राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरदचंद्र पवार) या राकांपा (एसपी) के पास लोक सभा में आठ सांसद, राज्य सभा में एक सांसद और महाराष्ट्र विधान सभा में 10 विधायक हैं। दलबदल निरोधक कानून के तहत अयोग्यता से बचने और अपनी सदस्यता न खो देने के लिए कम से कम छह सांसदों को दलबदल करना होगा।
पार्टी के दिग्गज नेता शरद पवार ने कथित तौर पर वार्ताकारों से कहा, ‘जब सभी नौ मिल सकते हैं तो छह ही क्यों लेना?’ यह बात उन्होंने संविधान (131वां संशोधन) विधेयक, 2026 के पारित होने के लिए समर्थन मांगने पर कही। यह विधेयक परिसीमन विधेयक, 2026 और केंद्र शासित प्रदेश कानून (संशोधन) विधेयक, 2026 सहित तीन विधेयकों के पैकेज का मुख्य संवैधानिक हिस्सा है, जिसे सरकार ने अप्रैल में पेश किया था लेकिन बहुमत की कमी के कारण पारित नहीं कर सकी थी।
पूरी संभावना है कि राकांपा (एसपी) अपने समर्थकों और प्रतिष्ठा को बचाए रखने के वास्ते तथा शिवसेना (उद्धव ठाकरे) और तृणमूल कांग्रेस की तरह पतन से बचने के लिए विधेयकों के पक्ष में मतदान करेगी। संसद में तृणमूल कांग्रेस की हालत बहुत खराब है। उसके सदस्य भाजपा में शामिल नहीं हुए, लेकिन उन्होंने एक नई पार्टी बना ली है। शिवसेना के सांसदों ने भाजपा में शामिल होने के लिए पार्टी छोड़ दी।
असल बात यह है कि अब उनमें से कोई भी उस पार्टी का सदस्य नहीं है जिसने उन्हें संसद भेजा था। पवार ने अपनी पार्टी को इस तरह के प्रयासों से बचा लिया है, भले ही इसका मतलब ‘इंडिया’ गठबंधन में अपने सहयोगियों को धोखा देना हो। इज्जत बचाने के लिए कुछ ‘शर्तें’ रखी गई हैं: राकांपा (एसपी) तभी विधेयकों के पक्ष में मतदान करेगी जब प्रत्येक राज्य से भेजे जाने वाले सांसदों की संख्या में 50 फीसदी की वृद्धि की जाएगी।
गृह मंत्री अमित शाह पहले ही कह चुके हैं कि वे एक संशोधित विधेयक पेश करेंगे जिससे प्रत्येक राज्य की संसदीय सीटों की कुल संख्या में वृद्धि होगी, इसलिए यह ‘शर्त’ सरासर बेबुनियाद है।
शरद पवार भाजपा के साथ नजदीकियां पहली बार नहीं बढ़ा रहे हैं। वर्ष 1978 में, जब उन्होंने कांग्रेस के नेतृत्व वाली वसंतदादा पाटिल गठबंधन सरकार को गिरा दिया और कई वामपंथी झुकाव वाले विधायकों के साथ सत्ता छोड़कर समानांतर कांग्रेस का गठन किया और 38 वर्ष की आयु में मुख्यमंत्री बने, तब जनसंघ सरकार का हिस्सा था। आरएसएस-जनसंघ के प्रमुख सदस्य उत्तमराव पाटिल मंत्री बने। दोनों पक्षों के बीच आपसी सम्मान है।
वर्ष 2016 में, राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता के चरम पर एक सार्वजनिक कार्यक्रम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था: ‘पवार ने विधायक या सांसद के रूप में 50 वर्ष पूरे कर लिए हैं, जो भारतीय राजनीति में अपने आप में एक उपलब्धि हैं। मुझे यह स्वीकार करने में कोई संकोच नहीं है कि पवार ने गुजरात में मेरे शुरुआती दिनों में मेरा हाथ थामा और मुझे चलना सिखाया।’
भाजपा का एक बड़ा वर्ग पवार से नफरत कर सकता है, लेकिन वह यह भी मानता है कि पवार आधुनिक महाराष्ट्र के निर्माताओं में से एक हैं और जीवन के इस पड़ाव पर उनका राजनीतिक अपमान राज्य में स्वीकार्य नहीं होगा।
मौजूदा राजनीतिक हालात को लेकर पवार चाहे जो भी राय रखते हों, वह अपने समर्थकों की मजबूरियों से वाकिफ हैं। जितेंद्र आव्हाड और रोहित पवार समेत उनकी पार्टी के कई विधायकों और सांसदों के निर्वाचन क्षेत्रों में अल्पसंख्यक आबादी काफी अधिक है। वे भाजपा के सामने झुककर इस सद्भावना को खोना नहीं चाहते। पार्टी के दलित समर्थकों के लिए भी इस कदम का समर्थन करना मुश्किल होगा। इन वर्गों के नेता ही विरोध कर रहे हैं, जबकि बड़ी संख्या में लोग तर्क दे रहे हैं कि इंडिया गठबंधन में रहने के बजाय राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) का हिस्सा बनना बेहतर है। हमेशा की तरह चतुराई से शरद पवार दोनों वर्गों को खुश रख रहे हैं।
जनवरी में अजित पवार के शरद पवार के नेतृत्व वाली राकांपा से अलग होकर भाजपा के साथ गठबंधन करने और बाद में एक दुर्घटना में अजित पवार की अचानक मृत्यु हो जाने के बाद, विलय का मुद्दा सामने आया। इस दुर्घटना के बाद राकांपा के अजित गुट के विकास और प्रगति के लिए कोई स्पष्ट दिशा नहीं बची। उनकी पत्नी सुनेत्रा, जिन्हें गुट का अध्यक्ष घोषित किया गया है, और उनके चंचल स्वभाव वाले बेटे पार्थ पवार खुद को गुट का संरक्षक मानते हैं।
हालांकि, कार्यकारी अध्यक्ष प्रफुल्ल पटेल और नेता सुनील तटकरे ने कुछ दिन पहले कहा था कि अजित पवार की मृत्यु से पैदा हुए ‘शून्य’ को भरना आसान नहीं है और पार्थ पवार द्वारा उठाए गए कुछ कदमों पर नाराजगी के मद्देनजर ‘सुधारात्मक उपाय’ करने की आवश्यकता है। गुट तोड़ना मुश्किल होता है, खासकर जब सत्ता और नियंत्रण के मुद्दे भी इसमें शामिल हों।
फिलहाल शरद पवार सिर्फ देख रहे हैं और चुपचाप बैठे हैं। अगर वह विलय करवाकर दोनों गुटों को राजग में शामिल कर लें तो सभी के लिए बहुत आसानी होगी। लेकिन भाजपा के अधीन रहना पवार की छवि को काफी कमजोर कर देगा। शिवसेना की छवि तो पहले ही धूमिल हो चुकी है। पवार अपनी बची-खुची राजनीतिक साख भाजपा को सौंपना नहीं चाहते।
89 वर्ष की आयु में शरद पवार एक परिपक्व लेकिन उम्रदराज कलाबाज की तरह हैं, जो यह आकलन कर रहे हैं कि क्या वह ‘इंडिया’ गठबंधन के सुरक्षित ठिकाने से राजग में छलांग लगाने पर भी सफल हो पाएंगे। क्या इस बड़े विश्वासघात को एक रणनीतिक चाल के रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है? शरद पवार के अगले कदम पर नजर रखिए।