हाल ही में पारित जन विश्वास (प्रावधान संशोधन) विधेयक, 2026 से कारोबारी सुगमता में सुधार की उम्मीद है। विधेयक के जरिये 79 केंद्रीय कानूनों के 784 प्रावधानों में संशोधन किया गया। इनमें से 717 प्रावधानों की आपराधिकता समाप्त की गई है जबकि 67 में संशोधन का लक्ष्य जीवन को सहज बनाना है।
ये संशोधन विभिन्न क्षेत्रों के तमाम कानूनों में किए गए हैं जिनमें औषधि एवं प्रसाधन अधिनियम 1940, फार्मेसी अधिनियम 1948 , खाद्य सुरक्षा और मानक अधिनियम 2006, नैदानिक प्रतिष्ठान (पंजीयन एवं विनियमन) अधिनियम 2010, राष्ट्रीय संबद्ध और स्वास्थ्य सेवा व्यवसाय आयोग अधिनियम 2021 तथा वाणिज्य, उद्योग, पर्यावरण और कराधान से संबंधित कई कानून शामिल हैं। विस्तृत उद्देश्य यह है कि छोटे प्रक्रियात्मक उल्लंघनों के लिए कारावास जैसी आपराधिक सजाओं को हटाकर क्रमबद्ध मौद्रिक दंड और अपील प्रावधानों के साथ एक ढांचागत न्याय निर्णय तंत्र स्थापित किया जाए।
सरकार जिस समस्या को हल करना चाहती है वह बहुत व्यापक है। जैसा कि केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने कहा कि करीब पांच करोड़ लंबित अदालती मामले मामूली अपराधों के हैं। इनमें से कई तो ऐसे हैं जिनमें अदालती हस्तक्षेप की जरूरत भी नहीं पड़नी चाहिए थी। सरकार ने संकेत दिया है कि इन संशोधनों की मदद से बड़ी संख्या में ऐसे मामले कम करने में मदद मिलेगी और उन्हें अदालतों से बाहर प्रशासनिक प्रणाली के जरिये सुधारा जा सकेगा। इससे वाद कम होंगे, अनुपालन लागत में कमी आएगी और कुल मिलाकर कारोबारी माहौल में सुधार होगा।
विधेयक की एक अन्य अहम विशेषता है तुरंत कदम उठाने के बजाय चरणबद्ध प्रवर्तन की शुरुआत। उदाहरण के लिए मशविरा नोटिस, चेतावनी और मौद्रिक जुर्माना आदि। यह सूक्ष्म, लघु और मझोले उपक्रमों के लिए खासतौर पर उपयुक्त है जिन्हें अक्सर जटिल अनुपालन जरूरतों को लेकर संघर्ष करना पड़ता है और जो मामूली अपराधों के लिए बने आपराधिक प्रावधानों के कारण परेशानी का सामना करते हैं।
ध्यान देने वाली बात है कि जन विश्वास विधेयक कोई अलग-थलग सुधार नहीं है। यह गत एक दशक के उस व्यापक और निरंतर नीतिगत हस्तक्षेप का परिणाम है जिसके तहत देश में कारोबारी सुगमता के माहौल में सुधार किया जा सके। जन विश्वास अधिनियम 2023 के जरिये 42 केंद्रीय कानूनों के 183 प्रावधानों की आपराधिकता समाप्त की गई थी। मौजूदा विधेयक का इरादा ऐसे सैकड़ों और प्रावधानों की आपराधिकता समाप्त करने का है। इसी प्रकार कॉरपोरेट कानून (संशोधन विधेयक)2026, कंपनी अधिनियम 2013 में प्रस्तावित संशोधन और एलएलपी अधिनियम 2008 आदि अनुपालन को सहज बनाते हैं और संचालन मानकों को मजबूत बनाते हैं।
ऋणशोधन कानून में संशोधन, माल एवं सेवा कर को युक्तिसंगत बनाना और श्रम कानूनों को चार संहिताओं में समेकित करने जैसे पूरक सुधार यह संकेत देते हैं कि नियमन को सरल बनाने और अनुपालन के बोझ को कम करने का एक सतत प्रयास जारी है। सरकार सचेत रूप से नियामक अनिश्चितता को कम करने और व्यापारिक वातावरण को बेहतर बनाने का प्रयास कर रही है।
यद्यपि केवल अपराधमुक्त करना कारोबारी सुगमता की गारंटी नहीं दे सकता। भारत में वास्तविक समस्या केवल आपराधिक प्रावधान नहीं हैं, बल्कि अनुपालन, अनुमोदन और केंद्र तथा राज्यों के बीच नियामक ओवरलैप की भारी संख्या है। यदि इन्हें पर्याप्त रूप से कम नहीं किया गया, तो व्यवसाय, विशेषकर छोटे व्यवसाय, बाधाओं का सामना करते रहेंगे।
अनुपालन संबंधी मुद्दों के चलते भी भारत में व्यवसाय अपने संचालन को बढ़ाने से हिचकते हैं। इसलिए, सुधार का अगला चरण अनुपालन की संख्या कम करने, प्रक्रियाओं को सरल बनाने, राज्यों में नियमों को सामंजस्यपूर्ण बनाने और बिना आमने-सामने यानी फेसलेस तथा डिजिटल शासन प्रणालियों के दायरे का विस्तार करने पर केंद्रित होना चाहिए।
जन विश्वास सुधार की सफलता अंततः क्रियान्वयन पर निर्भर करेगी। निर्णय अधिकारी पारदर्शी रूप से कार्य करें, दंड अपराध की गंभीरता के अनुपात में हों, और शक्ति के दुरुपयोग को रोकने के लिए मजबूत अपील तंत्र मौजूद हो। नियामक सुधार का उद्देश्य सरलीकरण होना चाहिए। इससे स्वतः ही कई समस्याओं का समाधान हो जाएगा।