वैश्विक वित्तीय बाजार इस संभावना से निपटने में लगे हैं कि अमेरिकी केंद्रीय बैंक फेडरल रिजर्व द्वारा समय से पहले ब्याज बढ़ाने से कैसे निपटा जाए। हालांकि फेड की दरें तय करने वाली संस्था फेडरल ओपन मार्केट कमेटी (एफओएमसी) ने हाल ही में नीतिगत दरों को अपरिवर्तित छोड़ दिया लेकिन उसके ताजा आर्थिक अनुमान बताते हैं कि 2023 तक ब्याज दरों में 50 आधार अंकों की बढ़ोतरी की जा सकती है। एफओएमसी के कुछ सदस्यों को अगले वर्ष तक दरों में इजाफे की आशा है। यह मार्च की बैठक से बड़ा बदलाव है। उस समय अधिकांश सदस्यों ने आशा जताई थी कि 2023 तक ब्याज दरें शून्य के आसपास बनी रहेंगी। फेड के ताजा अनुमान काफी अहम हैं और उन्हें शायद महामारी को लेकर वैश्विक मौद्रिक नीतिगत प्रतिक्रिया के लिए एक अहम बिंदु माना जाएगा। अमेरिका में मौद्रिक नीति में आए बदलाव का असर पूरी दुनिया पर पड़ता है। उदाहरण के लिए 2013 में फेड द्वारा परिसंपत्ति खरीद में कटौती जिसे टैपर टैंट्रम के नाम से जाना जाता है, की बदौलत उभरते बाजारों से बड़ी तादाद में पूंजी बाहर गई और भारत में करीब-करीब नकदी संकट उत्पन्न हो गया था।
इस बार ऐसा संकट आने की आशंका नहीं है लेकिन फेड के पूर्वानुमान में बदलाव और संभावित नीतिगत परिवर्तन शायद इस समीक्षा के लिए बेहतर वक्त है कि भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) समेत केंद्रीय बैंकों ने इस पर क्या प्रतिक्रिया दी। इसके अलावा भविष्य की संभावनाओं पर भी चर्चा की जा सकती है। ध्यान रहे कि फेड के आर्थिक पूर्वानुमान बीते कुछ महीनों में लगातार बदले हैं। इससे संकेत मिलता है कि निकट से मध्यम अवधि में कुछ अनिश्चितता को नकारा नहीं जा सकता है। फेड के अधिकारी तेजी से बदलते वृहद आर्थिक माहौल को लेकर प्रतिक्रिया दे रहे हैं। शीर्ष उपभोक्ता मूल्य सूचकांक आधारित मुद्रास्फीति की दर मई में 5 फीसदी के साथ 13 वर्ष के उच्चतम स्तर पर पहुंच गई। हालांकि फेड के चेयरमैन जीरोम पॉवेल ने कहा है कि उच्च मुद्रास्फीति अस्थायी है और यह आने वाले महीनों में समाप्त हो जाएगी। जबकि कुछ अर्थशास्त्रियों का मानना है कि अमेरिकी केंद्रीय बैंक समय से पीछे चल रहा है।
गत वर्ष बड़े केंद्रीय बैंक लगभग इसी समय इसी दिशा में बढ़ रहे थे लेकिन तब के उलट इस बार नीतिगत समायोजन को खोलने की प्रक्रिया धीमी रहेगी और प्रोत्साहन का बड़ा हिस्सा स्थायी रूप से व्यवस्था में रहेगा। आने वाले समय में इसका अलग असर देखने को मिलेगा।
सेंटर फॉर इकनॉमिक पॉलिसी रिसर्च और इंटरनैशनल सेंटर फॉर मॉनिटरी ऐंड बैंकिंग स्टडीज द्वारा हाल ही में प्रकाशित एक नई संपादित पुस्तक मॉनिटरी पॉलिसी ऐंड सेंट्रल बैंकिंग इन कोविड इरा, में इस विषय पर कुछ गहन अंतर्दृष्टि प्रदान की गई है कि केंद्रीय बैंकों ने कोविड संकट को लेकर कैसी प्रतिक्रिया दी। इसलिए क्योंकि कोविड संकट सामान्य कारोबारी चक्र की मंदी या वित्तीय संकट से एकदम अलग है। पहला लक्ष्य था वित्तीय तंत्र को स्थिर करना और गलत आर्थिक आवंटन से बचना। भारी नकदी के कारण वित्तीय तंत्र में स्थिरता आने के साथ ही केंद्रीय बैंकों ने वृद्धि और मुद्रास्फीति पर ध्यान केंद्रित करना शुरू कर दिया। उभरते बाजारों के केंद्रीय बैंकों ने शुरुआती दौर में सतर्कता बरती क्योंकि बाजार अस्थिर थे। बाजार के स्थिर होते ही हालात बदल गए। केंद्रीय बैंकों ने वैश्विक वित्तीय संकट के दौरान इस्तेमाल किए उपाय बदल दिए और नए उपाय अपनाना शुरू कर दिए।
विकसित देशों में केंद्रीय बैंकों ने व्यापक परिसंपत्ति खरीद के साथ दरों को घटाकर शून्य के करीब कर दिया। उदाहरण के लिए बैंक ऑफ इंगलैंड और बैंक ऑफ कनाडा की सरकारी बॉन्ड धारिता कुल बकाया के 40 फीसदी से ऊपर निकल गई। फेडरल रिजर्व ने भी अपनी बैलेंस शीट का तेजी से विस्तार किया और वह अभी भी हर महीने 120 अरब डॉलर मूल्य के बॉन्ड खरीद रहा है। उसकी बैलेंस शीट का आकार भी महामारी के दस्तक देने के बाद से करीब-करीब दोगुना बढ़कर 8 लाख करोड़ रुपये हो चुका है। इन केंद्रीय बैंकों में से कुछ ने सीधे निजी क्षेत्र का समर्थन किया और कॉर्पोरेट बॉन्ड तथा वाणिज्यिक पत्र खरीदे।
पीपुल्स बैंक ऑफ चाइना ने 7,000 से अधिक निजी उपक्रमों को ऋण में मदद की। इसके अलावा बैकिंग तंत्र को नियामकीय राहत प्रदान की गई और केंद्रीय बैंकों ने अग्रिम निर्देशन का प्रभावी इस्तेमाल करके वित्तीय बाजारों को आश्वस्त किया। पारंपरिक सोच के विपरीत केंद्रीय बैंकों ने बड़े राजकोषीय हस्तक्षेप की सक्रिय मदद की।
आरबीआई ने नीतिगत दरें कम कीं और व्यवस्था में नकदी डाली। इसके अलावा उसने लंबी अवधि के रीपो परिचालन को लक्षित करके विभिन्न क्षेत्रों में नकदी की उपलब्धता आसान की। हालांकि भारतीय केंद्रीय बैंक ने सीधे कॉर्पोरेट पत्र नहीं खरीदकर उचित किया। उसने सक्रिय होकर सरकार की उधारी योजना का भी समर्थन किया। ब्याज दरों को नहीं बढऩे देकर इसका काफी विस्तार भी किया गया। आरबीआई ने अपने हालिया मासिक बुलेटिन में कहा, ‘…आरबीआई खुले बाजार से बड़े पैमाने पर सरकारी बॉन्ड की खरीदारी में शामिल रहा और उसने सरकार द्वारा महामारी से संबंधित प्रतिभूति जारी करने के बोझ को अपनी बैलेंस शीट पर ले लिया।’ परंतु अभी यह देखा जाना है कि आरबीआई मुद्रास्फीति के दबाव को देखते हुए प्रतिफल कर्व पर नियंत्रण कब करता है।
हकीकत में मौद्रिक समायोजन को खोलने से अधिकांश केंद्रीय बैंकों के समक्ष चुनौती उत्पन्न होगी। बड़े केंद्रीय बैंकों की नीतिगत दर शून्य है। कुछ की ब्याज दर कोविड संकट के आरंभ के पहले ही ऋणात्मक है। इतना ही नहीं केंद्रीय बैंक की बैलेंस शीट का व्यापक विस्तार हुआ है और इसका बड़ा हिस्सा शायद कभी वापस पहले जैसा न हो सके। इस संदर्भ में कई नीतिगत मुद्दे हैं जिन पर बहस करने की आवश्यकता है। उदाहरण के लिए यदि मध्यम अवधि में एक और संकट उत्पन्न होता है तो क्या केंद्रीय बैंकों के पास हालात से निपटने के उपाय होंगे? क्या निरंतर अतिरिक्त नकदी का इस्तेमाल करने से नैतिक संकट नहीं उत्पन्न होगा और जोखिम लेने का प्रोत्साहन नहीं मिलेगा? क्या तेजी से बढ़ती परिसंपत्ति कीमतें असमानता बढ़ाती रहेंगी? भारी भरकम बैलेंस शीट के साथ क्या केंद्रीय बैंक नुकसान से बचने के लिए ब्याज दरें बढ़ाने को लेकर अनिच्छुक रहेंगे क्योंकि इसका राजकोषीय असर होगा और यह उनकी स्वायत्तता को भी प्रभावित कर सकता है। अंत में क्या निंरतर मुद्रा निर्माण स्थायी रूप से बढ़ी मुद्रास्फीति के रूप में सामने आएगा? इनमें से कुछ मुद्दे आने वाले महीनों में नीतिगत बहस और यकीनन वित्तीय बाजार के रुझानों को भी संचालित करेंगे।