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Editorial: ‘भव्य’ योजना से मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देने की कवायद

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केंद्रीय मंत्रिमंडल ने हाल ही में 33,660 करोड़ रुपये की स्कीम 'भव्य' (भारत औद्येागिक विकास योजना) को मंजूरी दी है

Last Updated- March 23, 2026 | 10:15 PM IST
Manufacturing

केंद्रीय मंत्रिमंडल ने हाल ही में 33,660 करोड़ रुपये की स्कीम ‘भव्य’ (भारत औद्येागिक विकास योजना) को मंजूरी दी है। इसके तहत 100 प्लग-ऐंड-प्ले यानी इस्तेमाल के लिए तैयार औद्योगिक पार्कों की स्थापना की जानी है। यह देश के विनिर्माण आधार को मजबूती देने, रोजगार निर्माण को बढ़ावा देने और कारोबारी सुगमता में सुधार करने की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण कदम है। ये पार्क 33,000 एकड़ में फैले होंगे और इन्हें छह साल में तैयार किया जाएगा।

ये उद्यमों के लिए पूर्व मंजूरी वाली जमीन, तैयार अधोसंरचना और एकीकृत सेवाएं मुहैया कराएंगे। इसके लिए राज्यों की ओर से मजबूत एकल खिड़की मंजूरी प्रणाली और नियमन में ढील जैसे उपाय अपनाए जाएंगे। मूल बुनियादी ढांचे मसलन आंतरिक संपर्क के लिए सड़कों, अंडरग्राउंड सुविधाओं, नाली और साझा सुविधाओं आदि के लिए एक करोड़ रुपये प्रति एकड़ की वित्तीय सहायता प्रदान की जाएगी। अनुमान बताते हैं कि इससे करीब 15 लाख प्रत्यक्ष रोजगार तैयार हो सकते हैं और क्लस्टर आधारित विकास के जरिये घरेलू आपूर्ति श्रृंखला मजबूत हो सकती है।

धोलेरा विशेष निवेश क्षेत्र, शेंद्रा-बिडकिन औद्योगिक क्षेत्र, विक्रम उद्योगपुरी और ग्रेटर नोएडा औद्योगिक क्षेत्र जैसे मौजूदा औद्योगिक केंद्र ‘प्लग-ऐंड-प्ले’ इकोसिस्टम की संभावनाओं को अच्छी तरह से दर्शाते हैं, जहां पूर्व-स्वीकृत भूमि, एकीकृत बुनियादी ढांचा और मल्टीमॉडल कनेक्टिविटी तेज औद्योगिकीकरण को संभव बनाते हैं।

राष्ट्रीय औद्योगिक कॉरिडोर विकास निगम, जो वर्तमान में 13 राज्यों में 20 परियोजनाओं को लागू कर रहा है, उसने दिखाया है कि ऐसे मॉडल प्रवेश बाधाओं को कम करके और परियोजना की तत्परता में सुधार करके सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (एमएसएमई) के साथ-साथ बड़े व्यवसायों को भी आकर्षित कर सकते हैं। हालांकि निर्माण में देरी और कार्य पूरा करने के लिए लंबी समयसीमा जैसी चुनौतियां अक्सर लागत बढ़ा देती हैं और निवेशकों के विश्वास को कमजोर करती हैं।

अतीत के अनुभवों में चेतावनी देने वाला सबक भी छिपा है। विभिन्न राज्यों में कई औद्योगिक क्षेत्र ऐसे हैं जिनका पूरा इस्तेमाल नहीं हो सका। उदाहरण के लिए कर्नाटक के कुछ पार्कों में कुल आवंटित इकाइयों की केवल 25 फीसदी ही संचालित हैं। इसकी वजह खराब कने​क्टिविटी, कमजोर संचालन नियामकीय देरी और मांग की कमी आदि हैं। इसी प्रकार कई विशेष आर्थिक क्षेत्र और औद्योगिक कॉरिडोर विभिन्न दिक्कतों से जूझते रहे हैं।

आंतरिक बुनियादी ढांचे को बाहरी नेटवर्क जैसे राजमार्गों, रेल मालवाहक कॉरिडोर और बंदरगाहों के साथ समन्वित करने में देरी अक्सर औद्योगिक पार्कों के परिचालन को बाधित कर देती है। भूमि और बुनियादी सुविधाएं तैयार होने पर भी कंपनियों को बिजली, पानी और डिजिटल कनेक्टिविटी तक भरोसेमंद तरीके से पहुंचने में रुकावटों का सामना करना पड़ता है, जिससे परिचालन लागत बढ़ती है और प्रतिस्पर्धात्मकता में कमी आती है। यह दर्शाता है कि ‘कारोबारी सुगमता’ केवल नीति निर्माण का विषय नहीं है, बल्कि जमीनी स्तर पर निरंतर क्रियान्वयन और विभिन्न एजेंसियों के बीच समन्वय का भी है।

सफल होने के लिए, भव्य को क्रियान्वयन पर ध्यान देना होगा। योजना का जोर पीएम गतिशक्ति के साथ एकीकरण के माध्यम से निर्बाध रूप से ‘अंतिम सिरे तक संपर्क’ सुनिश्चित करने पर है, जिससे लॉजिस्टिक्स लागत कम होगी और प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ेगी। विश्वसनीय बिजली, पानी और डिजिटल ढांचा जिन्हें भूमिगत यूटिलिटी कॉरिडोर जैसी सुविधाओं का समर्थन प्राप्त हो निरंतर औद्योगिक संचालन सुनिश्चित करने के लिए गारंटीशुदा होना चाहिए।

योजना की ‘चुनौती-आधारित चयन प्रक्रिया’ के तहत उच्च गुणवत्ता वाली, निवेश के लिए तैयार प्रस्तावों को प्राथमिकता देनी चाहिए और इलेक्ट्रॉनिकी, वस्त्र, औषधि और पर्यावरण के अनुकूल विनिर्माण जैसे क्षेत्रों में क्षेत्र-विशिष्ट क्लस्टरिंग को बढ़ावा देना चाहिए। इन पार्कों को कौशल विकास इकोसिस्टम से जोड़ना भी आवश्यक है ताकि रोजगार सृजन समावेशी और टिकाऊ हो।

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First Published - March 23, 2026 | 10:01 PM IST

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