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आर्थिक विकास बनाम समृद्धि की राह

Last Updated- December 12, 2022 | 5:43 AM IST

यह साफ है कि सरकार कोविड महामारी की वजह से आर्थिक वृद्धि की राह में खड़े हुए संरचनात्मक गतिरोधों को दूर करने के लिए अब तक कोई विश्लेषणात्मक ढांचा पेश कर पाने में नाकाम रही है। विश्लेषकों ने मौजूदा हालात से निपटने को प्रभावी कदम उठा पाने में सरकार की नाकामी पर सवाल उठाए हैं।
भारत में अधिकांश वृहद-आर्थिक नीति की भाषा एवं व्याकरण कारोबार चक्र सिद्धांत पर आधारित है। आसान शब्दों में कहें तो आर्थिक वृद्धि में ऊपर-नीचे होने वाला रुझान होता है। आनुभविक स्तर पर एक बहुपदीय ढांचा बनता है जो अर्थमिति-परक परीक्षण के लिए तमाम संभावनाओं से भरपूर होता है। नीति चक्रीय-रोधी होना चाहती है। वैकल्पिक तौर पर आउटपुट-अंतराल विश्लेषण को आजमाया जाता है जो भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए एक संभावित आउटपुट को देखता है और फिर इस संभावित आउटपुट से वास्तविक आउटपुट के बीच के फासले का आकलन करता है। आउटपुट के इस फासले का इस्तेमाल यह अनुशंसा के लिए किया जाता है कि राजकोषीय एवं मौद्रिक नीति को क्या वृहद-आर्थिक स्थिरीकरण लाने वाली आर्थिक गतिविधि को बढ़ावा देना या कम करना चाहिए?
लेकिन जब कोविड महामारी जैसे झटके लगते हैं तो आउटपुट अंतराल और कारोबार चक्र- आधारित विश्लेषण इस गिरावट को थामने में मददगार नहींं रह जाते हैं। राजकोषीय एवं मौद्रिक नीति ऐसी होनी चाहिए कि वह आपूर्ति एवं मांग बढ़ाने की राह में मौजूद बाधाओं को दूर कर सके। ऐसा होने पर ही वृद्धि दर में आ रही गिरावट को थामा जा सकता है। लेकिन सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में आई अप्रत्याशित गिरावट को देखते हुए नीति-निर्माताओं ने आय-समर्थन योजनाओं के जरिये मांग बढ़ाने की तमाम सलाहों को दरकिनार करने के लिए विरासत विश्लेषणों का इस्तेमाल किया है। वित्त वर्ष 2020-21 एवं 2021-22 में राजकोषीय घाटा काफी अधिक रहने का सबसे बड़ा कारण राजकोषीय घाटे एवं वास्तविक आउटपुट वृद्धि के बीच के नकारात्मक सह-संबंध के अलावा नकारात्मक रुझान आघात भी है।
सूक्ष्म-आधारों पर परंपरागत रवैया यही है कि वृहद-आर्थिक विश्लेषण मांग-आपूर्ति के नियमों और बाजार कीमत संकेतों के तालमेल में होने चाहिए। लेकिन असली दुनिया में इन बिंदुओं पर स्पष्टता होना महत्त्वपूर्ण है। पहला, क्या ये बिंदु वास्तव में मांग एवं आपूर्ति के नियमों को लागू होते हुए दिखाते हैं। मसलन, भारतीय संदर्भ में देखें तो पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतों में वृद्धि का नतीजा इन उत्पादों की मांग में कमी के तौर पर निकलना चाहिए। लेकिन ऐसा नहींं होता है। ऐसे में पेट्रोलियम उत्पादों पर कर कम करने की दलील का मतलब दोषपूर्ण सूक्ष्म आधारों पर चलना जारी रखना और वृहद-अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचाना होगा। दूसरा, हम किसके सूक्ष्म आर्थिक आधारों की बात कर रहे हैं? उदाहरण के तौर पर, न्यूनतम मजदूरी में बढ़ोतरी से संबंधित साहित्य बताता है कि इनसे असल में आर्थिक गतिविधि बढ़ जाती है। यह ऐसा सच है जो मानक सूक्ष्म-आर्थिक मॉडलों के निष्कर्षों को नकारता है।
नीति निर्माण में सूक्ष्म-आधारों की भूमिका पर यह नजरिया भारतीय संदर्भ में खासा अहम है। जब यह साफ हो चुका है कि असमानता आर्थिक वृद्धि की राह में एक अड़चन है तो फिर मांग बढ़ाने वाले घटकों को मुक्त करना जरूरी है। अगर यह निकासी इंगित करती है कि सापेक्षिक कीमतें काफी हद तक विवेकाधीन खर्चों की श्रेणी के पक्ष में झुक चुकी हैं तो इस पर गौर करना अहम है कि इसमें बदलाव लाने के लिए पीछे छूट जाने वालों को कुछ मदद देने के बजाय क्या आर्थिक नीति को सक्रिय दखल देना चाहिए। हम देख चुके हैं कि ऐसा न करने का नतीजा एक लाभ-केंद्रित रिकवरी में निकलता है जो संरचनात्मक मांग की समस्या को और बिगाड़ देती है।
कोविड महामारी से लाभ-केंद्रित रिकवरी उन कदमों में भी झलकी है जिसकी वकालत मैं करता रहा हूं- वृद्धि का संयोजन असमानता के जरिये वृहद-आर्थिक प्रदर्शन पर सीधा असर डालता है।
एक सुस्थापित वृहद-आर्थिक धारणा है कि पूरी तरह विकसित अर्थव्यवस्थाओं में पूंजी पर प्रतिफल की दर (आर) आय में वृद्धि की दर (जी) से अधिक होती है। जब ‘आर’ ‘जी’ से अधिक होता है तो पहले इक_ा की गई संपत्ति वर्तमान में अर्जित संपत्ति से अधिक आय देने लगती है जिससे असमानता की स्थिति पैदा होती है। इस खामी को पुनर्वितरणकारी राजकोषीय नीति दूर करती है जिसमें ‘आर’ से आय कमाने वालों पर कर लगाया जाता है और ‘जी’ से आय कमाने वालों को सब्सिडी एवं सस्ते सामान दिए जाते हैं।
यह संबंध तब बनता है जब श्रम एवं पूंजी संसाधनों का पूरी तरह इस्तेमाल हुआ हो। सिर्फ उत्पादकता एवं तकनीक में बदलाव से ही आर एवं जी के मूल्यों में अंतर पैदा किया जा सकता है। लेकिन भारत जैसी उदीयमान एवं विकासशील अर्थव्यवस्थाएं परिभाषा के हिसाब से स्थिर हालत में नहीं हैं। वे विकसित अर्थव्यवस्थाओं की दिशा में बढ़ रही हैं और जब तक वे ऐसा करती रहेंगी, तब तक ‘आर’ एवं ‘जी’ के बीच विरोधी संबंध (यानी आर<जी) ही रहेगा।
आर के जी से कम होने पर अगर असमानता बढ़ती है तो वह गहरी चिंता का विषय होगा। कोविड के पहले अर्थव्यवस्था के समक्ष उत्पन्न स्थिति ऐसी ही थी। ऐसा सिर्फ मानक संबंधी कारणों से ही नहीं है, अगर एक उठती हुई लहर सभी नावों को उठा देती है तो सभी की समृद्धि बढ़ेगी और यह एक अच्छी बात है, भले ही कुछ लोग दूसरों की तुलना में अधिक संपन्न हो जाएं। हालांकि ऐसा अपने-आप नहीं होता है। ब्राजील की तुलना जापान से करें तो ब्राजील में एक स्थिर स्थिति हासिल की जा चुकी है लेकिन असमानता के चलते अब भी बड़ी संख्या में लोग गरीबी एवं बेहद नाजुक स्थिति में रहने को मजबूर हैं। इसके लिए वृद्धि कोई रामबाण औषधि नहीं है क्योंकि अब आर या तो जी के बराबर है या फिर बड़ा हो चुका है।
कोविड संकट ने अस्थायी तौर पर एक ऐसी स्थिति पैदा की है जहां ‘आर’ ‘जी’ से उच्च स्थिति में है। नतीजतन, मुनाफे के दम पर होने वाली रिकवरी ने असमानता को और बढ़ाया ही है। लेकिन सिर्फ कारोबार बहाल होने से ही समस्या दूर नहीं होगी। हम उस स्थिति में लौट आएंगे जहां आर जी से कम है लेकिन असमानता का स्तर भी बढ़ा हुआ है। आर्थिक ठहराव की आशंका गहराती और करीब नजर आ रही है जब तक हम अलग तरीके से राह नहीं बनाते हैं।
ऐसी स्थिति में यह जरूरी है कि कोविड के झटके  से उबरने में आर< जी लाभांश का इस्तेमाल मांग के आउटपुट घटक को बदलने में किया जाए क्योंकि वृद्धि की परिपाटी के मद्देनजर मांग का आउटपुट संयोजन असमतामूलक रहा है। इसने अर्थव्यवस्था को कई तरह से भयभीत किया है और सरकार की संरचनात्मक राजकोषीय कमजोरी के मूल में भी यही है। जरूरी सार्वजनिक सामान के लिए फंड मुहैया कराने वाले विवादास्पद संसाधन और लोगों को बेबसी से बचाने के लिए लगातार मदद एवं नकद अंतरण की जरूरत होती है क्योंकि वृद्धि की वजह से आने वाली समृद्धि में उनकी हिस्सेदारी नहींं होती है।
(लेखक ओडीआई, लंदन के प्रबंध निदेशक हैं। लेख में व्यक्त विचार निजी हैं।)

First Published - April 19, 2021 | 11:30 PM IST

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