यदि सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के आंकड़ों, विनिर्माण और निर्माण में क्षेत्रवार मूल्यवद्र्धन तथा बिजली, स्टील, सीमेंट और वाहन आदि की वास्तविक बिक्री पर नजर डाली जाए तो साफ नजर आता है कि भारतीय अर्थव्यवस्था कई वर्ष पीछे हो गई है। इसे कैसे ठीक किया जा सकता है और कोविड के बाद अर्थव्यवस्था में वृद्धि की वापसी कैसे हो सकती है?
अगले कुछ महीनों में यदि आर्थिक स्थिति में सुधार लाना है तो मांग वृद्धि में अहम इजाफा करना होगा। निवेश का संबंध मांग से है और इसमें तब तक बढ़ोतरी नहीं होगी जब तक मांग नहीं बढ़ती। हाल के दिनों में निर्यात में जो वृद्धि हुई है उससे मदद अवश्य मिलेगी लेकिन यह पर्याप्त नहीं होगी। प्रत्यक्ष आय हस्तांतरण और सरकारी निवेश में इजाफा करके मांग बढ़ाने की भी फिलहाल बहुत अधिक संभावना नहीं है क्योंकि वृहद आर्थिक स्थितियां बहुत तंग हैं। देश का ऋण/जीडीपी अनुपात 2019 के अंत के 74 फीसदी से बढ़कर 2020 के अंत तक 90 फीसदी पहुंच गया। ऐसे में हमें यह समझना होगा कि उपभोक्ता मांग मौजूदा स्थिति में क्यों है और इसमें जल्द से जल्द सुधार कैसे किया जा सकता है?
वर्ष 2020-21 में स्थिर कीमतों पर निजी अंतिम खपत व्यय (पीएफसीई) 75 लाख करोड़ रुपये थी। यह राशि दो वर्ष पहले यानी 2017-18 के स्तर से महज एक लाख करोड़ रुपये अधिक थी। सकल जमा पूंजी निर्माण (जीएफसीएफ) के लिए भी यही सत्य है- वर्ष 2020-21 में यह 42 लाख करोड़ रुपये रहा। यह भी 2017-18 के स्तर से एक लाख करोड़ रुपये अधिक था। जीएफसीएफ के मामले में जब राष्ट्रीय लेखा से सार्वजनिक और निजी घटक को अलग कर दिया जाए तो शायद इसमें गिरावट नजर आएगी।
कोविड महामारी के असर और लॉकडाउन जैसी प्रतिक्रियाओं के चलते आम परिवारों की आय में कमी आई है और उपभोक्ता मांग प्रभावित हुई है। इसका एक संकेतक है रोजगार में गिरावट। सेंटर फॉर मॉनिटङ्क्षरग इंडियन इकनॉमी से प्राप्त रोजगार के आंकड़े बताते हैं कि अप्रैल-मई 2020 के बीच बेरोजगारी में बहुत अधिक इजाफा हुआ। मनरेगा में रोजगार के आंकड़ों मे भी अप्रैल-मई 2020 में वैसी ही तेज उछाल देखने को मिली और उसके बाद इसमें कमी आने लगी। ग्रामीण क्षेत्रों में निराशा का एक पैमाना यह भी रहा कि शहरी क्षेत्रों से प्रवासी श्रमिकों को अपने गांवों की ओर जबरन वापस लौटना पड़ा। इन्हीं श्रमिकों की मौजूदगी 2020-21 के रोजगार के आंकड़ों में नजर आती है। 2019-20 की तुलना में इसमें 47 फीसदी का इजाफा देखने को मिला।
एक हालिया शोध रिपोर्ट से संकेत मिलता है कि कड़े लॉकडाउन और करीब एक करोड़ श्रमिकों के अपने घर वापस लौटने से करीब 7.5 करोड़ अतिरिक्त लोग (कृषि में 2.63 करोड़, विनिर्माण में 1.67 करोड़, निर्माण कार्य एवं परिवहन में 2.36 करोड़ और सेवा क्षेत्र में 87 लाख) गरीबी के भंवर में उलझ गए। गरीब परिवारों के बच्चों को पढ़ाई और पोषण में भारी नुकसान हुआ। करीब एक वर्ष से मध्याह्न भोजन का वितरण नहीं हो रहा है।
रोजगार और आम परिवारों की आय में सुधार हुआ था लेकिन अप्रैल 2021 में महामारी की दूसरी लहर आ गई और हालात नाटकीय ढंग से बदल गए। अप्रैल-मई 2021 के सीएमआईई के आंकड़े दिखाते हैं कि बेरोजगारी में इजाफा हुआ है। हालांकि यह पिछले वर्ष की समान अवधि जैसा नहीं है लेकिन फिर भी यह काफी महत्त्वपूर्ण है। सीएमआईई सर्वे के आंकड़े यह भी दिखाते हैं कि दूसरी लहर के दौरान उपभोक्ताओं के रुझान में भारी गिरावट आई और सूचकांक इस वर्ष की पहली तिमाही (जब कोविड के हालात नियंत्रण में लग रहे थे) के 54 से घटकर मई 2021 में 47 पर आ गया।
इसके कुछ मौद्रिक प्रमाण भी हैं कि आम परिवार व्यय नहीं कर रहे हैं और वे मौद्रिक परिसंपत्तियां एकत्रित कर रहे हैं। भारतीय रिजर्व बैंक के आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2020-21 में परिवारों द्वारा वित्तीय परिसंपत्तियों का एकत्रीकरण पिछले वर्ष के स्तर से काफी अधिक था। जनता द्वारा अपने पास रखी गई नकदी भी बढ़कर जीडीपी के 14.6 फीसदी तक पहुंच गई जो बीते 50 वर्षों का उच्चतम स्तर है। मुद्रा का वेग (जीडीपी/नकदी और मांग जमा) घटकर 4.09 रह गया है जो गत 50 वर्षों का न्यूनतम स्तर है।
लोग पैसे खर्च करने से पीछे क्यों हट रहे हैं और उन्हें एकत्रित क्यों कर रहे हैं? इसका आंशिक स्पष्टीकरण तो यह है कि लॉकडाउन के कारण लोगों के पास खर्च करने के अवसर कम थे। मॉल और बाजार प्राय: बंद थे। इसके अलावा यात्राएं सीमित रहीं और लोग घूमने नहीं निकले।
व्यय को लेकर लगातार हिचकिचाहट कुछ और भी बताती है। कोविड की दूसरी लहर से लोग घबरा गए। खासकर इसलिए क्योंकि स्वास्थ्य ढांचा लगभग चरमरा गया था और ऑक्सीजन की कमी, अस्पताल में बिस्तरों के अभाव में बड़ी तादाद में लोगों की मौत हुई। महामारी का प्रसार ऐसे इलाकों में होने से घबराहट और बढ़ गई जहां स्वास्थ्य सेवाओं की हालत पहले से बुरी थी। शायद ऐसे लोग धन एकत्रित कर रहे हैं जिनका सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली पर भरोसा लडख़ड़ा गया है। लोगों को लग रहा है कि अप्रैल-मई 2021 जैसे हालात दोबारा होने पर यह पैसे उनके काम आएंगे। इसी प्रकार प्रवासी श्रमिक शायद भविष्य में लॉकडाउन जैसी स्थिति से निपटने के लिए बचत करें।
यदि यह सही है तो सरकार को परिवारों को व्यय बढ़ाने के लिए प्रेरित करना चाहिए। सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली और असंगठित क्षेत्र की बेहतरी के लिए भी कदम उठाने चाहिए। ऐसा करना अर्थव्यवस्था के लिए अधिक प्रभावी साबित हो सकता है।
सच तो यह है कि इस बात की पर्याप्त वजह है कि सरकार अपना ध्यान आर्थिक प्रबंधन से हटाकर सार्वजनिक सेवा प्रबंधन की ओर करे। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के ताजा आंकड़े बताते हैं कि ठिगने बच्चों की तादाद में कमी आई है। शिक्षा की स्थिति संबंधी वार्षिक रिपोर्ट के मुताबिक स्कूलों से खराब नतीजे आना जारी है। संपत्ति एकत्रित करने वालों तथा शिक्षित और उच्च कौशल संपन्न कामगारों तथा शेष 80 फीसदी आबादी के बीच की खाई लगातार चौड़ी हो रही है। शिक्षा, स्वास्थ्य, गरीबी, रोजगार और पर्यावरण सर्वेक्षणों की मदद से प्रगति का आकलन किया जाना चाहिए, न कि शेयर बाजार और जीडीपी से।
आर्थिक नीति की बात करें तो सरकार को एक समझदारी भरा, स्थिर और अनुमान लगाने लायक कर, शुल्क दर और नियमन ढांचा बनाना चाहिए और शेष बाजार पर छोड़ देना चाहिए। सरकार का प्राथमिक कार्य होना चाहिए जन सेवाओं मसलन स्वास्थ्य और शिक्षा की गुणवत्ता और विश्वसनीयता बनाना तथा कम आय वाले परिवारों को सामाजिक सुरक्षा मुहैया कराना। खासतौर पर दैनिक मजदूरों को ध्यान में रखते हुए। सरकार को निजी गतिविधियों के कारण पर्यावरण को क्षति पहुंचने जैसे बाहरी नुकसान सीमित करने के लिए अर्थव्यवस्था के अन्य क्षेत्रों में हस्तक्षेप रोकना चाहिए।