भू-राजनीतिक संकट के बीच निवेशकों के लिए सबसे बड़ा खतरा सिर्फ बाजार नहीं, बल्कि अपनी भावनाओं में आकर पैनिक सेलिंग करना है। व्हाइटओक कैपिटल म्युचुअल फंड की नई रिपोर्ट के मुताबिक, ऐसे समय में सबसे सुरक्षित तरीका है अपनी पहले से तय एसेट एलोकेशन स्ट्रैटेजी पर टिके रहना। रिपोर्ट, जिसका नाम है “जब दुनिया खतरनाक महसूस होती है: क्यों आपका पोर्टफोलियो घबराए नहीं”, में कहा गया है कि तेज उतार-चढ़ाव और डराने वाली खबरों के बावजूद लंबी अवधि में रिटर्न पर इसका असर सामान्यतः कम होता है। फंड हाउस का कहना है कि संकट के दौरान भावनाओं में आकर लिए गए निर्णय अक्सर निवेशकों के लिए वास्तविक संकट से ज्यादा नुकसानदेह साबित होते हैं।
रिपोर्ट में कहा गया है कि एसेट एलोकेशन बाजार के झटकों को झेलने के लिए एक ढाल के रूप में काम करता है। अच्छी तरह से डायवर्सिफाइड पोर्टफोलियो में अनिश्चितता के दौर में सुरक्षा पहले से ही शामिल होती है।
व्हाइटओक कैपिटल म्युचुअल फंड ने कहा कि भू-राजनीतिक झटके लंबे समय के निवेश रिटर्न को खत्म नहीं करते। जब संकट आता है और बाजार गिरते हैं, तो आपके पोर्टफोलियो में इक्विटी का हिस्सा अपने आप प्रतिशत के हिसाब से कम हो जाता है। वहीं इक्विटी की तुलना में स्थिर रहने वाली डेट और गोल्ड का हिस्सा पोर्टफोलियो में बढ़ जाता है।
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रिपोर्ट में कहा गया है कि निवेशकों को अपना एसेट एलोकेशन अपने वित्तीय लक्ष्यों (financial goals) और जोखिम उठाने की क्षमता (risk appetite) के आधार पर तय करना चाहिए, न कि भू-राजनीतिक हालात को देखकर।
उदाहरण के लिए, एक मध्यम जोखिम उठाने वाले निवेशक (moderate investor) के लिए पोर्टफोलियो में 65% इक्विटी, 25% डेट और 10% गोल्ड रखा जा सकता है। इसके साथ रीबैलेंसिंग की एक सीमा (आमतौर पर ±5%) तय करनी चाहिए। यदि इक्विटी का हिस्सा 60% से नीचे गिर जाए या 70% से ऊपर चला जाए, तो पोर्टफोलियो को फिर से 65% के स्तर पर रीबैलेंस कर लेना चाहिए। जब बाजार में उतार-चढ़ाव कम होता है, तो इस स्ट्रैटेजी पर चलना बेहतर माना जाता है।
रिपोर्ट के मुताबिक, भू-राजनीतिक संकट के दौरान भावनाओं में आकर पैनिक सेलिंग करने वाले निवेशकों का प्रदर्शन अक्सर कमजोर रहता है। इसके मुकाबले वे निवेशक बेहतर प्रदर्शन करते हैं जो धैर्य और अनुशासन बनाए रखते हैं।
ऐसा इसलिए नहीं है कि पैनिक सेलिंग करने वाले निवेशक निवेश चुनने में कमजोर होते हैं। असल वजह यह है कि वे अक्सर गलत समय पर बाजार से बाहर निकल जाते हैं। इसके बाद वे लंबे समय तक निवेश से दूर रहते हैं और फिर बाजार के ऊंचे स्तर पर दोबारा निवेश करते हैं। कई बार तो वे दोबारा बाजार में लौट ही नहीं पाते।
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पैनिक सेलिंग सिर्फ निवेश से जुड़ा फैसला नहीं, बल्कि एक मनोवैज्ञानिक प्रतिक्रिया होती है। जब भी कोई संकट आता है, तो हमारा दिमाग और हमारी इंद्रियां हमें तुरंत कुछ करने के लिए उकसाने लगती हैं। ऐसे समय में जब दुनिया संकट में दिखती है, तो कुछ न करना हमें गैर-जिम्मेदाराना लगता है। दिमाग यह सोचने लगता है कि समझदार निवेशक जरूर कोई कदम उठा रहे होंगे। वे या तो अपनी पूंजी की सुरक्षा कर रहे होंगे या डिफेसिंव स्ट्रैटेजी अपना रहे होंगे, इसलिए हमें भी ऐसा ही करना चाहिए।
नुकसान खुद संकट से नहीं, बल्कि उससे घबराकर दी गई प्रतिक्रिया से होता है। आम तौर पर ऐसे समय में यह होता है:
स्टेज 1: ‘पैनिक सेल क्राइसिस’ की शुरुआत
बाजार गिरने के बाद आप यह सोचकर इक्विटी बेच देते हैं कि हालात अभी और खराब होंगे। इसके बाद आप खुद को सुरक्षित और समझदार महसूस करते हुए पैसा कैश या गोल्ड में लगा देते हैं।
स्टेज 2: ‘फ्रोजन वेट’ का दौर
बाजार में उतार-चढ़ाव जारी रहता है- कुछ दिन तेजी, तो कुछ दिन गिरावट। ऐसे में निवेशक दोबारा निवेश करने से पहले “स्पष्टता” या हालात के सामान्य होने का इंतजार करते हैं।
लेकिन छोटी अवधि में स्पष्टता शायद ही कभी मिलती है। सुर्खियां डर पैदा करती रहती हैं। उदाहरण के लिए, रूस-यूक्रेन युद्ध 2026 तक जारी है, फिर भी बाजार युद्ध से पहले के स्तर से काफी ऊपर जा चुके हैं।
स्टेज 3: ‘पेनफुल मिस’ का दौर
जब बाजार निचले स्तर से 20%, 30% या 40% तक उछाल मार लेते हैं, तब भी आप कैश में बैठे रहते हैं। अब बाजार में दोबारा निवेश करना महंगा लगता है। इस तरह आपने न सिर्फ नुकसान को लॉक कर लिया, बल्कि रिकवरी का मौका भी गंवा दिया। आपकी अस्थायी सुरक्षा ही स्थायी कमजोर प्रदर्शन में बदल जाती है।
उदाहरण के तौर पर, कोविड-19 महामारी के दौरान मार्च 2020 में कई निवेशकों ने घबराकर अपने सारे निवेश बेच दिए थे। उस समय तर्क दिया जा रहा था कि महामारी कई साल तक चलेगी। टीवी पर कई एक्सपर्ट्स यह भी कह रहे थे कि NIFTY-50 5,000 तक गिर सकता है। लेकिन जब जनवरी 2021 में हालात अपेक्षाकृत सुरक्षित लगे और लोगों ने दोबारा निवेश करने के बारे में सोचा, तब तक निफ्टी 14,000 के करीब पहुंच चुका था। इस तरह 2020 के निचले स्तर से आए करीब 84% के उछाल का मौका सिर्फ इसलिए छूट गया क्योंकि निवेशक उस स्पष्टता का इंतजार करते रहे जो कभी आई ही नहीं।
भू-राजनीतिक झटके अक्सर भावनाओं से जुड़े झटके होते हैं। ये डर, अस्थिरता और नाटकीय सुर्खियां पैदा करते हैं, खासकर अगर आप टीवी न्यूज चैनलों को सुनें तो हालात बेहद गंभीर लगने लगते हैं। लेकिन ज्यादातर मामलों में ये अर्थव्यवस्था की बुनियादी व्यवस्था को नहीं तोड़ते। इसलिए भू-राजनीतिक उतार-चढ़ाव के समय सही रणनीति यह नहीं है कि आप अपना पोर्टफोलियो बार-बार बदलें, बल्कि अपनी तय रणनीतिक एसेट एलोकेशन पर अनुशासन के साथ टिके रहें और बाजार की अस्थिरता को धैर्य के साथ झेलें।