भारतीय शेयर बाजार में बढ़ती सट्टेबाजी गतिविधियों पर अंकुश लगाने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक ने बड़ा कदम उठाया है। केंद्रीय बैंक ने उन फर्मों के लिए कर्ज नियम सख्त कर दिए हैं जो शेयर और कमोडिटी बाजार में प्रोपायटरी ट्रेडिंग करती हैं और अपने ग्राहकों को लीवरेज उपलब्ध कराती हैं। नए नियम 1 अप्रैल से लागू होंगे।
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने स्पष्ट किया है कि अब प्रतिभूति बाजार से जुड़े ब्रोकर और अन्य मध्यस्थ संस्थानों को दिए जाने वाले सभी ऋण पूरी तरह सुरक्षित यानी कोलेटरल आधारित होने चाहिए। बैंक अब ऐसे किसी भी कर्ज की अनुमति नहीं देंगे जिसे ब्रोकर अपनी खुद की ट्रेडिंग या निवेश गतिविधियों में इस्तेमाल करें।
अब तक बैंकों द्वारा दिए जाने वाले अल्पकालिक कार्यशील पूंजी ऋण का उपयोग कुछ ब्रोकर अप्रत्यक्ष रूप से बाजार में सौदेबाजी के लिए कर लेते थे। नए दिशा-निर्देश इस रास्ते को बंद करते हैं।
इन सख्त नियमों का सबसे अधिक असर प्रोपायटरी ट्रेडिंग फर्मों पर पड़ सकता है। पूंजी जुटाने की लागत बढ़ने से उनकी लाभप्रदता पर दबाव आने की आशंका है। पिछले वर्ष देश के सबसे बड़े शेयर बाजार नेशनल स्टॉक एक्सचेंज पर इक्विटी ऑप्शंस कारोबार में प्रोप ट्रेडिंग फर्मों की हिस्सेदारी 50 प्रतिशत से अधिक रही थी। कैश इक्विटी सेगमेंट में भी इनकी भागीदारी करीब 30 प्रतिशत तक पहुंच गई थी, जो 21 वर्षों का उच्च स्तर माना गया।
विशेषज्ञों का मानना है कि जब पूंजी की उपलब्धता सीमित होगी और उधारी महंगी होगी तो ट्रेडिंग वॉल्यूम पर दबाव दिख सकता है।
आरबीआई ने बैंकों को निर्देश दिया है कि यदि वे किसी ब्रोकर की ओर से प्रोप ट्रेड के लिए गारंटी देते हैं तो वह पूरी तरह सुरक्षित होनी चाहिए। कुल जमानत में कम से कम 50 प्रतिशत नकद होना जरूरी होगा, जबकि शेष हिस्सा नकद समकक्ष या सरकारी प्रतिभूतियों के रूप में स्वीकार किया जाएगा।
इससे ट्रेडिंग फर्मों के लिए कोलेटरल के तौर पर इस्तेमाल की जाने वाली प्रतिभूतियों का दायरा सीमित हो जाएगा। यानी अब हर प्रकार के शेयर या संपत्ति को जमानत के रूप में स्वीकार नहीं किया जाएगा।
केंद्रीय बैंक ने मार्जिन ट्रेडिंग सुविधा के नियम भी कड़े किए हैं। इस व्यवस्था के तहत ब्रोकर अपने ग्राहकों को उनके निवेश की तुलना में कई गुना अधिक ट्रेडिंग क्षमता देते हैं। अब बैंकों द्वारा इस सुविधा के लिए दिए जाने वाले ऋण पूरी तरह नकद या अत्यधिक तरल प्रतिभूतियों से सुरक्षित होने चाहिए।
यदि ब्रोकर शेयरों को जमानत के रूप में पेश करते हैं तो उनका मूल्यांकन 40 प्रतिशत की छूट के साथ किया जाएगा। यानी 100 रुपये के शेयर को केवल 60 रुपये की वैल्यू पर गिना जाएगा। इससे जोखिम नियंत्रण मजबूत करने की कोशिश की गई है।
मार्जिन ट्रेडिंग का बाजार तेजी से बढ़कर 1 लाख करोड़ रुपये से अधिक का हो चुका है। इसमें निवेशकों को पांच गुना तक लीवरेज मिल जाता है, जिससे जोखिम और संभावित लाभ दोनों बढ़ जाते हैं।
यह कदम ऐसे समय आया है जब हाल ही में डेरिवेटिव ट्रेडिंग पर लेनदेन कर में भी उल्लेखनीय बढ़ोतरी की गई है। बाजार से जुड़े प्रतिभागियों का मानना है कि टैक्स वृद्धि और आरबीआई के नए नियम मिलकर ट्रेडिंग वॉल्यूम पर असर डाल सकते हैं।
हालांकि नियामकों का उद्देश्य स्पष्ट है। वे बाजार में अत्यधिक सट्टेबाजी और अनियंत्रित लीवरेज को सीमित करना चाहते हैं ताकि वित्तीय स्थिरता बनी रहे। आने वाले महीनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि इन नियमों का बाजार की तरलता और निवेशकों की गतिविधियों पर कितना प्रभाव पड़ता है।
-एजेंसी इनपुट के साथ