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निजी क्षेत्र की बढ़ी संभावनाएं

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सरकारी अनुमानों के मुताबिक 360 अरब डॉलर की वैश्विक अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था में भारत का योगदान बमुश्किल दो फीसदी है।

Last Updated- June 28, 2023 | 10:16 PM IST
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अमेरिका की राजकीय यात्रा के दौरान प्रौद्योगिकी क्षेत्र में कई बड़े समझौतों पर हस्ताक्षर हुए। उदाहरण के लिए माइक्रॉन टेक्नोलॉजीज के साथ संयुक्त उपक्रम तथा जनरल इलेक्टि्रक और हिंदुस्तान एरोनॉटिक्स के बीच लड़ाकू विमान के इंजन बनाने के लिए तकनीक हस्तांतरण के समझौतों से मुख्य तौर पर सरकारी क्षेत्र ही लाभान्वित होता दिख रहा है।

परंतु एक सकारात्मक लेकिन प्राय: अनदेखा लाभ प्रौद्योगिकी क्षेत्र में हुए अन्य समझौतों से सामने आया है और वह यह है कि भारत के निजी क्षेत्र के लिए भी अवसरों के नए द्वार खुले हैं। उदाहरण के लिए भारत ने आर्टेमिस समझौते पर हस्ताक्षर किए। अमेरिकी नेतृत्व वाली यह पहल चंद्रमा और मंगल सहित अंतरिक्ष की खोज में अंतरराष्ट्रीय सहयोग बढ़ाने से संबंधित है।

इस समझौते की मुख्य बात यह है कि अमेकिरन नैशनल एरोनॉटिक्स ऐंड स्पेस एडमिनिस्ट्रेशन (NASA) और भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) साथ मिलकर भारतीय अंतरिक्ष यात्रियों को चांद पर ले जाने का प्रयास करेंगे और 2024 तक अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष केंद्र के लिए एक संयुक्त मिशन को अंजाम देंगे।

जिस तरह NASA के चंद्रमा संबंधी तथा अन्य अंतरिक्ष मिशन ने दोतरफा तकनीक और शोध एवं विकास स्थानांतरण के साथ उत्कृष्ट प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में जीवंत निजी क्षेत्र के लिए हालात तैयार किए उसी तरह ISRO के साथ गठबंधन भी भारत के अंतरिक्ष-सैन्य क्षेत्र में बड़ा इजाफा करने वाला साबित हो सकता है।

इसके अलावा विशाल एरोस्पेस कंपनियां जो उन्नत अंतरिक्ष एवं रक्षा प्रौद्योगिकी पर काम कर रही हैं वे भी नासा के नेटवर्क के इर्दगिर्द ही काम करती हैं। ईलॉन मस्क की स्पेसएक्स, जेफ बेजोस की ब्लू ओरिजिन, बोइंग और अंतरिक्ष पर्यटन पर ध्यान केंद्रित करने वाली अन्य कंपनियां मसलन ओरायन स्पैन अथवा रिचर्ड ब्रैनसन की वर्जिन गैलैक्टिक इसका उदाहरण हैं।

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सरकारी अनुमानों के मुताबिक 360 अरब डॉलर की वैश्विक अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था में भारत का योगदान बमुश्किल दो फीसदी है। उसे चीन, रूस, जर्मनी समेत अन्य देशों से कड़ी प्रतिस्पर्धा मिल रही है और कहा जा सकता है कि भारत इस क्षेत्र में थोड़ी देर से आया है। इसके बावजूद काफी संभावनाएं मौजूद
हैं।

उदाहरण के लिए देश की सबसे बड़ी इंजीनियरिंग कंपनी लार्सन ऐंड टुब्रो (L&T) ने घोषणा की है कि वह ब्लू ओरिजिन के साथ उस रक्षा एवं वाणिज्यिक इस्तेमाल के लिए बनाए जा रहे सस्ते, दोबारा उपयोग में लाए जा सकने वाले प्रक्षेपण यान के निर्माण में सहयोग को लेकर चर्चा कर रही है जिसे यह अमेरिकी कंपनी तैयार कर रही है।

L&T घरेलू रक्षा और अंतरिक्ष कारोबार में पहले ही बड़ी कंपनी है। वह अपने कोयंबत्तूर संयंत्र से ISRO को इंजन मुहैया करा रही है। निश्चित तौर पर ISRO के प्रौद्योगिकी हस्तांतरण ने भी निजी क्षेत्र के प्रौद्योगिकी आपूर्तिकर्ताओं के लिए परिस्थितियां तैयार की हैं।

2019 में उसने एक वाणिज्यिक शाखा न्यूस्पेस इंडिया लिमिटेड बनाई थी जिसका उद्देश्य था भारतीय उद्योगों को अंतरिक्ष क्षेत्र में प्रौद्योगिकी संबंधी गतिविधियों में शामिल होने के योग्य बनाना और भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम से उत्पन्न उत्पादों और सेवाओं के वाणिज्यिक इस्तेमाल को बढ़ावा देना। आर्टेमिस समझौते के तहत इस पहल को नए स्तर पर पहुंचाया जा सकता है।

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अंतरिक्ष के अलावा भारत ने अमेरिकी नेतृत्व वाली खनिज सुरक्षा साझेदारी में भी प्रवेश किया है और इस दिशा में भी कुछ शुरुआती पहल देखने को मिली है। मुंबई की एप्सिलॉन एडवांस्ड मटीरियल्स पहली भारतीय कंपनी बन गई है जो इस समझौते के तहत अमेरिका में बिजली से चलने वाले वाहनों के लिए अहम बैटरी कलपुर्जे बनाने का संयंत्र स्थापित करेगी।

65 करोड़ डॉलर की यह परियोजना सिंथेटिक ग्रेफाइट एनोड बनाएगी और उम्मीद है कि इससे अहम खनिजों के लिए आपूर्ति श्रृंखला तैयार होगी तथा साथ ही भारत को बिजली चालित वाहनों के कलपुर्जे बनाने की दिशा में बढ़त हासिल होगी। इससे यह उद्योग चीन पर अपनी जोखिम भरी निर्भरता कम कर सकता है।

ये दोनों अहम कदम ऐसे क्षेत्रों में हैं जो भारत के विनिर्माण क्षेत्र के लिए अहम हैं और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में ऊंची छलांग लगाने का अवसर देते हैं। यह अहम है कि सरकार इन पहलों पर सकारात्मक ढंग से आगे बढ़े ताकि बने हुए अवसर गंवाए न जा सकें। भारत-अमेरिका नाभिकीय समझौते में हम वैसा होते देख चुके हैं।

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First Published - June 28, 2023 | 10:16 PM IST

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