Categories: लेख

कारोबारियों की सुने सरकार

Published by
बीएस संवाददाता
Last Updated- December 15, 2022 | 1:38 AM IST

आर्थिक उदारीकरण के बाद से ही निवेश (घरेलू हो या विदेशी) देश की सरकारों की प्रमुख चिंता रहा है। इसके बावजूद एक के बाद एक तमाम सरकारों ने कारोबारियों की चिंताओं पर ध्यान नहीं दिया। दूरसंचार से लेकर ई-कॉमर्स और वाहन कारोबार तक देश की सरकार ने निरंतर अपने जाहिर लक्ष्यों के विपरीत काम किया है। ताजा बानगी है टोयोटा इंडिया के उपाध्यक्ष शेखर विश्वनाथन का वक्तव्य जिसमें उन्होंने स्पष्ट किया कि कैसे बड़ी कारों पर लगने वाले शुल्क ने इस जापानी कार निर्माता को भारत में अपनी विस्तार योजना निरस्त करने पर विवश किया। गत माह एक साक्षात्कार में फोक्सवैगन इंडिया के प्रमुख गुरप्रताप बोपाराय ने भी लगभग यही बात कही थी। बोपाराय ने कहा था कि छोटी कारों (जिन पर 29 फीसदी वस्तु एवं सेवा कर लगता है) और बड़ी कारों (4 मीटर से लंबी कारें जिन पर 45-50 फीसदी जीएसटी लगता है) के बीच कर दरों का अंतर जीएसटी के पहले की उत्पाद शुल्क व्यवस्था की तरह ही है और इससे निवेश संबंधी निर्णय छोटी कारों के पक्ष में जा रहे हैं। परंतु जैसा कि बोपाराय ने कहा भी वैश्विक बाजार में छोटी कारों की हिस्सेदारी केवल 7 प्रतिशत है और इसमें कमी आ रही है।
यही कारण है कि भारत में काम कर रही वैश्विक वाहन कंपनियां खासतौर पर घरेलू बाजार को ध्यान में रखकर क्षमता निर्माण करती हैं और वे वैश्विक स्तर की इकाइयों में निवेश नहीं करतीं। दूसरे शब्दों में वाहन उद्योग का कर ढांचा भारत को वैश्विक निर्यात केंद्र बनाने के सरकार के लक्ष्य के आड़े आ रहा है। इसके बजाय सरकार ने मेक इन इंडिया के लक्ष्य को आगे बढ़ाने का विशिष्ट रास्ता चुनते हुए विदेशी उपभोक्ता इलेक्ट्रॉनिक वस्तुएं और मोबाइल फोन बनाने वाली कंपनियों के विनिर्मित उत्पाद और कच्चे माल पर उच्च आयात शुल्क लगा दिया है। ऐसा देश में विनिर्माण को बढ़ावा देने के लिए किया गया है।
कारों पर लगने वाले कर में उनके आकार के अनुसार अंतर के पीछे मूल वजह विदेशी कार कंपनियों के खिलाफ घरेलू लॉबीइंग है। दशकों पहले यह व्यवस्था बनी ताकि प्रतिस्पर्धी उत्पाद और बेहतर डिजाइन पेश करने वाली विदेशी कंपनियों को टक्कर दी जा सके। परंतु विभिन्न सरकारें भी यह समझ नहीं पाईं कि घरेलू और विदेशी कंपनियों के लिए असमान कारोबारी परिस्थितियों से किसी को लाभ नहीं। इससे न तो विश्वस्तरीय घरेलू कारोबार तैयार हुए और न ही भारत विदेशी निवेश के लिए बड़ा केंद्र बनकर उभरा। ई-कॉमर्स और खुदरा कारोबार से संबंधित नियम भी एक बानगी हैं। शुरुआत में कृत्रिम भेद (एकल ब्रांड, बहु ब्रांड) के आधार पर विदेशी निवेश को रोकने के बाद एकल ब्रांड वाले खुदरा कारोबारों के लिए स्थानीय स्रोत का नियम लाया गया और कहा गया कि विदेशी बहुब्रांड खुदरा कारोबार गोदाम और शीतगृह के क्षेत्र में नए निर्माण में ही निवेश कर सकेंगे। ऐसा करके सरकार ने इस रोजगार प्रधान क्षेत्र में वृद्धि की संभावनाओं पर रोक लगा दी।
ई-कॉमर्स क्षेत्र में सरकार ने ऐसे नियम बना दिए कि विदेशी कंपनियों के लिए केवल ऑनलाइन कारोबार ही संभव रह गया। यानी वे अपने ही मंच पर केवल अपनी कंपनियों का माल नहीं बेच सकती। विदेशी ई-कॉमर्स कंपनियों के भारत में निवेश करने की संभावना ऐसे समय सीमित कर दी गई जब भारत को बड़े पैमाने पर रोजगार की जरूरत है। इससे कुछ घरेलू कारोबार भी प्रभावित हुए। दूरसंचार क्षेत्र में स्पेक्ट्रम बकाया की कड़ी समय सीमा उस वक्त आई है जब कीमतों की जंग ने मौजूदा सेवा प्रदाताओं की हालत खराब कर रखी है। इन तमाम विषयों पर सरकार का ध्यान कई बार आकृष्ट किया गया है लेकिन कोई लाभ नहीं हुआ। विदेशी निवेश मोदी सरकार के आर्थिक एजेंडे का अहम हिस्सा है। यदि वह लक्ष्य हासिल करना चाहती है तो कारोबारी जगत की बात सुननी होगी।

First Published : September 21, 2020 | 12:10 AM IST