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भारत को ESG डिस्क्लोजर ग्लोबल रिपोर्टिंग मानकों के अनुरूप करने चाहिए

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भारत को अपने ईएसजी रिपोर्टिंग मानकों को वैश्विक स्तर पर स्वीकार्य मानकों के अनुरूप बनाने की जरूरत है ताकि निवेश आकर्षित किया जा सके। बता रहे हैं अजय त्यागी

Last Updated- August 20, 2026 | 10:34 PM IST
ESG
इलेस्ट्रेशन: अजय मोहंती

पांच वर्ष पहले 2021 में जब बाजार नियामक ने 2022-23 से भारत में सूचीबद्ध होने वाली कंपनियों के लिए कारोबार जवाबदेही एवं स्थायित्व रिपोर्टिंग (बीआरएसआर) खुलासों को अनिवार्य बनाया था तब इसे कंपनियों द्वारा गैर वित्तीय प्रकटीकरण को अनिवार्य बनाने की दिशा में बड़ा कदम माना गया था। इस मामले में भारत अग्रणी देशों में शामिल था। यहां तक कि यूरोपीय संघ ने भी ऐसा खुलासा 2024-25 में अनिवार्य किया था। वर्ष 2023 में बीआरएसआर कोर की प्रस्तुति के बाद यह और अधिक मजबूत हुआ। उसमें मुख्य प्रदर्शन संकेतकों यानी केपीआई का तीसरे पक्ष द्वारा आकलन अनिवार्य किया गया जिससे योजना की विश्वसनीयता बढ़ी।

बीआरएसआर दिशानिर्देशों की समीक्षा वैश्विक विकास के अनुरूप लगातार होती रहनी चाहिए ताकि वे हितधारकों के लिए प्रासंगिक बने रहें। बीआरएसआर दिशानिर्देश सूचीबद्ध कंपनियों को ईएसजी के अंतर्गत नौ श्रेणियों में जानकारी का खुलासा करने को बाध्य करते हैं। वर्तमान में रिपोर्टिंग प्रारूप क्षेत्र निरपेक्ष हैं। इन्हें क्षेत्र विशिष्ट प्रारूप में बदलना आवश्यक है। निश्चित रूप से ताप बिजली संयंत्र के लिए प्रारूप आईटी उद्योग के समान नहीं हो सकते। मौजूदा दिशानिर्देश कंपनियों को उन कॉलमों में ‘लागू नहीं’ लिखने की अनुमति देते हैं जो उनके लिए प्रासंगिक नहीं हैं लेकिन इससे या तो सूचना का बोझ बढ़ सकता है या क्षेत्र-विशिष्ट जानकारी की कमी हो सकती है। नियामक राष्ट्रीय औद्योगिक वर्गीकरण का उपयोग करके विभिन्न क्षेत्रों को वर्गीकृत कर सकता है और क्षेत्र-विशिष्ट टेम्पलेट निर्धारित कर सकता है। 

प्रकटीकरण व्यवस्था हितधारकों को एक ही क्षेत्र में काम करने वाली कंपनियों की तुलना करने में मदद करती है। यह और उपयोगी होगा यदि अलग-अलग पैमानों पर दी गई जानकारी की तुलना सरकार या नियामकों द्वारा अलग-अलग गतिविधियों के लिए तय किए गए बेंचमार्क से भी की जा सके। बेंचमार्किंग के अभाव में किसी कंपनी के असल प्रदर्शन का आकलन करना संभव नहीं है।  सरकार के पास ईएसजी के विभिन्न तत्त्वों के अंतर्गत कई अंतरराष्ट्रीय प्रतिबद्धताएं और घरेलू आकांक्षाएं हैं। उसे यह तय करना होगा कि इन प्रतिबद्धताओं और आकांक्षाओं को पूरा करने में वह कंपनियों से किस प्रकार का योगदान अपेक्षित करती है। 

उदाहरण के लिए ईएसजी के पर्यावरणीय घटक के अंतर्गत सरकार ने 2030 तक सकल घरेलू उत्पाद की उत्सर्जन तीव्रता को 2005 के स्तर से 45 फीसदी तक कम करने और 2070 तक विशुद्ध शून्य ग्रीनहाउस गैस (जीएचजी) उत्सर्जन हासिल करने का संकल्प लिया है।

स्वाभाविक रूप से ये लक्ष्य तब तक पूरे नहीं हो सकते जब तक इन्हें विभिन्न गतिविधियों और क्षेत्रों में विभाजित कर प्रगति की निगरानी न की जाए। सरकार कंपनियों से क्या अपेक्षा करती है? हाल ही में, कार्बन क्रेडिट ट्रेडिंग स्कीम (सीसीटीएस) के तहत उन सेक्टरों के लिए कुछ सेक्टर-विशिष्ट जीएचसी उत्सर्जन लक्ष्य तय किए गए हैं, जिनमें उत्सर्जन कम करना मुश्किल है। इन क्षेत्रों की कंपनियों से अपेक्षा की जानी चाहिए कि वे अपने प्रदर्शन को इन लक्ष्यों के संदर्भ में स्पष्ट रूप से उजागर करें।

दरअसल ऐसे लक्ष्य और अधिक क्षेत्रों के लिए तय किए जाने चाहिए और प्रदर्शन की निगरानी होनी चाहिए। आगे चलकर अन्य मानकों जैसे जल-उपयोग गहनता और कुल ऊर्जा खपत में नवीकरणीय ऊर्जा का अनुपात के लिए भी विशिष्ट लक्ष्य तय किए जाने चाहिए।

बीआरएसआर का दायरा केवल शीर्ष 1,000 सूचीबद्ध कंपनियों तक सीमित नहीं रहना चाहिए। यद्यपि बाजार पूंजीकरण के आधार पर कंपनियों का वर्गीकरण करना एक सरल मानदंड है लेकिन इससे अपेक्षित उद्देश्य पूरा नहीं होगा। उदाहरण के लिए जीएचजी का सबसे अधिक उत्सर्जन करने वाले कुछ उद्योग शीर्ष 1,000 सूचीबद्ध कंपनियों में शामिल नहीं हो सकते। इसके अलावा कई बड़ी कंपनियां जिनके ईएसजी संबंधी प्रकटीकरण अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं वे सूचीबद्ध होने के बजाय गैर-सूचीबद्ध रहना पसंद करती हैं। 

इसलिए बीआरएसआर के लिए अपनाए गए मानदंडों पर पुनर्विचार करने और इसके दायरे का विस्तार करने की आवश्यकता है। वर्तमान में कंपनियों के निदेशक मंडलों में ईएसजी से जुड़े मामलों के लिए कोई अलग समिति नहीं होती। सामान्यतः इन विषयों को सीएसआर समिति या जोखिम प्रबंधन समिति के माध्यम से देखा जाता है। ऐसे में जिन कंपनियों के लिए ईएसजी का विशेष महत्त्व है, उनमें ईएसजी मामलों के लिए एक अलग बोर्ड समिति का गठन नियामक द्वारा अनिवार्य किया जाना चाहिए।

सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (एमएसएमई) को भी बीआरएसआर के दायरे में लाना आवश्यक होगा, विशेष रूप से वे एमएसएमई जो पहले से शामिल कंपनियों की मूल्य श्रृंखला का हिस्सा हैं। हालांकि यह प्रक्रिया चरणबद्ध तरीके से लागू की जानी चाहिए। 

सरकारी स्तर पर ईएसजी के विभिन्न तत्त्वों के अंतर्गत कई अंतरराष्ट्रीय प्रतिबद्धताएं और घरेलू आकांक्षाएं हैं। इन लक्ष्यों को समय पर पूरा करने के लिए भविष्य में हमें विदेशी वित्तपोषण का एक बड़ा हिस्सा चाहिए होगा। इस पर सलाहकार संगठनों, उद्योग समूहों और शोधकर्ताओं के बीच आम सहमति है। कई विदेशी पेंशन फंड, सॉवरिन वेल्थ फंड और अन्य दीर्घकालिक निवेश फंड के निवेशकों काे यह निर्देश होता है कि वे अपनी पूंजी का एक हिस्सा केवल सतत विकास परियोजनाओं में लगाएं। भारत में निवेश करने के लिए वे अपेक्षा करेंगे कि भारतीय कंपनियां उन्हीं मानकों का पालन करें जो उनके अपने क्षेत्रों में लागू होते हैं।

पिछले कुछ वर्षों में अंतरराष्ट्रीय स्थायित्व मानक बोर्ड (आईएसएसबी) द्वारा विकसित टिकाऊ रिपोर्टिंग मानक जो अंतरराष्ट्रीय वित्तीय रिपोर्टिंग मानक के अंतर्गत आता है उसे वैश्विक स्तर पर व्यापक रूप से स्वीकार किया गया है और अधिकाधिक क्षेत्र इन्हें अपनाने की ओर बढ़ रहे हैं। भारत को सभी हितधारकों से परामर्श कर एक रोडमैप तैयार करना चाहिए ताकि बीआरएसआर को इन मानकों के अनुरूप बनाया जा सके। 


(लेखक ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन में विशिष्ट फेलो और सेबी के पूर्व अध्यक्ष हैं। ये उनके निजी विचार हैं)

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First Published - August 20, 2026 | 10:34 PM IST

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