STT Hike Budget 2026: शेयर बाजार निवेशकों और खासकर डेरिवेटिव्स ट्रेडिंग सेगमेंट में ट्रेडिंग करने वाले निवेशकों के लिए बजट 2026 में खर्च बढ़ने वाला एक अहम बदलाव सामने आया है। वित्त मंत्री सीतारमण ने रविवार को कहा कि सभी प्रकार के शेयरहोल्डर्स के लिए बायबैक से मिलने वाली रकम पर कैपिटल गेन टैक्स लगाया जाएगा।
वित्त वर्ष 2026–27 का यूनियन बजट पेश करते हुए उन्होंने कमोडिटी फ्यूचर्स पर सिक्योरिटीज ट्रांजैक्शन टैक्स (STT) को 0.02 प्रतिशत से बढ़ाकर 0.05 प्रतिशत करने का भी प्रस्ताव रखा। इसके अलावा, वित्त मंत्री ने कहा कि मिनिमम अल्टरनेट टैक्स (MAT) को फाइनल टैक्स बनाया जाएगा और इसकी दर को मौजूदा 15 प्रतिशत से घटाकर 14 प्रतिशत किया जाएगा।वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने रविवार को बजट भाषण के दौरान डेरिवेटिव्स सेगमेंट पर सिक्योरिटीज ट्रांजैक्शन टैक्स (STT) बढ़ाने का प्रस्ताव रखा। इससे यह संकेत मिलता है कि सरकार इसे नियंत्रित करना चाहती है।
इस प्रस्ताव के तहत ऑप्शंस प्रीमियम पर एसटीटी को 0.1 प्रतिशत से बढ़ाकर 0.15 प्रतिशत किया जाएगा। जबकि फ्यूचर्स सौदों पर एसटीटी 0.05 प्रतिशत कर दी जाएगी। इसका मतलब यह है कि जो निवेशकों के जार डेरिवेटिव्स ट्रेड पर उन्हें अब पहले से ज्यादा टैक्स देना होगा।
हालांकि, लॉन्ग टर्म निवेशकों पर इसका असर सीमित रहने की उम्मीद है। लेकिन एक्टिव ट्रेडर्स, इंट्रा-डे ट्रेडर्स और हाई-फ्रीक्वेंसी ट्रेडर्स के लिए एसटीटी में बढ़ोतरी से ट्रेडिंग लागत काफी बढ़ सकती है और मुनाफे के मार्जिन पर दबाव पड़ सकता है।
कोटक सिक्योरिटीज के एमडी और सीईओ श्रीपाल शाह ने कहा, ”फ्यूचर्स और ऑप्शंस (F&O) पर एसटीटी में तेज बढ़ोतरी, जो पिछले साल की बढ़ोतरी के ऊपर की गई है, ट्रेडर्स, हेजर्स और आर्बिट्राज करने वालों के लिए लेनदेन लागत बढ़ा सकती है। इससे डेरिवेटिव्स में गतिविधियां ठंडी पड़ सकती हैं और ट्रेडिंग वॉल्यूम में कमी आने की आशंका है।”
उन्होंने कहा, ”ऐसा लगता है कि सरकार का मकसद रेवेन्यू बढ़ाने से ज्यादा वॉल्यूम को नियंत्रित करना है। ऐसा इसलिए क्योंकि एसटीटी से मिलने वाला संभावित अतिरिक्त राजस्व भी डेरिवेटिव्स के कम होते वॉल्यूम से बेअसर हो सकता है।”
पॉल एसेट में इक्विटी रिसर्च एनालिस्ट और 129 वेल्थ फंड में फंड मैनेजर प्रसेनजीत पॉल ने कहा, ”एसटीटी में F&O पर 0.05% तक की बढ़ोतरी और शेयर बायबैक पर नए टैक्स नियम के चलते शेयर बाजार ने नकारात्मक प्रतिक्रिया दी है। इसके कारण निफ्टी और सेंसेक्स में इंट्रा-डे के दौरान तेज बिकवाली देखने को मिली। इन कदमों से लेनदेन की लागत बढ़ती है और उन ट्रेडर्स के साथ कंपनियों की शॉर्ट टर्म इकॉनॉमिक्स प्रभावित होती है, जो कैपिटल रिटर्न के लिए बायबैक पर निर्भर रहती हैं।”
चॉइस ब्रोकिंग में रिसर्च एनालिस्ट आकाश शाह ने कहा कि फ्यूचर्स पर 0.02% से 0.05% और ऑप्शंस प्रीमियम व एक्सरसाइज पर 0.15% डेरिवेटिव्स में ट्रेड करने वालों के लिए खर्च को काफी बढ़ा देती है। यह कोई छोटा बदलाव नहीं, बल्कि बड़ा इजाफा है। इसका सीधा असर F&O में ट्रेडिंग वॉल्यूम पर पड़ सकता है। खासकर हाई-फ्रीक्वेंसी ट्रेडर्स, प्रॉप ट्रेडिंग डेस्क और कम लागत वाली रणनीतियों पर।
उन्होंने कहा कि विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) के लिए भी यह बदलाव अहम है। जो एफपीआई इंडेक्स और स्टॉक डेरिवेटिव्स में सक्रिय हैं, उनके लिए ज्यादा एसटीटी का मतलब कम नेट रिटर्न है और भारत तुलनात्मक रूप से महंगा बाजार बन जाता है। लॉन्ग-टर्म निवेश करने वाले एफपीआई पर इसका असर सीमित रह सकता है। लेकिन शॉर्ट-टर्म और डेरिवेटिव्स-फोकस्ड विदेशी निवेश में कुछ कमी आ सकती है। कुछ वैश्विक फंड अपनी गतिविधियां कम लागत वाले एशियाई बाजारों की ओर भी मोड़ सकते हैं।