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अपस्फीति की आशंका!

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बीएस संवाददाता
Last Updated- December 10, 2022 | 9:09 PM IST

साल दर साल थोक मूल्य सूचकांक (डब्ल्यूपीआई) के आधार पर मापी जाने वाली महंगाई यानी मुद्रास्फीति की दरें गिरकर शून्य के करीब पहुंच गई हैं और इसके साथ ही भारतीय अर्थव्यवस्था के अपस्फीति (डिफ्लेशन) के चरण में पहुंचने की बाबत चिंताएं उभर आई हैं।
कुल मिलाकर यह निश्चित है कि अगले कुछ हफ्तों में थोक मूल्य सूचकांक पर आधारित महंगाई दर नकारात्मक स्तर पर पहुंच जाएगी और कुछ हफ्तों तक इसी स्तर पर टिकी रहेगी। अगर महंगाई के नकारात्मक आंकड़ों को सामान्य तौर पर अपस्फीति की तरह परिभाषित किया जाता है तो वास्तव में भारतीय अर्थव्यवस्था अपस्फीति की ओर बढ़ रही है।
हालांकि महज आंकिक परिभाषा से ज्यादा गहरी चिंताएं उत्पन्न हो रही है। उपभोक्ताओं के खरीदारी से दूर रहने पर काफी मात्रा में स्टॉक जमा हो जाता है और उत्पादकों को उत्पादन में कटौती को मजबूर होना पड़ता है। इस तरह से कीमतों में गिरावट के संकेतों का उत्पादन के फैसलों पर असर पड़ता है और गिरावट का क्रम शुरू हो जाता है।
खरीदारी के लिए टाली जाने वाली उपभोक्ता वस्तुओं का हिस्सा जितना ज्यादा होता है, उतनी ही यह ताकत मजबूत होगी। वास्तव में उत्पादकों का कामगारों और उत्पादन में काम आने वाले सामान के आपूर्तिकर्ताओं से अनुबंध होता है, जो राजस्व में कमी आने केबावजूद उन्हें लागत में तत्काल कमी लाने से रोकते हैं।
इससे उनके मार्जिन पर दबाव पड़ता है और इससे छंटनी और आपूर्ति के अनुबंध की समाप्ति की नौबत आ सकती है। अगर इस तर्क पर देखा जाए तो अपस्फीति के लक्षण विभिन्न उत्पाद मसलन परिधान, टिकाऊ उपभोक्ता वस्तुओं और वाहनों आदि की कीमतों में लगातार होने वाली गिरावट से  दिखते हैं, जो इन चीजों की उत्पादन लागत के अनुपात में नहीं होती।
भारत और भारत से बाहर कम से कम इस तरह का कोई मामला फिलहाल नहीं दिखता। शून्य या नकारात्मक स्तर पर पहुंची महंगाई की दर मुख्य रूप से ऊर्जा और जिंसों की कीमतों में पिछले कुछ समय से आई नाटकीय गिरावट की वजह से है। इसके साथ ही कई जिंसों की कीमतें, जिनमें खाद्यान्न भी शामिल हैं, भी सातवें आसमान पर चली गई थीं।
ज्यादातर इलाकों में इन चीजों की कीमतें ढलान पर हैं, लिहाजा उत्पादक कीमत घटा सकते हैं। चारों तरफ सुस्त मांग ने उत्पादकों को विक्रय मूल्य में कटौती को मजबूर किया है। हालांकि साप्ताहिक डब्ल्यूपीआई आंकड़े बताते हैं कि मुद्रास्फीति की दर में आई गिरावट की मुख्य वजह ऊर्जा की कीमतों में आई कमी है।
विनिर्मित उत्पादों की कीमतों में हालांकि गिरावट नहीं आई है, अगर गिरावट आई भी है तो यह बहुत ज्यादा नहीं है, जैसी कि उनमें जिस तरह की बढ़त की चर्चा हुई है। जनवरी में आए औद्योगिक उत्पादन सूचकांक के आंकड़े बताते हैं कि टिकाऊ उपभोक्ता वस्तुओं के उत्पादन में बढ़ोतरी हुई है, हालांकि छोटे स्तर पर ही सही, पर यह अपस्फीति की परिकल्पना के अनुरूप नहीं है।
यह प्रक्रिया महत्त्वपूर्ण तौर पर कीमतों में लगातार गिरावट की उम्मीदों पर निर्भर है, पर पिछले कुछ महीनों में मौद्रिक कार्रवाई के जरिए झोंकी गई तरलता से निकट भविष्य में मुद्रास्फीति के सकारात्मक स्तर पर लौटने की उम्मीद की जा सकती है। कुल मिलाकर सच्चाई यह है कि मुद्रास्फीति के नकारात्मक आंकड़ों को अपस्फीति नहीं माना जा सकता।

First Published : March 23, 2009 | 5:32 PM IST