अमेरिकी केंद्रीय बैंक फेडरल रिजर्व के चेयरमैन जीरोम पॉवेल ने विधि निर्माताओं से कहा है कि मुद्रास्फीति अनुमान से थोड़ी ज्यादा रही है और वह अनवरत बनी हुई है। पॉवेल लगातार कह रहे हैं कि उच्च मुद्रास्फीति अस्थायी है और आने वाले महीनों में कीमतों में कमी आएगी। फेड की दरें तय करने वाली समिति ने अपनी अंतिम बैठक में ब्याज दर के अनुमान को समायोजित किया। जून में मुद्रास्फीति की दर 5.4 फीसदी थी। अधिकांश बड़े केंद्रीय बैंकों ने कोविड के कारण मची आर्थिक उथलपुथल को सीमित रखने के लिए 2020 में जमकर हस्तक्षेप किया। हालांकि आर्थिक गतिविधि में अब सुधार हो रहा है लेकिन केंद्रीय बैंक नहीं चाहते कि वे बहुत जल्दी समर्थन वापस लेने की गलती करें। ऐसा करने से सुधार की प्रक्रिया पर असर पड़ सकता है। अमेरिका में आर्थिक सुधार अनुमान से काफी बेहतर रहा है और इसका असर कीमतों पर पड़ रहा है।
बहरहाल, फेड इकलौता ऐसा केंद्रीय बैंक नहीं है जो उच्च मुद्रास्फीति की दुविधा से जूझ रहा है। भारत में समस्या और जटिल है क्योंकि मुद्रास्फीति की दर रिजर्व बैंक द्वारा तय दायरे से ऊपर निकल चुकी है जबकि सुधार की गति अनुमान से धीमी है। खुदरा मूल्य सूचकांक (सीपीआई) पर आधारित मुद्रास्फीति की दर जून में लगातार दूसरे महीने 6 फीसदी के स्तर से ऊपर रही। मूल मुद्रास्फीति भी 6 फीसदी से ऊपर रही जबकि थोकमूल्य सूचकांक आधारित मुद्रास्फीति की दर 12 फीसदी से ऊपर रही। ध्यान देने वाली बात है कि उपभोक्ता मूल्य आधारित मुद्रास्फीति गत वर्ष के उच्च आधार के बावजूद ऊंची बनी रही और आने वाले महीनों में भी उसके तेज रहने का अनुमान है। यह बात भी ध्यान देने लायक है कि अच्छे मॉनसून के अनुमान के बावजूद खरीफ फसल की बुआई में भारी गिरावट रही है जो उत्पादन और कीमतों पर असर डाल सकती है। उदाहरण के लिए गत वर्ष की तुलना में इस बार कुछ किस्म की दालों का रकबा 20 फीसदी तक कम हुआ है। अन्य घटकों के निरंतर दबाव के बीच ऊंची खाद्य कीमतें शायद निकट भविष्य में मुद्रास्फीति की दर को कम न होने दें।
यह बात केंद्रीय बैंक की मौजूदा नीतिगत स्थिति को और कठिन बना सकती है। आरबीआई का मानना है कि मुद्रास्फीति आपूर्ति क्षेत्र के झटकों से संचालित है। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि महामारी ने विसंगति पैदा की और मार्जिन और कर में इजाफा हुआ। हालांकि आर्थिक सुधार को कुछ अहम जोखिम हैं लेकिन आरबीआई को मुद्रास्फीति को लेकर अपने रुख पर पुनर्विचार करने की जरूरत है। कई केंद्रीय बैंकों मसलन रूस, तुर्की और ब्राजील ने भी ब्याज दरें बढ़ाई हैं। कहने का अर्थ यह नहीं है कि रिजर्व बैंक को भी दरों में इजाफा करना चाहिए लेकिन उसे यह अवश्य समझाना चाहिए कि वह उच्च मुद्रास्फीति को किस हद तक बरदाश्त करना चाहता है। यदि आरबीआई ने अप्रैल और मई 2020 में सीपीआई शृंखला को भंग नहीं किया होता तो वह मुद्रास्फीति संबंधी लक्ष्य हासिल करने में चूक जाती। दर लगातार तीन तिमाहियों तक बरदाश्त के दायरे की ऊपरी सीमा से अधिक रही। स्थायी रूप से उच्च मुद्रास्फीति केंद्रीय बैंक की विश्वसनीयता पर असर डालेगी और मुद्रास्फीतिक अनुमान और बढ़ेंगे। बहरहाल, केंद्रीय बैंक के अनुसार संभवत: मुद्रास्फीति का लक्ष्य भी 6 फीसदी नहीं बल्कि 4 फीसदी है। यह समझा जा सकता है कि केंद्रीय बैंक वृद्धि को बल देने पर ध्यान केंद्रित कर रहा है और उसने महामारी की शुरुआत के बाद से ही इस दिशा में कई कदम उठाए हैं लेकिन अब उसे यह भी स्पष्ट करना होगा कि वह बढ़ती मुद्रास्फीति को कैसे थामेगा। लंबे समय तक मुद्रास्फीति के ऊंचे स्तर पर बने रहने से मध्यम अवधि के आर्थिक जोखिम भी बढ़ते हैं।