प्रतीकात्मक तस्वीर | फाइल फोटो
केंद्र सरकार ने बुधवार को अक्सर पूछे जाने वाले सवालों (FAQs) का एक सेट जारी किया, जिसमें भारत के ताजा जीडीपी अनुमानों के पीछे अपनाई गई कार्यप्रणाली (methodology) को समझाया गया है। साथ ही, संशोधित जीडीपी सीरीज को लेकर उठ रहे सवालों का भी जवाब दिया गया है।
यह कदम केंद्र सरकार द्वारा वित्त वर्ष 2025-26 की पहली तिमाही (Q1FY26) के जीडीपी अनुमान में संशोधन के बाद उठाया गया है। सरकार ने 2022-23 को आधार वर्ष बनाकर नई जीडीपी सीरीज पेश की है, जिसमें अपडेटेड आंकड़ों और नई पद्धतियों को शामिल किया गया है। पुरानी 2011-12 आधार वर्ष वाली सीरीज के तहत Q1FY26 का मौजूदा कीमतों पर जीडीपी अनुमान 86.05 लाख करोड़ रुपये था, जो अब संशोधित होकर 80 लाख करोड़ रुपये हो गया है।
राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (NSO) की ओर से सोमवार को जारी आंकड़ों के अनुसार, वित्त वर्ष 2026-27 की जून तिमाही में भारत की अर्थव्यवस्था 7.8 फीसदी की दर से बढ़ी। इससे पिछली यानी वित्त वर्ष 2025-26 की मार्च तिमाही में आर्थिक वृद्धि दर 8.6 फीसदी रही थी। इस बीच, जून तिमाही में नॉमिनल जीडीपी की वृद्धि दर बढ़कर 10.3 फीसदी हो गई, जबकि इससे पिछली मार्च तिमाही में यह 9.1 फीसदी थी।
1. पिछले साल के जीडीपी आंकड़े में संशोधन क्यों किया गया?
केंद्र सरकार ने कहा कि इस संशोधन को “पिछले साल की जीडीपी में जानबूझकर की गई कटौती, ताकि मौजूदा साल की वृद्धि दर को यांत्रिक तरीके से बढ़ाया जा सके” के तौर पर देखना गलत होगा।
वित्त वर्ष 2025-26 की पहली तिमाही में मौजूदा कीमतों पर जीडीपी का अनुमान पुरानी 2011-12 आधार वर्ष वाली सीरीज के तहत पहले 86.05 लाख करोड़ रुपये लगाया गया था। फरवरी 2026 में 2022-23 को आधार वर्ष बनाकर नई जीडीपी सीरीज लागू किए जाने के बाद इसे संशोधित कर 80.32 लाख करोड़ रुपये कर दिया गया।
इसके बाद जून में इसे फिर संशोधित कर 80.44 लाख करोड़ रुपये किया गया और नई आईआईपी (औद्योगिक उत्पादन सूचकांक) और पीपीआई (उत्पादक मूल्य सूचकांक) सीरीज को शामिल करने के बाद यह अनुमान घटकर 80 लाख करोड़ रुपये रह गया।
केंद्र सरकार ने कहा, “86.05 लाख करोड़ रुपये से 80 लाख करोड़ रुपये तक का बदलाव आधार वर्ष में परिवर्तन, बेहतर डेटा स्रोतों और पद्धतियों को शामिल करने तथा उपलब्ध संकेतकों को अपडेट करने के कारण जीडीपी सीरीज में किए गए क्रमिक संशोधनों का नतीजा है।”
सरकार ने यह भी स्पष्ट किया कि 86.05 लाख करोड़ रुपये के पुराने आंकड़े की तुलना सीधे तौर पर वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही के ताजा जीडीपी अनुमान से नहीं की जा सकती, क्योंकि दोनों आंकड़े अलग-अलग जीडीपी सीरीज से संबंधित हैं।
2. नई जीडीपी सीरीज में वास्तव में क्या बदला है?
नई जीडीपी सीरीज में 2011-12 की जगह 2022-23 को आधार वर्ष बनाया गया है। इसमें नए डेटा स्रोतों को भी शामिल किया गया है। इनमें उत्पादक मूल्य सूचकांक (पीपीआई) और बैंकिंग सर्विसेज प्राइस इंडेक्स शामिल हैं, जिनका आधार वर्ष 2022-23 है।
केंद्र सरकार के अनुसार, इसमें एक बड़ा पद्धतिगत बदलाव मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर के लिए ‘डबल डिफ्लेशन’ पद्धति को अपनाना है। इस पद्धति के तहत उत्पादन (Output) और मध्यवर्ती खपत (Intermediate Consumption) को अलग-अलग कीमतों के प्रभाव से समायोजित किया जाता है। इसके बाद स्थिर कीमतों (Constant Prices) पर सकल मूल्य वर्धन (GVA) की गणना की जाती है।
सरकार ने कहा कि नई पद्धति पहले की तुलना में ज्यादा मजबूत और बेहतर है। वहीं, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) भी वॉल्यूम के आधार पर जीडीपी की गणना के लिए डबल डिफ्लेशन को पसंदीदा पद्धति मानता है।
3. जब उत्पादन और इनपुट दोनों की कीमतें बढ़ रही हों, तो मैन्युफैक्चरिंग में महंगाई नेगेटिव कैसे हो सकती है?
सरकार ने बताया कि डबल डिफ्लेशन पद्धति के तहत मैन्युफैक्चरिंग के उत्पादन और मध्यवर्ती खपत को कीमतों में बदलाव के असर को ध्यान में रखते हुए अलग-अलग समायोजित किया जाता है।
जब इनपुट की कीमतें उत्पादन की कीमतों की तुलना में तेज गति से बढ़ती हैं, तो नॉमिनल जीवीए की वृद्धि वास्तविक जीवीए की तुलना में धीमी हो सकती है। इसके परिणामस्वरूप इंप्लिसिट जीवीए डिफ्लेटर नेगेटिव हो सकता है।
वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही में मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर का नॉमिनल जीवीए 7.7 फीसदी बढ़ा, जबकि रियल जीवीए 9.2 फीसदी बढ़ा। इसके परिणामस्वरूप इंप्लिसिट जीवीए डिफ्लेटर -1.5 फीसदी रहा।
सरकार ने आगे स्पष्ट किया कि “मैन्युफैक्चरिंग के इंप्लिसिट डिफ्लेटर में नेगेटिव महंगाई का मतलब यह नहीं है कि मैन्युफैक्चरिंग उत्पादों की कीमतें घट गई हैं।”
4. जीडीपी महंगाई, सीपीआई और डब्ल्यूपीआई की महंगाई अलग क्यों होती है?
केंद्र सरकार ने कहा कि ये तीनों सूचकांक अर्थव्यवस्था के अलग-अलग हिस्सों को मापते हैं।
सीपीआई (उपभोक्ता मूल्य सूचकांक) घरों द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली वस्तुओं और सेवाओं की एक निश्चित टोकरी की कीमतों में बदलाव को मापता है। वहीं, डब्ल्यूपीआई (थोक मूल्य सूचकांक) थोक स्तर पर बड़ी मात्रा में कारोबार होने वाली वस्तुओं, कच्चे माल और विनिर्मित वस्तुओं की कीमतों को दर्शाता है।
इसके विपरीत, जीडीपी डिफ्लेटर पूरी अर्थव्यवस्था में कीमतों में होने वाले बदलाव को मापता है। इसमें सरकारी खर्च, निवेश, निर्यात के साथ-साथ वित्तीय और गैर-वित्तीय सेवाएं भी शामिल होती हैं।
इसलिए, जीडीपी डिफ्लेटर का सीपीआई या डब्ल्यूपीआई के साथ एक ही दिशा में चलना जरूरी नहीं है। सरकार ने बताया कि यह एक निकाला गया पैमाना है जो आइटम या आइटम-ग्रुप के स्तर पर इस्तेमाल होने वाले 300 से ज्यादा अलग-अलग प्राइस डिफ्लेटर के कीमत पर असर को दिखाता है।
5. क्या ताजा जीडीपी अनुमानों में फिर संशोधन हो सकता है?
केंद्र सरकार ने कहा है कि उत्पादन और खर्च के तरीकों से तैयार किए गए जीडीपी अनुमानों के बीच जो सांख्यिकीय अंतर (statistical discrepancy) है, वह असल में आंकड़ों को संतुलित करने वाला एक हिस्सा है। सिर्फ इस अंतर के आधार पर यह नहीं कहा जा सकता कि जीडीपी के आंकड़े कम करके या बढ़ा-चढ़ाकर दिखाए गए हैं।
भविष्य में होने वाले किसी भी संशोधन की दिशा और मात्रा, उत्पादन और खर्च से जुड़े शुरुआती अनुमानों में होने वाले बदलावों पर निर्भर करेगी। केंद्र सरकार ने कहा है कि पहले से यह तय नहीं किया जा सकता कि जीडीपी में बढ़ोतरी ही होगी या उसमें कितना बदलाव होगा।