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आर्थिक समृद्धि के लिए सही नीतियों से ज्यादा जरूरी है सक्षम नेतृत्व

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विचारकों ने लंबे समय से यह समझाने की कोशिश की है कि कुछ राष्ट्र अमीर क्यों बनते हैं जबकि अन्य गरीब ही रहते हैं

Last Updated- August 19, 2026 | 10:18 PM IST
Prosperity
इलेस्ट्रेशन: बिनय सिन्हा

आर्थिक समृद्धि का रास्ता क्या है? इसके आदर्श जवाब में विभिन्न मॉडल, नीतियां और योजनाएं आदि शामिल होती हैं। परंतु यह निष्कर्ष निकालना कि सही नीतियां और मॉडल खुदबखुद समृद्धि ले आएंगे, ऐसा ही है जैसे ‘यह मानना कि अगर अंडों, चीनी और आटे को रात भर मिलाकर छोड़ दिया जाए तो वह खुद केक में बदल जाएगा।’ सिंगापुर की राजनीति विज्ञानी और ‘हाउ चाइना एस्केप्ड द पॉवर्टी ट्रैप’ की लेखिका यूएन यूएन आंग का यह कथन एकदम सटीक है। 

समृद्धि की कामना करनी होती है और उसका निर्माण करना होता है। यहां एक और बुनियादी प्रश्न उत्पन्न होता है? इसे कौन करेगा, और क्यों? दिलचस्प बात यह है कि विकास अर्थशास्त्र ने कभी भी समृद्धि की व्याख्या के केंद्र में नेतृत्व को नहीं रखा जबकि नेतृत्व यह तय कर सकता है कि कोई देश सही समय पर सही आर्थिक और सामाजिक निर्णय लेता है या नहीं।

विचारकों ने लंबे समय से यह समझाने की कोशिश की है कि कुछ राष्ट्र अमीर क्यों बनते हैं जबकि अन्य गरीब ही रहते हैं। डेविड ह्यूम, एडम स्मिथ और डेविड रिकार्डो ने आर्थिक वृद्धि को राजनीतिक अर्थशास्त्र का केंद्र माना लेकिन आधुनिक वृद्धि सिद्धांत केवल 1940 के दशक में हैरोड-डोमर मॉडल और बाद में सोलो-स्वान ढांचे के साथ उभरा। सोलो ने स्थापित किया कि दीर्घकालिक वृद्धि पूंजी संचय, श्रम और तकनीकी प्रगति पर निर्भर करती है। 1980 के दशक से पॉल रोमर और रॉबर्ट लुकास ने मॉडल में तकनीक और ज्ञान सृजन को शामिल किया और नवाचार, अनुसंधान एवं विकास, मानव पूंजी और ‘सीखते हुए करने’ को सतत वृद्धि के स्रोत के रूप में महत्त्व दिया।

संस्थागत अर्थशास्त्रियों जैसे डगलस नॉर्थ और बाद में डैरन एसेमोगलू तथा जेम्स रॉबिन्सन ने ध्यान को वृद्धि के गहरे निर्धारकों की ओर मोड़ा यानी संपत्ति अधिकार, शासन, कानून का शासन और राजनीतिक संस्थाएं। इन सिद्धांतों के साथ-साथ संरचनावादी स्कूल भी चला, जो पॉल रोसेनस्टीन-रोडान से जुड़ा था। उन्होंने तर्क दिया कि केवल बाजार गरीब देशों में समन्वय विफलताओं, पैमाने की अर्थव्यवस्थाओं और संरचनात्मक कठोरताओं को दूर नहीं कर सकते। उन्होंने औद्योगिक नीति और सार्वजनिक निवेश का उपयोग करने वाले सक्रिय विकासशील राज्य की वकालत की।

विकासशील दुनिया में राज्य के हस्तक्षेप के निराशाजनक परिणाम, 1980 के दशक के ऋण संकट और समाजवादी अर्थव्यवस्थाओं के पतन ने बौद्धिक सहमति को एक बार फिर बाजारों की ओर मोड़ दिया। वॉशिंगटन सहमति ने इस अदृश्य हाथ पर विश्वास को मूर्त रूप दिया यानी उदारीकरण, निजीकरण, नियम-कानून कम करना और व्यापक आर्थिक अनुशासन बनाए रखना। लेकिन यह भी अधूरा साबित हुआ। ध्यान दीजिए कि इस बौद्धिक इतिहास से क्या गायब है: नेतृत्व। 

यह आश्चर्यजनक है क्योंकि गरीब देशों का बड़ा हिस्सा ऐसे तंत्रों से संचालित होता है जो क्लेप्टोक्रेट्स (ऐसे शासक जो सत्ता में रहते हुए राज्य की संपत्ति और संसाधनों का दुरुपयोग करके उसे निजी लाभ के लिए लूटते हैं) और जड़ जमाए हुए अभिजात वर्ग को राज्य पर कब्जा करने की अनुमति देते हैं। आर्थिक सिद्धांत में कितना भी सुधार कर लिया जाए, उससे विकास नहीं हो सकता, जब राजनीतिक नेता तंत्र का फ़ायदा खुद उठाने पर ही आमादा हों। नेतृत्व लगभग हर संगठन (सामाजिक या कॉरपोरेट) में निर्णायक कारक होता है। तो फिर किसी देश के लिए यह अलग क्यों होना चाहिए? क्या कोई सोचता है कि जमशेदजी टाटा ने टाटा साम्राज्य बनाने में केंद्रीय भूमिका नहीं निभाई या कि टेस्ला और स्पेसएक्स उतना ही अच्छा करते यदि ईलॉन मस्क के अलावा कोई और उनका नेतृत्व करता? 

क्या इसे आंकड़ों से तय किया जा सकता है? अर्थशास्त्रियों बेंजामिन जोन्स और बेंजामिन ओल्केन ने पद पर रहते हुए राष्ट्रीय नेताओं की आकस्मिक, बाहरी कारणों से होने वाली मौतों का विश्लेषण किया। किसी नेता की अप्रत्याशित मृत्यु से ठीक पहले और बाद में आर्थिक प्रदर्शन को मापकर उनके शोध ने पाया कि कार्यकारी नेतृत्व सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की वृद्धि दरों में भारी बदलाव लाता है। 

विश्व बैंक के 2010 का एक शोध-पत्र ‘नेतृत्व एवं वृद्धि’ कुछ उपयोगी संकेत देता है। सिंगापुर के अनुभव और गोह चोक तोंग (जो 1990 से 2004 तक वहां के प्रधानमंत्री रहे) के विचारों पर आधारित यह अध्ययन तीन व्यापक सफलता कारकों की पहचान करता है: पहला, संसाधन (प्राकृतिक संपदा, विरासत में मिली संस्थाएं और संचय, दूसरा वृद्धि प्रतिमान (जैसे धन वितरण बनाम धन सृजन) और तीसरा, सही नीतियों का निर्माण और उनका प्रभावी क्रियान्वयन। अनुभवजन्य साक्ष्य दिखाते हैं कि तीसरा बिंदु बाकियों पर भारी पड़ सकता है। अब हम जानते हैं कि वृद्धि कारकों की पृष्ठभूमि मात्र से कहीं अधिक, कार्यकारी नेतृत्व ही दक्षिण कोरिया, ताइवान, सिंगापुर और चीन में विकास का मुख्य चालक रहा है। 

भले ही किसी देश के पास प्राकृतिक संसाधन न हों (जैसे सिंगापुर) और वह किसी पूर्वनिर्धारित वृद्धि प्रतिमान या विरासत में मिली संस्थाओं से शुरुआत न करे, समझदार नेता सीखते हुए करने की प्रक्रिया से सीख सकते हैं, दिशा सुधार सकते हैं और अपने देशों को रूपांतरित कर सकते हैं। गोह इस बात पर जोर देते हैं कि सतत वृद्धि अक्सर नीतियों के लगातार सूक्ष्म सुधार का परिणाम होती है। यह समीक्षा प्रक्रिया, स्पष्ट रूप से परिभाषित मानकों के विरुद्ध ईमानदार आत्म-चिंतन के माध्यम से आवश्यक जवाबदेही प्रदान करती है। ऐसी नीतियों, उनके क्रियान्वयन और नीति समीक्षा को क्या निर्धारित करता है? वे तीन कारकों की पहचान करते हैं। मजबूत संस्थाएं, नेतृत्व और सामाजिक सहमति। ध्यान देने वाली बात है कि कमजोर नेतृत्व अन्य दो को उत्पन्न नहीं कर सकता।

यहां एक अहम सवाल पैदा होता है। एक अच्छे नेता के गुण क्या हैं? गोह कहते हैं कि नेताओं को दूरदर्शी और परिश्रमी होना चाहिए और उन्हें पार्टी या व्यक्तिगत हितों के बजाय निस्वार्थ भाव से राष्ट्रीय हितों के प्रति समर्पित होना चाहिए। विश्वसनीयता के लिए नेताओं में ईमानदारी होनी चाहिए और वे भ्रष्टाचार से अछूते हों।

स्पष्ट है कि किसी अर्थव्यवस्था को सतत उच्च वृद्धि के मार्ग पर ले जाने के लिए आक्रामक विकल्पों की आवश्यकता होती है: बेहतर से बेहतर मानव पूंजी का निर्माण, वैश्विक बाजारों में एकीकरण, लगातार तकनीक को आत्मसात करना और दक्षता को बढ़ावा देना ताकि अधोसंरचना लागत कम बनी रहे। लेकिन ये सब अपने आप नहीं हो सकता। यह नेतृत्व ही है (ईमानदार, बुद्धिमान, दूरदर्शी और दिशा सुधार के प्रति प्रतिबद्ध) जो यह सब संभव बनाता है।

अनुभवजन्य साक्ष्य यही कहते हैं। अब समय आ गया है कि वृद्धि सिद्धांत भी इस सच्चाई को स्वीकार करें।


(लेखक मनीलाइफ डॉट इन के सह-संस्थापक और मनीलाइफ फाउंडेशन के न्यासी हैं। ये उनके निजी विचार हैं)

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First Published - August 19, 2026 | 10:18 PM IST

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