एक के बजाय दो सिर बेहतर होते हैं, सही है न? अगर दोनों सिर साझा लक्ष्यों की तरफ काम करें और किसी का लाभ दूसरे का नुकसान न हो तो वाकई में यह सही है। इसी वजह से कारोबार परस्पर सहयोग करते हैं। सरकार, उद्योग एवं उपभोक्ता भी ऐसा कर सकते हैं, बशर्ते केंद्र एवं राज्य सरकारें ऐसा करने का मन बनाएं। इसमें कुल मिलाकर लाभ की स्थिति होने से संभावनाएं बेहतर हो सकती हैं और सभी हितधारक एक साथ लहरों से उबर पाएंगे। समस्या तब होती है जब इस सहयोग की लागत ऊंची हो या किसी एक भागीदार को शुद्ध घाटा होने लगे या वह अपने हिस्से को असंगत मानने लगे।
आर्थिक वास्तविकता एवं समाज के आर्थिक अनुबंध (रूसो के शब्दों में) का अंग सरकार, उद्योग जगत और उपभोक्ताओं की तिकड़ी होती है और इस पर मीडिया एवं न्यायपालिका का प्रभाव भी होता है। एक समन्वित दृष्टिकोण से आर्थिक बहाली की बाधाओं को दूर करने में मदद मिल सकती है। उत्पादों एवं सेवाओं पर लागू वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) की दरों को एक उदाहरण के तौर पर देखें। किसी भी दर पर सरकारी संग्रह उस समय बढ़ जाता है जब उत्पाद या सेवा की आपूर्ति बढ़ती है। लेकिन कीमत बढऩे पर अमूमन उस सेवा या उत्पाद की मांग घट जाती है। बाजार साम्यावस्था मांग एवं आपूर्ति स्तरों पर निर्भर दाम पर उपभोक्ता को लगने वाले मूल्य के एक स्तर पर होगी। इसके विपरीत जीएसटी की दरें कम होने का मतलब मांग बढऩा होता है। महंगे उत्पादों के मामले में दर कम होने पर सरकार का जीएसटी संग्रह बढ़ जाता है। इसकी वजह यह है कि कर की दर बढऩे पर एक स्तर के बाद बिक्री राजस्व में गिरावट आने लगेगी जिसका नतीजा जीएसटी संग्रह में कमी के तौर पर सामने आएगा।
जहां सरकारी खजाना कर संग्रह पर निर्भर होता है, वहीं सरकार का उद्देश्य सत्ता में बने रहने के अलावा सार्वजनिक हित को बढ़ाना भी होना चाहिए। जब संग्रहीत कर तर्कसंगत होने के साथ जनहित में भी योगदान देते हैं तो उत्पादों एवं सेवाओं की चुकाई कीमत के बारे में उपभोक्ता के नजरिये के साथ साम्यता होती है क्योंकि इसका इस्तेमाल सरकारी कोष से जन कल्याण के लिए किया जाता है। किसी उत्पाद या सेवा के लिए एक सर्वोत्कृष्ट जीएसटी दर मानी जाती है जो समाज के लिए सार्वजनिक लाभ को अधिकतम कर दे। कर की ये दरें विनिर्माण एवं आवश्यक सेवाओं के प्रमुख क्षेत्रों को प्रभावित करती हैं। एक उदाहरण से इसे समझते हैं।
कारों एवं ऑटो उपकरणों के विनिर्माण में भारत की क्षमता पिछले कई वर्षों में व्यवस्थित ढंग से तैयार हुई है। वर्ष 2018 में 323 अरब डॉलर के कुल निर्यात का 5 फीसदी से थोड़ा अधिक हिस्सा वाहन निर्यात का था जबकि 2 फीसदी हिस्सा वाहन कलपुर्जों का था। हालांकि कई कारणों से बिक्री में सुस्ती रही जिनमें जीएसटी व्यवस्था में ढलने से जुड़ी समस्याओं की भी कुछ भूमिका रही। पहले घरेलू कर की दरें ऊंची थीं और वाहनों एवं कलपुर्जों पर जीएसटी दर को 28 फीसदी रखने के पीछे अधिक राजस्व जुटाने का मकसद था। लेकिन जीएसटी प्रणाली की जटिल संरचना एवं इसके क्रियान्वयन संबंधी अड़चनों ने जुलाई 2018 के बाद बिक्री को कम कर दिया। इसके अलावा इलेक्ट्रिक वाहनों को प्रोत्साहन, सख्त प्रदूषण मानकों को अपनाने और सुस्त पड़ती अर्थव्यवस्था से जुड़ी समस्याओं ने भी हालात को बिगाडऩे का काम किया। जीएसटी प्रणाली से जुड़ी मुश्किलों ने वाहनों के निर्यात को भी प्रभावित किया।
जीएसटी की दरों के बारे में विचार करने के तीन परिप्रेक्ष्य हैं।
पहला, अगर दरों को 28 फीसदी से घटाकर 12 फीसदी या 5 फीसदी पर लाया जाता है तो राजस्व पर पडऩे वाले उसके असर को ध्यान में रखना होगा। (अ) वाहन बाजार की अगुआ मारुति सुजूकी पर ऊंची कर दरों से प्रभावित होने की संभावना नगण्य है क्योंकि अस्थायी तौर पर बिक्री सुस्त है और उसने अपनी क्षमता पुराने निवेश से स्थापित की है। लेकिन बड़े अंतरराष्ट्रीय वाहन निर्माताओं ने अभी तक भारतीय बाजार के लिए ठोस विनिर्माण आधार नहीं तैयार किए हैं लिहाजा उनकी अलग तरह की वित्तीय मजबूरियां हो सकती हैं। अगर वे भारत के अगले 10 वर्षों में एक ठोस बाजार एवं एक मजबूत विनिर्माण आधार के रूप में तब्दील होने की उम्मीद करते हैं तो भी इस अंतरिम अवधि में नियामकीय अनिश्चितता और अपर्याप्त ढांचे की वजह से उनका उत्साह इस हद तक फीका पड़ सकता है कि वे वैकल्पिक विनिर्माण स्थलों के बारे में सोचने लगें। भारत यह मानकर नहीं चल सकता है कि यह स्वभावत: चीन का विकल्प है। बड़े विनिर्माण निवेश आकर्षित करने के लिए टिकाऊ नीतियों की जरूरत होती है और कम एवं स्थिर कर दरों से नकद प्रवाह बनाने में मदद मिलती है।
(ब) भारत का अनुभव दर्शाता है कि 2003-04 के बाद दूरसंचार ऑपरेटरों से राजस्व साझेदारी 15 फीसदी से घटाकर 8 फीसदी किए जाने के अलावा अन्य कारकों ने भी दूरसंचार कारोबार में जबरदस्त वृद्धि की जिससे सरकार को मिलने वाला राजस्व काफी बढ़ गया। वर्ष 2006-07 में स्पेक्ट्रम नीलामी होने के पहले के आठ वर्षों में राजस्व 20,000 करोड़ रुपये था लेकिन कर दर में कटौती होने से पांच वर्षों में यह बढ़कर करीब 35,000 करोड़ रुपये हो गया और फिर मार्च 2015 तक यह राजस्व बढ़कर 1.65 लाख करोड़ रुपये पर पहुंच गया।
दूसरा पहलू, ऑटो निर्यात के लिए एक सशक्त घरेलू बाजार की जरूरत होती है। घरेलू बिक्री सुस्त पडऩे और कम होते नकद प्रवाह से निर्यात बाजार पर असर पड़ सकता है जिससे विदेशी खरीदार वैकल्पिक विनिर्माण स्रोत तलाशने के लिए मजबूर हो सकते हैं। इससे घरेलू कलपुर्जे निर्माताओं पर दबाव पड़ता है जो अपना ब्रांड बनाने एवं ऑर्डर के लिए ग्राहकों के साथ संपर्कों पर निर्भर होते हैं।
तीसरा पहलू, बिक्री कम होने का रोजगार पर पडऩे वाला असर भयानक है क्योंकि यह क्षेत्र लाखों लोगों को प्रत्यक्ष एवं परोक्ष रूप से रोजगार मुहैया कराता है।
यही तर्क दूरसंचार सेवाओं के लिए डिजिटल आधारभूत ढांचे पर लगने वाले सरकारी शुल्क पर भी लागू होता है। ये शुल्क दूरसंचार नेटवर्क की स्थापना में किए गए निवेश से कहीं अधिक हैं। संसाधन आवंटन एवं कीमत-निर्धारण की गलत नीतियों, कानून की संदिग्ध व्याख्या को लागू करने की उत्कंठा और चयनात्मक वरीय या अनुचित बरताव ने इन जरूरी सेवाओं पर गहरा असर डाला है। सरकारों के दोषपूर्ण कानूनी दांवपेच ने भारत की उत्पादक क्षमता को गंभीर क्षति पहुंचाई है और इस राह पर चलने से आगे भी यही होता रहेगा। इसके बजाय सोच-समझकर बनाई गई नीतियों और जनहित को ध्यान में रखते हुए निर्धारित कीमतें एक चमकदार क्षेत्र का रास्ता तैयार करेंगी जिसमें देशव्यापी उत्पादकता के लिए अधिक असरदार डिजिटल ब्रॉडबैंड नेटवर्क और जीवन के बेहतर हालात होंगे।
हमारी सरकारें पुरानी सोच, कानूनों एवं नियमों पर टिके रहने के बजाय बेहतर नतीजों के लिए उद्योग जगत एवं उपभोक्ताओं के साथ मिलकर काम करने का विकल्प चुन सकती हैं। इसके लिए कहीं अधिक रचनात्मक रवैये की जरूरत होती है। इसके अलावा अपनी खामियों को भी ईमानदारी से स्वीकार करना होता है। ये खामियां संगठन एवं प्रबंधन के संस्थागत समर्थन, व्यवस्थागत दृष्टिकोण, सरकारी भुगतान प्रक्रिया में अनुशासन, पेशेवर सुविधा, कानूनी कठोरता, निर्णय के लिए विशेषज्ञ वित्तीय मॉडल एवं अनुरूपण से संबंधित हैं।
प्रशासनिक प्रतिष्ठान एवं राजनीतिक नेतृत्व दोनों को इसे व्यवस्थित तरीके से लागू करने के लिए कमर कसने की जरूरत है। इसके मूल में एक आर्थिक अनुबंध के आधार के तौर पर सहयोग का तर्क रखना होगा।