वोडाफोन आइडिया (वी) ने उद्योग जगत और ऋणदाताओं को संकेत दिया है कि उद्योगपति कुमार मंगलम बिड़ला के कंपनी में गैर-कार्यकारी अध्यक्ष के रूप में वापस आने के साथ वह अपनी रणनीति को और मजबूत कर रही है। हालांकि बिड़ला ने दूरसंचार क्षेत्र के दो कंपनियों के एकाधिकार में तब्दील होने की आशंकाओं को दूर करने का प्रयास किया है, लेकिन 49 फीसदी सरकारी हिस्सेदारी वाली यह संघर्षरत कंपनी अभी तक बैंकों और वित्तीय संस्थानों का भरोसा जीतने में सफल नहीं हुई है।
इसके प्रवर्तकों ब्रिटेन स्थित वोडाफोन पीएलसी और आदित्य बिड़ला समूह ने, जिनकी संयुक्त हिस्सेदारी 25.64 फीसदी है, सरकारी हस्तक्षेप का आग्रह किया था और संकेत दिया था कि नुकसान वाली जगह पर बेकार का निवेश नहीं किया जाना चाहिए। अब, सरकार द्वारा वोडाफोन के समायोजित सकल राजस्व (एजीआर) से संबंधित बकाया राशि की व्यापक समीक्षा और कंपनी के कुछ बकाया को अपनी इक्विटी में परिवर्तित करने सहित कई लाभ और रियायतें देने के बाद, वोडाफोन के प्रवर्तकों को यह दिखाना होगा कि वे कंपनी में निवेश करने के लिए प्रतिबद्ध हैं।
हाल ही में मीडिया से बातचीत में बिड़ला ने कहा कि वोडाफोन के परिचालन संबंधी मापदंडों में ठोस सुधार दिखना शुरू हो गया है और इस गति को 5 अरब डॉलर की पूंजीगत व्यय योजना से सहारा मिलेगा। उन्होंने यह उम्मीद भी जताई कि कंपनी के पुनरुद्धार से ‘तीन प्रमुख कंपनियों वाले स्वस्थ निजी बाजार’ को बनाए रखने में मदद मिलेगी। हालांकि, खबरों के मुताबिक, बैंकों ने वोडाफोन के लगभग 35,000 करोड़ रुपये के ऋण अनुरोध पर अभी तक कोई फैसला नहीं लिया है और उनका कहना है कि दूरसंचार कंपनी को उनके साथ अपना संपर्क बढ़ाना होगा।
मुख्य मुद्दा यह है कि ऋणदाता डिफॉल्ट की स्थिति में अतिरिक्त पूंजी लगाने के लिए प्रवर्तकों से गारंटी और प्रतिबद्धता चाहते हैं। वोडाफोन द्वारा इस तरह का कोई आश्वासन देने का अभी तक कोई सबूत नहीं है। वोडाफोन के एजीआर बकाये में 27 फीसदी की कमी के बाद भी, जो लगभग 87,695 करोड़ रुपये से घटकर लगभग 64,046 करोड़ रुपये हो गया है, दूरसंचार ऑपरेटर को अगले तीन वर्षों में स्पेक्ट्रम बकाये के लिए काफी अधिक राशि का भुगतान करना होगा। हालांकि, इसका एजीआर बकाया वित्त वर्ष 2036 से छह वर्षों में छह किस्तों में दिया जाना है, जो एक बड़ी राहत है।
बैंकों के लिए वोडाफोन का लगभग 2.1 लाख करोड़ रुपये का कर्ज एक बड़ी चुनौती है। इसलिए, वे और फंड देने से पहले प्रवर्तकों की गारंटी पर जोर दे रहे हैं। कुछ साल पहले तक बाजार में अग्रणी मानी जाने वाली यह कंपनी ग्राहकों की संख्या और प्रति उपयोगकर्ता औसत मासिक राजस्व (एआरपीयू) में वृद्धि के मामले में रिलायंस जियो और भारती एयरटेल से कड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना कर रही है।
ऐसे समय में जब तकनीकी प्रगति सभी क्षेत्रों में विकास की गति को बढ़ा रही है, वोडाफोन ने अपने ग्राहकों को 5जी सेवा प्रदान करने में देर से शुरुआत की। अब जब दूरसंचार क्षेत्र 6जी और सैटेलाइट ब्रॉडबैंड जैसे क्षेत्रों में विस्तार कर रहा है, वोडाफोन को एक विश्वसनीय दीर्घकालिक दृष्टिकोण की आवश्यकता है जो उपयोगकर्ताओं का विश्वास जगा सके और ऋणदाताओं को आश्वस्त कर सके।
सरकार ने वोडाफोन को कई तरह से सहारा दिया है ताकि यह क्षेत्र दो कंपनियों के एकाधिकार में न फंस जाए। अब सरकार को करों और शुल्कों की समीक्षा करके व्यवस्थागत समस्याओं को दूर करने का प्रयास करना चाहिए, ताकि ऑपरेटरों पर बोझ कम हो सके, जिन्हें लगातार नई तकनीक में निवेश करना पड़ता है। वोडाफोन की बात करें तो, भले ही अभी स्थिति सकारात्मक दिख रही हो, दूरसंचार कंपनी को अपने वादों को ठोस रूप देने के लिए कदम उठाने होंगे।
पिछले कुछ वर्षों में इसने धन जुटाने के कई प्रयास किए हैं, लेकिन अब इसे इस दिशा में और अधिक सक्रिय रूप से काम करना चाहिए। सेवा की गुणवत्ता में सुधार के साथ-साथ टैरिफ को तर्कसंगत बनाना भी एक ऐसा कदम है जिस पर कंपनी और उद्योग को विचार करना चाहिए। इससे भारत में दूरसंचार का भविष्य अधिक सुरक्षित होगा।