राजद्रोह का कानून जो औपनिवेशिक काल का अवशेष है, आजादी के 75 वर्ष बाद उसकी क्या जरूरत है? देश के मुख्य न्यायाधीश एन वी रमण ने गत गुरुवार को मोदी सरकार के महान्यायवादी से यही प्रश्न किया। यह सवाल रस्मी भी है और गहन भी। हालांकि यह पूरे प्रकरण का केंद्रीय प्रश्न नहीं है। राजद्रोह का कानून इसलिए बुरा नहीं है क्योंकि यह ब्रिटिश राज की विरासत है। हमारे अधिकांश कानून उसी युग की देन हैं। भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) भी सन 1860 में बनी थी।
राजद्रोह के कानून के साथ दिक्कत यह है कि इसके पीछे की मानसिकता औपनिवेशिक है। किसी भी देश के लोग थोपे गए शासन को पसंद नहीं करते। यहां तक कि राष्ट्रगान गाने या राजा को सलाम करने को कहा जाए तो वे गाने का ढोंग करते हुए मन ही मन कोसते रहेंगे। ऐसे में एक कानून चाहिए जो आपकी वफादारी सुनिश्चित करे।
किसी लोकतांत्रिक देश में ऐसे कानून की जगह नहीं है। यदि आप अपनी सरकार को पसंद नहीं करते (जैसा कि भारत के लोग भी करते हैं) तो आप उसकी आलोचना कर सकते हैं, उसके खिलाफ अभियान चला सकते हैं और उसे हटाने का प्रयास करते हैं। यह बात तो आधे-अधूरे लोकतंत्र में भी सामान्य है जबकि हम तो उससे काफी बेहतर हैं।
निर्वाचित सरकार चाहे वह किसी भी दल की हो, उसे जनता से सुरक्षा के लिए ऐसा कानून क्यों चाहिए? यह दुखद सत्य है कि हमारे देश में जिन कानूनों को प्रमुख दलों का समर्थन हासिल है वे सबसे बुरे कानून हैं। यही कारण है कि बीते 74 वर्ष में 14 प्रधानमंत्रियों के शासन में भी राजद्रोह का कानून खत्म नहीं किया गया।
यही वजह है कि मेरे संपादन में किसी भी प्रकाशित सामग्री में सरकार के लिए ‘शासन’ शब्द का प्रयोग वर्जित है और अगर कोई अत्यधिक नाराज आलोचक इसका इस्तेमाल करता भी है तो इसे संपादित करके हटा दिया जाता है। ऐसा इसलिए क्योंकि संवैधानिक लोकतंत्र सरकार चुनते हैं, शासक नहीं। आप अपनी सरकार को प्यार करने या उससे नफरत करने के लिए स्वतंत्र हैं। यही कारण है कि आधुनिक समय में यह कानून अश्लील है क्योंकि इसमें सरकार अपने बचाव के लिए आलोचना को अपराध घोषित कर सकती है।
हमारा लोकतंत्र इतना परिपक्व है कि राष्ट्रहित और सरकारी हित में भेद कर सके। लोकतांत्रिक देश, तानाशाही शासन वाले देशों से मजबूत इसलिए होते हैं क्योंकि उसके नागरिक अपनी सरकार की कमियां बता सकते हैं और गलतियों को रोक सकते हैं। वे भी उतने ही देशभक्त हैं जितने कि हम, बस वे चतुर और बहादुर हैं।
यह जनता की राय है। क्या आप ऐसे आलोचकों को खामोश करने के लिए ऐसे कानून का इस्तेमाल कर सकते हैं जो आजीवन कारावास की सजा दे और उनके नाम पर एक कलंक लगा दे?
उत्तर प्रदेश सरकार ने तो पत्रकारों के खिलाफ महज इसलिए राजद्रोह के मामले बना दिए क्योंकि उन्होंने ट्वीट किया था कि पुलिस की गोलीबारी से एक किसान प्रदर्शनकारी की मौत हो गई जबकि शव परीक्षण से पता चला कि उसकी मौत संभवत: दुर्घटना से हुई थी। ध्यान रहे कि इन पत्रकारों द्वारा ट्वीट में सुधार करने के बाद भी मामला दर्ज किया गया।
राज्य की पुलिस ने इन प्राथमिकियों पर अब तक कोई कार्रवाई नहीं की है लेकिन ये मामले रिकॉर्ड में हैं और अगर भविष्य में इन पत्रकारों ने सरकार को चिढ़ाने वाला कोई कदम उठाया तो इन पर कार्रवाई शुरू कर दी जाएगी। आईपीसी की धारा 505 (समस्या पैदा करना) लगाई जा सकती थी लेकिन उसका इतना असर नहीं होता। हरियाणा में सैकड़ों प्रदर्शनकारी किसानों पर सरकारी वाहन तोडऩे के लिए राजद्रोह का मुकदमा किया गया है। खासतौर पर सिरसा में विधानसभा उपाध्यक्ष रणवीर सिंह गंगवा के वाहन पर हमले में शामिल किसानों पर। ऐसे मामलों में दंगे, शासकीय कार्य में बाधा डालने जैसी धाराएं क्यों नहीं लगाई जा सकतीं?
राजद्रोह, यूएपीए और एनएसए जैसे भयंकर कानूनों को लेकर सभी राजनीतिक दल खामोशी से मिले हुए हैं। कुछ सप्ताह पहले छत्तीसगढ़ में कांग्रेस सरकार ने एक वरिष्ठ और सेवारत आईपीएस अधिकारी एडीजीपी जीपी सिंह पर कई अन्य कानूनों के साथ राजद्रोह का मामला भी लगाया। इसकी वजह जानकर आप हैरान रह जाएंगे। ऐसा इसलिए किया गया क्योंकि उनके घर पर छापा मारने वाले पुलिस दल को उनके घर के पीछे कागज के फटे हुए टुकड़े मिले और उन्हें जोडऩे पर पता चला कि सरकार को अस्थिर करने की साजिश रची जा रही थी।
इसे समझने के लिए तीन उदाहरण पर्याप्त हैं। खासतौर पर इसलिए कि वे संपूर्ण राजनीतिक फलक में फैले हुए हैं। एक वक्त महाराष्ट्र की कांग्रेस सरकार ने कार्टूनिस्ट असीम त्रिवेदी पर ऐसे ही आरोप लगाए थे। या 2003 में राजस्थान में अशोक गहलोत की सरकार ने तब विहिप के नेता रहे प्रवीण तोगडिय़ा पर और अन्नाद्रमुक ने जयललिता का मजाक उड़ाने के लिए लोक गायक कोवन पर राजद्रोह का मामला दर्ज किया। और इन दिनों तो भाजपा की सरकारें राजद्रोह के मामले यातायात पुलिस के चालान की तरह लगा रही हैं।
अब मुख्य न्यायाधीश के सवाल पर वापस आते हैं। इस कानून का इस्तेमाल इतना लोकप्रिय क्यों है जबकि दोषसिद्धि का प्रतिशत अत्यंत कम है। दरअसल ऐसे मामलों में दंडित करने का विचार नहीं होता बल्कि परेशान करने की भावना प्रमुख होती है। इसलिए क्योंकि राजद्रोह जैसी प्राथमिकी को हटाने में लंबा अरसा लगता है। यही वजह है कि अब मुख्यमंत्री कहते हैं कि बेटा ज्यादा मत बोलो नहीं तो राजद्रोह लगा दूंगा।
देश और सरकार तथा देशद्रोह और राजद्रोह एक नहीं हैं। सोशल मीडिया और ध्रुवीकरण करने वाले चैनलों ने अब हालात और बिगाड़ दिए हैं। उनमें से कुछ जानबूझकर देशद्रोह और राजद्रोह को पर्यायवाची के रूप में इस्तेमाल करते हैं।
दिलचस्प बात यह है कि हिंदी एक विकसित और लोकतांत्रिक भाषा है। यहां देशद्रोह और राजद्रोह अलग-अलग शब्द हैं लेकिन पक्षपाती बहसों में इनकी अनदेखी कर दी जाती है।
ब्रिटेन में यह कानून 2009 में खत्म कर दिया। वैसे भी इसका बहुत कम इस्तेमाल हो रहा था। परंतु हम और हमारे पड़ोसी देश अभी भी यह कानून बरकरार रखे हुए हैं। रेलवे, संसदीय प्रणाली, स्वतंत्र न्यायपालिका की तरह हमें अंग्रेजों से राजद्रोह कानून भी विरासत में मिला। दुनिया में हर जगह कमजोर प्रदर्शन वाली सरकारें देश को खतरे का सहारा लेती हैं। जोया अख्तर की फिल्म गली बॉॅय के गाने की एक पंक्ति याद करें: दो हजार अठारह है, देश को खतरा है।
समझ सकते हैं कि सरकार को इससे इतना लगाव क्यों है। यह उन्हें देश का पर्याय बताने में मदद करता है। याद रहे कि आपातकाल में डीके बरुआ के दिए नारे इंदिरा इज इंडिया, इंडिया इज इंदिरा पर हम आज भी कितने नाराज होते हैं।
परंतु कुछ प्रगति भी हुई है जो गौरतलब है। सुनवाई के पहले दिन ही महान्यायवादी ने खुलकर इस कानून का बचाव नहीं किया। उन्होंने यह जरूर कहा कि इस कानून को समाप्त नहीं किया जाना चाहिए लेकिन सुझाव दिया कि इसका दुरुपयोग रोकने के दिशानिर्देश जारी किए जाने चाहिए। हालांकि तथ्य यही है कि सर्वोच्च न्यायालय 1962 के केदार नाथ सिंह के मामले और 1995 के बलवंत सिंह मामले में दोबार इसकी समीक्षा कर चुका है। इसके बावजूद उत्तर प्रदेश सरकार पत्रकारों को ट्वीट करने पर इस कानून का प्रयोग कर रही है। इस कानून को समाप्त किया जाना चाहिए।
मुझे 30 वर्ष पहले पेशावर से 50 किलोमीटर दूर खैबर दर्रे के रास्ते पर हुई एक बातचीत याद आती है। उस समय भारतीय पत्रकारों को पाकिस्तान के जनजातीय इलाकों में जाने का परमिट मिल जाता था।
एक पख्तून दुकानदार जो खान अब्दुल गफ्फार खान का अनुयायी होने के नाते खुद को कांग्रेसी बता रहा था वह मुझे और छायाकार प्रशांत पंजियार से कह रहा था, ‘यह क्या बात हुई, मुंह खोलो तो बोलते हैं, पाकिस्तान टूट जाएगा, इस्लाम टूट जाएगा? क्या शीशे का बना है मेरा पाकिस्तान, मेरा इस्लाम?’ अगली सुनवाई में देश के मुख्य न्यायाधीश को महान्यायवादी से ऐसा ही सवाल करना चाहिए।