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भारत का झींगा उद्योग ट्रंप शुल्क की चुनौती को बेअसर करने को तैयार

झींगा उद्योग अपने निर्यात गंतव्यों में विविधता लाने और अमेरिका से इतर बाजारों में आपूर्ति बढ़ाने के प्रयास में लग गया है

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सुरिंदर सूद   
Last Updated- January 01, 2026 | 9:27 PM IST

भारत का निर्यातोन्मुख झींगा उद्योग अमेरिका द्वारा लगाए गए जवाबी शुल्कों से उत्पन्न चुनौती को अवसर में परिवर्तित करने के लिए तैयार दिख रहा है। वह अपने निर्यात गंतव्यों में विविधता लाने और अमेरिका से इतर बाजारों में आपूर्ति बढ़ाने के प्रयास में लग गया है। इस दिशा में उल्लेखनीय प्रगति पहले ही हो चुकी है। निर्यातकों का अनुमान है कि अगस्त में शुल्क वृद्धि के बाद ऑर्डर रद्द होने से अमेरिका को आपूर्ति में भारी गिरावट से जो नुकसान हुआ है उसकी भरपाई चीन, वियतनाम, बेल्जियम, रूस, कनाडा और ब्रिटेन जैसे देशों को निर्यात बढ़ाने से काफी हद तक हो जाएगी। इसके अलावा, यूरोपीय संघ, जापान और पश्चिम एशिया जैसे पारंपरिक बाजारों में झींगे (जिसे प्रॉन भी कहा जाता है) की आपूर्ति स्थिर रहने की उम्मीद है। अमेरिका झींगे का सबसे बड़ा आयातक है।

उद्योग जगत के सूत्रों के अनुसार, इस वित्त वर्ष में अमेरिका से बाहर के बाजारों में निर्यात मूल्य में लगभग 30 फीसदी की वृद्धि हुई है। इससे भारत को अंतरराष्ट्रीय झींगा बाजार में अपनी अग्रणी स्थिति बनाए रखने में मदद मिली है। वैश्विक मांग में मजबूती, गुणवत्ता और कीमत, दोनों के मामले में भारतीय झींगे की प्रतिस्पर्धात्मकता और सरकार के मजबूत सहयोग के कारण निर्यात की संभावनाएं उज्ज्वल बनी हुई हैं। झींगा पालन के लिए स्वदेशी तकनीक के निरंतर उन्नयन ने भी वैश्विक झींगा क्षेत्र में भारत के प्रभुत्व को बनाए रखने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

भारत लंबे समय से झींगा का विश्व का अग्रणी उत्पादक और निर्यातक रहा है और इसका योगदान वैश्विक उत्पादन के लगभग छठे हिस्से और अंतरराष्ट्रीय व्यापार के पांचवें हिस्से के बराबर है। हालांकि, हाल के वर्षों में इक्वाडोर ने इसे पीछे छोड़ दिया है और अब निर्यात में इसे कड़ी टक्कर दे रहा है। लेकिन मत्स्य पालन विशेषज्ञ इस बात को लेकर आश्वस्त हैं कि समुद्री मछली पकड़ने में ठहराव के बावजूद, झींगा पालन में मजबूत वृद्धि और निर्यात के लिए तैयार उत्पादों के मूल्यवर्धन पर अधिक जोर देने के कारण भारत शीर्ष स्थान हासिल करने में सफल होगा। झींगा अब देश के समुद्री खाद्य निर्यात का लगभग 70 फीसदी हिस्सा है।

भारत में व्यावसायिक स्तर पर झींगा पालन की शुरुआत 1980 के दशक के उत्तरार्ध में हुई, जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में इस प्रीमियम मछली प्रजाति की मांग बढ़ने लगी, लेकिन 2009 में दो कारणों से इसे और भी बढ़ावा मिला।
पहला, चीन, थाईलैंड और वियतनाम जैसे प्रमुख झींगा उत्पादक और उपभोक्ता देशों में ब्लैक टाइगर झींगा फार्मों में अर्ली मॉर्टेलिटी सिंड्रोम रोग के प्रकोप के कारण उनके घरेलू उत्पादन में भारी गिरावट आई। दूसरा, भारत सरकार ने वन्नामेई (व्हाइटलेग टाइगर) नामक झींगे की एक नई किस्म को अपनाने की अनुमति दी, जिसमें पारंपरिक रूप से पाले जाने वाले ब्लैकलेग टाइगर झींगे की तुलना में कई फायदे थे।

इनमें सबसे महत्त्वपूर्ण थे रोगों के प्रति अपेक्षाकृत उच्च प्रतिरोधक क्षमता और कम चारे की आवश्यकता, जिसका अर्थ था उत्पादन लागत में काफी कमी और अधिक लाभ। वन्नामेई निर्यात बाजार में भी प्रीमियम कीमत प्राप्त करता था।
इसलिए इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि वन्नामेई का पालन तेजी से फैल गया और केवल एक दशक में ही यह झींगा उत्पादक क्षेत्रों में मुख्य रूप से पाली जाने वाली प्रजाति बन गई। अब यह देश के झींगा उत्पादन का लगभग दो-तिहाई और झींगा निर्यात का अधिकांश हिस्सा है।

मत्स्य अनुसंधान केंद्रों द्वारा झींगा पालकों, प्रसंस्करणकर्ताओं और निर्यातकों को प्रदान की गई तकनीकी सहायता ने झींगा क्रांति लाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। झींगा पालन की पारंपरिक विधियों की जगह नवीन, उच्च-तकनीकी, लागत प्रभावी और टिकाऊ झींगा उत्पादन प्रणालियों ने ले ली है। इन नई तकनीकों ने कम जगह में और कम लागत पर बिक्री योग्य उत्पादों की अधिक पैदावार को संभव बनाया है, जिससे झींगा पालन की शुद्ध लाभप्रदता में वृद्धि हुई है।

चेन्नई स्थित सेंट्रल इंस्टीट्यूट ऑफ ब्रैकिशवाटर एक्वाकल्चर द्वारा विकसित अनूठी ‘अति-गहन परिशुद्ध झींगा पालन प्रणाली’ इसका एक उदाहरण है। इसमें पॉलिथीन शीट से ढके गोलाकार टैंकों में झींगों का पालन-पोषण किया जाता है, जिसमें इंटरनेट ऑफ थिंग्स और आर्टिफिशल इंटेलिजेंस (एआई) पर आधारित डिजिटल साधनों जैसे लार्वा फीडिंग और अपशिष्ट प्रबंधन का उपयोग किया जाता है। इससे प्रति हेक्टेयर जल में 100 से 120 टन तक झींगा उत्पादन की क्षमता है।

यह एआई का उपयोग रोगों की निगरानी और नियंत्रण के लिए भी करता है, जिससे झींगों में दवा अवशेषों का खतरा कम होता है और उनकी निर्यात संभावना बढ़ती है। विशेष रूप से, इस तकनीक से उत्पादित झींगों की बनावट, रंग और स्वाद अपेक्षाकृत बेहतर पाया गया है। इसके अलावा, यह विधि किसानों को स्थानीय और निर्यात बाजारों में अनुमानित मांग के अनुसार अपने उत्पादन की योजना बनाने की अनुमति देती है।

केंद्र सरकार और तटीय राज्यों की सरकारों ने वैज्ञानिक तरीके से झींगा पालन को बढ़ावा देने के लिए योजनाएं शुरू की हैं। प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना नामक केंद्र के व्यापक मत्स्य विकास कार्यक्रम के तहत झींगा किसानों को उन्नत प्रौद्योगिकी अपनाने के लिए उदार वित्तीय और अन्य प्रकार के प्रोत्साहन दिए जा रहे हैं। इसके अलावा, समुद्री उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण और तटीय मत्स्य पालन प्राधिकरण जैसी सरकारी एजेंसियां नए निर्यात बाजारों की खोज में सहायता कर रही हैं और नियामकीय मामलों में भी मदद कर रही हैं।

हालांकि, सरकार को अमेरिकी शुल्क के अलावा मनमाने ढंग से निर्धारित गुणवत्ता मानक और यूरोपीय संघ जैसे आयातकों द्वारा मामूली आधारों पर खेप अस्वीकार करने जैसी व्यापार बाधाओं के बड़े मसलों का निराकरण करना चाहिए ताकि झींगा उद्योग अंतरराष्ट्रीय व्यापार में बढ़ती प्रतिस्पर्धा का सामना कर सके।

First Published : January 1, 2026 | 9:22 PM IST