने वाली कमाई बिजनेस इनकम मानी जाती है, इसलिए ऐसे मामलों में आमतौर पर ITR-3 फॉर्म भरा जाता है। वहीं, अगर टर्नओवर तय सीमा से ज्यादा है और टैक्स ऑडिट के नियम लागू होते हैं, तो सभी जरूरी टैक्स अनुपालन (Compliance) समय पर पूरा करना बेहद जरूरी है।
अक्सर लोग टैक्स बचाने की होड़ में या जानकारी न होने के कारण अपनी इनकम को गलत हेड में दिखा देते हैं। लेकिन ऐसा करना भारी पड़ सकता है क्योंकि इनकम टैक्स डिपार्टमेंट अब आधुनिक तकनीक की मदद से हर एक लेनदेन पर पैनी नजर रखता है।
आनंदन के मुताबिक, कई ट्रेडर्स डिलीवरी वाले शेयर निवेश और इंट्रा-डे ट्रेडिंग को अलग-अलग दिखाने के बजाय एक साथ रिपोर्ट कर देते हैं। यही सबसे आम गलती है। अगर इन दोनों तरह के लेनदेन का साफ-साफ नहीं बांटा जाता, तो इनकम टैक्स डिपार्टमेंट इस पर सवाल उठा सकता है। ऐसे मामलों में डिपार्टमेंट नोटिस भेजकर यह पूछ सकता है कि आपने अपनी कमाई को किस आधार पर किसी खास इनकम हेड में दिखाया है।
मिहिर तन्ना के मुताबिक, टैक्स डिपार्टमेंट सिर्फ आपकी ओर से चुने गए इनकम हेड को नहीं देखता, बल्कि यह भी जांचता है कि आपके लेनदेन उससे मेल खाती है या नहीं। इसके लिए डिपार्टमेंट कई बातों पर ध्यान देता है, जैसे आप कितनी बार ट्रेडिंग करते हैं, शेयरों को कितने समय तक होल्ड करते हैं और आपका मकसद निवेश करना था या नियमित ट्रेडिंग करना। अगर आपके दावे और वास्तविक ट्रेडिंग पैटर्न में फर्क दिखाई देता है, तो डिपार्टमेंट आपके इनकम क्लासिफिकेशन पर सवाल उठा सकता है और स्पष्टीकरण मांग सकता है।