सर्वोच्च न्यायालय द्वारा शुक्रवार को टाटा समूह के पक्ष में फैसला दिए जाने के साथ ही देश के कारोबारी जगत की सबसे बुरी जंग में से एक का पटाक्षेप हो गया। यह टाटा समूह के लिए एक बड़ी जीत है क्योंकि न्यायालय ने उसकी सभी अपील मंजूर कर लीं और प्रमुख प्रबंधन संबंधी तथा नेतृत्व वाले पदों पर नियुक्ति के बहुलांश हिस्सेदार के उसके अधिकार को बरकरार रखा। शीर्ष अदालत ने साइरस मिस्त्री की जिस तरह आलोचना की वह टाटा समूह को रास आया होगा। कुछ अन्य बातों के अलावा अदालत ने मिस्त्री पर आरोप लगाया कि उन्होंने टाटा संस के चेयरमैन के रूप में ‘अपने ही घर को आग लगाने की कोशिश की।’ अदालत ने यह भी कहा कि ‘ऐसे व्यक्ति को किसी निर्णय लेने वाली संस्था का हिस्सा होने का अधिकार नहीं है।’
न्यायालय के निर्णय की वरीयता एक और बात से साबित होती है। उसने कहा कि अल्पांश हिस्सेदारों के दमन का आरोप इस मामले में निराधार है। क्योंकि मिस्त्री जो 18 फीसदी हिस्सेदारी वाले एसपी समूह के प्रतिनिधि होते हुए भी बोर्ड में शामिल होने के छह वर्ष के भीतर शीर्ष पद पर पहुंच गए। बहरहाल, फैसले की सबसे अच्छी बात यह है कि इसने देश के सबसे बड़े कारोबारी समूहों में से एक के निष्क्रिय होने या वहां कामकाज बाधित होने की आशंकाओं पर विराम लगा दिया।
टाटा समूह को पूरा अधिकार है कि वह दोषमुक्त महसूस करे क्योंकि बीते कुछ वर्षों के दौरान मिस्त्री ने रतन टाटा की ईमानदारी और समूह के नैतिक आचरण पर लगातार हमले किए। मिस्त्री ने टाटा समूह के शीर्ष प्रबंधन पर धोखाधड़ी समेत कई अन्य आरोप भी लगाए। सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के बाद ये सारे दाग धुल गए हैं। परंतु आशा की जानी चाहिए कि टाटा समूह जिसे भारतीय कारोबारी प्रशासन में स्वर्णिम मानकों का पालन करने की परंपरा के लिए जाना जाता है, वह इस विजय के बाद आत्मावलोकन करना बंद नहीं करेगा। ऐसे कदम उठाए जाने चाहिए ताक क्षति पहुंचाने वाले ऐसे आरोप दोबारा सामने न आएं कि मुख्य कार्याधिकारियों अथवा परिचालित कंपनियों के संचालक मंडल के बजाय एक होल्डिंग कंपनी के ऐसे अंशधारक न्यास प्रमुख निर्णय लेते हैं जिनकी कंपनियों में अल्पांश हिस्सेदारी होती है।
यह ऐसी प्रबंधन व्यवस्था का प्रमाण है जिसे आधी सदी पहले त्याग दिया गया था। टाटा समूह का कारोबारी ढांचा वैसा ही अस्पष्ट है। टाटा संस के दोतिहाई शेयर न्यासों के पास हैं और इनका आधुनिकीकरण आवश्यक है।
दोनों पक्षों, खासकर विजेता पक्ष को इस बात की राह निकालनी चाहिए कि दोनों पक्ष औपचारिक रूप से अलग हो जाएं। अदालत ने एसपी समूह के शेयरों के मूल्यांकन से उचित ही दूरी बनाई है। एसपी समूह टाटा संस में अपना निवेश समाप्त करना चाहता है। परंतु यह एक और कानूनी लड़ाई की वजह बन सकता है क्योंकि इस मसले पर दोनों पक्षों का रुख कड़ा है। टाटा समूह के मुताबिक इस हिस्सेदारी की कीमत 80,000 करोड़ रुपये है जबकि मिस्त्री की मांग 1.7 लाख करोड़ रुपये की है। फैसले से टाटा समूह की स्थिति मजबूत हुई है लेकिन अगर वह यह समझे तो बेहतर होगा कि ऐसे विषय पर कारोबारी ऊर्जा खपाना आदर्श स्थिति नहीं है क्योंकि अभी कई चुनौतियां आनी हैं।
मिस्त्री को भी थोड़ा हकीकत के करीब होकर विचार करना चाहिए। इतने बड़े सौदे को अंजाम देना निस्संदेह एक जटिल प्रक्रिया है लेकिन अगर आम जनता की नजर से दूर और पेशेवर तरीके से काम किया जाए तो हल निकल सकता है। कानूनी विकल्प अंतिम होना चाहिए।