भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) टोकनाइज्ड फाइनैंस की दिशा में एक बड़ा कदम उठाने की तैयारी कर रहा है। इसके तहत अगले हफ्ते डीमैट 2.0 शुरू करने की योजना है। टोकनाइज्ड परिसंपत्तियों को रखने के लिए यह नया ढांचा होगा। सूत्रों के मुताबिक यह पायलट लॉन्च हो सकता है और इसी के साथ देश का पहला टोकनाइज्ड बॉन्ड भी जारी किया जा सकता है। जानकार लोगों ने बताया कि सेटलमेंट के लिए भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) की सेंट्रल बैंक डिजिटल करेंसी (सीबीडीसी) या डिजिटल रुपये का इस्तेमाल किया जाएगा, जिससे लेनदेन तेजी से हो सकेंगे।
सूत्रों ने बताया कि भारत में दोनों डिपॉजिटरी की आईटी और परिचालन टीमें मिलकर डीमैट 2.0 पर काम कर रही हैं। नया खाता पारंपरिक डिपॉजिटरी लेजर के बजाय डिस्ट्रिब्यूटेड लेजर टेक्नॉलजी पर टोकनाइज्ड बॉन्ड या परिसंपत्तियों की होल्डिंग को रिकॉर्ड करेगा। उम्मीद है कि इससे लेनदेन और सेटलमेंट की प्रक्रिया में शामिल कई चरण खत्म हो जाएंगे।
मामले के जानकार व्यक्ति ने कहा, अगले हफ्ते ग्लोबल फिनटेक फेस्ट के दौरान आरईसी की ओर से पहला टोकनाइज्ड बॉन्ड जारी किए जाने की उम्मीद है। इसके साथ ही डीमैट 2.0 को भी लॉन्च किया जा सकता है। इस बारे में जानकारी के लिए सेबी को भेजे गए ईमेल का कोई जवाब नहीं मिला।
सरकारी बिजली वित्त कंपनी आरईसी के टोकनाइज्ड बॉन्ड जारी करने वाली पहली कंपनी बनने की उम्मीद है। विशेषज्ञों ने बताया कि आरईसी की प्रस्तावित प्रायोगिक परियोजना में बॉन्ड के निजी नियोजन और आवंटन के लिए सामान्य इलेक्ट्रॉनिक खातों की व्यवस्था का ही इस्तेमाल किया जाएगा। लेकिन आवंटन के बाद टोकनाइज्ड बॉन्ड को डीमैट 2.0 नाम के सिक्योरिटीज वॉलेट में रखा जाएगा। यह मौजूदा डीमैट का ही एक विस्तार है, जिसमें प्रतिभूतियां रखी जाती हैं।
उन्होंने कहा कि निवेशकों को दूसरा डीमैट खाता खोलने या अलग से केवाईसी प्रक्रिया से गुजरने की जरूरत शायद नहीं पड़ेगी। भुगतान के लिए निवेशक के पास एक सीबीडीसी वॉलेट होना चाहिए, जो आरबीआई की ओर से जारी डिजिटल रुपया है। यह किसी तय बैंक खाते से जुड़ा होना चाहिए। प्रतिभूतियां जहां डीमैट 2.0 में रहेंगी, वहीं डिजिटल रुपया सीबीडीसी वॉलेट में रहेगा।
रॉकफोर्ट फिनकैप एलएलपी के संस्थापक और प्रबंध साझेदार वेंकटकृष्णन श्रीनिवासन ने कहा, इस प्रस्तावित सिस्टम में पूरी तरह से अलग टोकनाइज्ड एक्सचेंज बनाने के बजाय मौजूदा ट्रेडिंग इन्फ्रास्ट्रक्चर का इस्तेमाल जारी रखने की योजना है जबकि कूपन और रीडम्पशन पेमेंट को स्मार्ट कॉन्ट्रैक्ट्स के जरिये ऑटोमेट किया जा सकता है। संस्थागत निवेशकों को इसके तुरंत फायदे होंगे – तेजी से और ज्यादा कुशल सेटलमेंट, परिचालन से जुड़ी कम दिक्कतें और बॉन्ड की पूरी अवधि में बेहतर पारदर्शिता।
उन्होंने कहा, असली परीक्षा यह होगी कि क्या बेहतर इन्फ्रास्ट्रक्चर से निवेशकों की भागीदारी और सेकंडरी बाजार में लिक्विडिटी बढ़ेगी। जैसे-जैसे सिस्टम का दायरा बढ़ेगा, साइबर सुरक्षा, परिचालन सुदृढ़ता और इंटरऑपरेबिलिटी का सावधानी से प्रबंधन भी करना होगा। जानकारों का कहना है कि आरईसी इस प्रायोगिक परियोजना के लिए सही है क्योंकि वह पीएसयू बॉन्ड बाजार में नियमित तौर पर बॉन्ड जारी करने वाली कंपनियों में से एक है और उसका क्रेडिट प्रोफाइल एएए रेटिंग वाला है।
बॉन्डस्कैनर के संस्थापक और सीईओ निश्चय नाथ ने कहा, केंद्रीय बैंक मनी का इस्तेमाल करके जुड़े हुए डिजिटल सिस्टम पर पैसे और प्रतिभूतियों का सेटलमेंट करने से ही असल में काम में तेजी और कुशलता आएगी है। इससे सेटलमेंट तेजी से होगा और काउंटरपार्टी व रिकॉन्सिलिएशन से जुड़ा जोखिम कम होंगे। लेकिन यह एक सीमित प्रायोगिक परियोजना है, जो सिर्फ कुछ खास निवेशकों के लिए है, न कि आम लोगों के लिए। साथ ही, इसमें लॉक-इन की शर्त है और अभी इसके लिए कोई ओपन सेकंडरी मार्केट भी नहीं है।
उद्योग के प्रतिभागियों ने कहा कि सेकंडरी बाजार की ट्रेडिंग में ज्यादा लोग शामिल हो सकते हैं। लेकिन अभी इस प्रायोगिक परियोजना को एक जाने-पहचाने और अच्छी क्वॉलिटी वाले जारीकर्ता और निवेशकों के सीमित समूह के साथ शुरू किया जा रहा है। इससे इकोसिस्टम को टोकनाइज्ड बॉन्ड जारी करने, आवंटन, होल्डिंग, सेटलमेंट और ब्याज से जुड़े इन्फ्रास्ट्रक्चर की परख करने का मौका मिलेगा।
एडवोनेट के पार्टनर प्रभकरण सिंह लल्ली ने कहा, इस प्रायोगिक परियोजना की दिलचस्प बात सिर्फ टोकनाइजेशन नहीं है, बल्कि यह है कि सेबी और आरबीआई आखिरकार प्रतिभूतियों के सेटलमेंट और पेमेंट सेटलमेंट को एक ही सिस्टम पर होने दे रहे हैं। बॉन्ड बाजार में काम करने वाले किसी भी व्यक्ति को पता है कि असल दिक्कतें रिकॉन्सिलिएशन में देरी की वजह से आती हैं, न कि बॉन्ड जारी करने से जुड़े कागजी काम में।