इस समय कृषि जिंसों की अंतरराष्ट्रीय कीमतें भी ऊंची बनी हुई हैं लेकिन इसी बीच देश में खरीफ की ताजा फसल सरकार द्वारा तय न्यूनतम कीमतों से भी कम दाम पर बिक रही है। अक्टूबर के आधिकारिक कृषि मूल्य आंकड़ों से संकेत मिलता है कि खरीफ की विभिन्न फसलें अपने तय न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) से औसतन 33 फीसदी नीचे बिकीं। कपास और गन्ने जैसी कुछ फसलें अवश्य अपवाद रहीं। मूंगफली और सोयाबीन जैसी तिलहनी फसलों में भी हाल के महीनों में तेजी देखने को मिली लेकिन सरकार ने महत्त्वपूर्ण आयातित खाद्य तेलों पर बुनियादी आयात शुल्क को धीरे-धीरे घटाकर इस रुझान को समेट दिया। यह सही है कि फसल कटाई के बाद जब फसल बिक्री चरम पर होती है, उस समय कृषि उपजों की कीमत में गिरावट आना स्वाभाविक है लेकिन इस वर्ष किसान आंदोलन के कारण इस पर अधिक ध्यान दिया जा रहा है। आंदोलनकारी किसानों की दो प्रमुख मांगों में एक यह भी है कि एमएसपी को वैधानिक बनाया जाए। उनकी दूसरी मांग तीन नए विवादास्पद कृषि कानूनों को रद्द करने की है। ग्राहकों के लाभ के लिए मुद्रास्फीति को कम रखने के लिए कृषि उपज की कीमतों को कम रखना, उत्पादकों यानी किसानों को उचित मूल्य मिलने से रोकता है। इससे उपभोक्ताओं और उत्पादकों के हितों का अत्यधिक वांछित संतुलन बिगड़ता है। यह कृषि से जुड़ी आय को भी प्रभावित करता है जो वस्तुओं और सेवाओं की मांग को निर्धारित करती है।
मौजूदा हालात को देखें तो समर्थन मूल्य की अवधारणा ही सवालों के घेरे में आ गई है। अगर कागज पर ही रह जाना है तो 20 से अधिक फसलों के लिए नियमित रूप से एमएसपी की घोषणा करने और समय-समय पर उसमें इजाफा करने का औचित्य ही क्या है? राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय द्वारा हाल ही में जारी की गई कृषि के हालात संबंधी राष्ट्रीय रिपोर्ट दर्शाती है कि कुल उपज का केवल 24.7 फीसदी हिस्सा ही एमएसपी से ऊंचे दाम पर बिकता है। ऐसे हालात उचित नहीं हैं। खासकर यह देखते हुए कि देश के कुल घरों में से आधे से अधिक अपनी आजीविका के लिए पूरे या आंशिक तौर पर कृषि से होने वाली आय पर निर्भर हैं। इसके अलावा सरकार इस बात की प्रतिबद्धता जता चुकी है कि उत्पादकों को उनकी चुकता लागत और परिवार के श्रम पर 50 फीसदी का मुनाफा दिया जाएगा।
इसमें दो राय नहीं कि एमएसपी को कानूनी अधिकार बनाने की मांग को तवज्जो नहीं दी जा सकती है। यह न तो व्यावहारिक है और न ही इसका आर्थिक बोझ वहन किया जा सकता है। सरकार से यह आशा नहीं की जा सकती है कि वह बाजार की पूरी फसल एमएसपी पर खरीद ले। निजी व्यापारियों को भी ऐसा करने को नहीं कहा जा सकता है। परंतु किसानों को उपज का उचित मूल्य न मिलना आर्थिक और सामाजिक दृष्टि से भी ठीक नहीं है। कृषि उपज के प्रतिफल को तार्किक बनाने के लिए तरीके और साधन तलाशने होंगे। इस नजरिये से उचित होगा कि 2018 में शुरू की गई किसान आय संरक्षण योजना को दोबारा शुरू किया जाए जिसे उचित परीक्षण किए बिना ही किनारे कर दिया गया। प्रधानमंत्री अन्नदाता आय संरक्षण अभियान (पीएम-आशा) जैसे कल्पनाशील नाम वाली इस योजना का लक्ष्य था किसानों के बाजार जोखिम का बचाव करना। इसके तीन घटक थे जिनमें से दो को उचित बदलाव के बाद आजमाया जा सकता है। इसमें अहम फसलों वाले चुनिंदा इलाकों में सरकारी एजेंसियों द्वारा सरकारी खरीद आधारित बाजार हस्तक्षेप शामिल है, जो आज किया जा रहा है। दूसरा है क्षेत्रवार उत्पादन लागत आधारित आदर्श मूल्य के अंतर की भरपाई के लिए भाव के अंतर की भुगतान करना। जब तक खेती को आर्थिक दृष्टि से व्यवहार्य बनाने का कोई उपाय नहीं सामने आता, नाराज किसानों को शांत करना मुश्किल लगता है।