भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (सेबी) बॉन्ड के टोकनाइजेशन का ट्रायल करने के लिए एक पायलट प्रोजेक्ट शुरू करने की योजना बना रही है। इसके तहत यह पता लगाया जाएगा कि साझा लेजर तकनीक (shared-ledger technology) से बॉन्ड के निपटान की प्रक्रिया को तेज और ज्यादा कुशल बनाया जा सकता है या नहीं।
सेबी के पूर्णकालिक सदस्य अमरजीत सिंह ने गुरुवार को कहा कि भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के साथ मिलकर इस पायलट प्रोजेक्ट को आगे बढ़ाया जा रहा है। इसमें यह जांच की जाएगी कि साझा लेजर के जरिए प्रतिभूतियों और पैसे का एक साथ हस्तांतरण संभव है या नहीं। इससे लेनदेन के मिलान (reconciliation) की लागत कम हो सकती है। उन्होंने कहा कि पायलट प्रोजेक्ट के तहत स्मार्ट कॉन्ट्रैक्ट के जरिए कूपन पेमेंट और बॉन्ड से जुड़ी अन्य सर्विसिंग गतिविधियों को ऑटोमेट करने की संभावना का भी आकलन किया जाएगा।
यह पहल कॉर्पोरेट बॉन्ड मार्केट में एक्सेस, पारदर्शिता और दक्षता को बेहतर बनाने के लिए सेबी की कोशिशों का हिस्सा है। सिंह ने साफ किया कि टोकनाइजेशन का मकसद कोई अलग ट्रेडिंग मार्केट बनाना नहीं है, बल्कि यह पता लगाना है कि क्या टेक्नोलॉजी मौजूदा मार्केट को आसान, तेज और ज्यादा कुशल बना सकती है।
Also Read: SEBI का बड़ा प्लान! विदेशी निवेशकों को वापस लाने की तैयारी, ट्रेडिंग नियमों में बड़े बदलाव संभव
इसके अलावा, सेबी कॉरपोरेट बॉन्ड रेपो बाजार को बढ़ावा देने के उपायों पर भी विचार कर रहा है। फिलहाल कुल रेपो बाजार में कॉरपोरेट बॉन्ड रेपो की हिस्सेदारी 1 फीसदी से भी कम है। सिंह ने कहा कि सामान्य दिनों में कॉरपोरेट बॉन्ड रेपो का कारोबार करीब 6,000 करोड़ रुपये का होता है।
रेगुलेटर इस सेगमेंट को मजबूत करने के उपायों पर विचार कर रहा है। साथ ही सिक्योरिटीज की लेंडिंग और बॉरोइंग तथा शॉर्ट सेलिंग के लिए एक समझदारी भरा फ्रेमवर्क भी तैयार किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि इनमें से कुछ मुद्दे सेबी के अधिकार क्षेत्र से बाहर के हैं और रेगुलेटर संबंधित अधिकारियों के साथ इस पर बातचीत कर रहा है।
ये कदम ऐसे समय में उठाए जा रहे हैं जब सेबी कॉरपोरेट बॉन्ड बाजार में सेकंडरी मार्केट की लिक्विडिटी बढ़ाने की कोशिश कर रहा है। करीब 33,000 बकाया इंस्ट्रूमेंट्स में से सामान्य दिनों में केवल 400-500 बॉन्ड में ही कारोबार होता है। नियामक वित्त वर्ष 2026-27 के केंद्रीय बजट में प्रस्तावित औपचारिक मार्केट-मेकिंग फ्रेमवर्क पर भी काम कर रहा है।
इस बाजार के सामने एक बड़ी चुनौती इसका बिखरा हुआ होना है। करीब 7,200 इश्यूअर्स के बीच लगभग 33,000 इंस्ट्रूमेंट्स फैले हुए हैं। सेबी कम संख्या में बेंचमार्क इंटरनेशनल सिक्योरिटीज आइडेंटिफिकेशन नंबर (ISINs) में बॉन्ड इश्यू को केंद्रित करने के तरीकों पर विचार कर रहा है। इसके साथ ही इश्यूअर्स की ओर से बॉन्ड बायबैक, लिक्विडिटी सपोर्ट व्यवस्था और रिक्वेस्ट-फॉर-कोट (RFQ) प्लेटफॉर्म को और विकसित करने पर भी विचार किया जा रहा है।
भारत में बकाया कॉरपोरेट बॉन्ड का आकार वित्त वर्ष 2015 के अंत में करीब 17.5 लाख करोड़ रुपये था। जुलाई 2026 के अंत तक यह बढ़कर 60 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा हो गया है।