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तेल के झटके से बॉन्ड बाजार हिला, MFs ने एक महीने में बेचे ₹35,600 करोड़ के सरकारी बॉन्ड

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कॉरपोरेट बॉन्ड्स पर दबाव सरकारी बॉन्ड्स की तुलना में ज्यादा रहा है, जो बाजार में बढ़ते जोखिम (risk-off sentiment) के अनुरूप है

Last Updated- March 20, 2026 | 6:38 PM IST
Bonds

ईरान युद्ध के चलते बढ़ती तेल कीमतों और महंगाई की आशंकाओं के बीच म्युचुअल फंड्स ने मार्च में अब तक भारतीय सरकारी बॉन्ड्स की रिकॉर्ड बिकवाली की है। इससे रुपये पर दबाव बढ़ा है और डेट मार्केट में व्यापक गिरावट देखने को मिली है। समाचार एजेंसी रॉयटर्स ने यह जानकारी दी।

क्लियरिंग हाउस के आंकड़ों के मुताबिक, म्युचुअल फंड्स ने इस महीने अब तक 35,600 करोड़ रुपये (करीब 3.82 अरब डॉलर) के सरकारी बॉन्ड्स की शुद्ध बिकवाली की है, जो किसी भी महीने का अब तक का सबसे ऊंचा स्तर है।

बाजार में बढ़ती अनिश्चितता के बीच कुछ एसेट मैनेजर्स ने रणनीति बदलते हुए शॉर्ट-ड्यूरेशन कॉरपोरेट डेट की ओर रुख किया है, जहां उन्हें बेहतर वैल्यू नजर आ रही है।

कॉरपोरेट बॉन्ड्स में बेहतर वैल्यू

ब्रेंट क्रूड की कीमत करीब 120 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंचने से महंगाई की चिंताएं और बढ़ गई हैं। इसके चलते रुपया कमजोर होकर 93 प्रति डॉलर के पार रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच गया है, जिससे निवेशक सरकारी और कॉरपोरेट बॉन्ड दोनों पर ज्यादा यील्ड की मांग कर रहे हैं।

कॉरपोरेट बॉन्ड्स पर दबाव सरकारी बॉन्ड्स की तुलना में ज्यादा रहा है, जो बाजार में बढ़ते जोखिम (risk-off sentiment) के अनुरूप है। LSEG के अनुसार, 2-5 साल की अवधि वाले AAA-रेटेड कॉरपोरेट बॉन्ड की यील्ड 20-25 बेसिस प्वाइंट तक बढ़ गई है, जबकि समान अवधि के सरकारी बॉन्ड की यील्ड में 10 बेसिस प्वाइंट से भी कम बढ़ोतरी हुई है।

कॉरपोरेट और सरकारी बॉन्ड के बीच स्प्रेड बढ़ने के साथ, कुछ निवेशकों को कॉरपोरेट बॉन्ड्स में बेहतर वैल्यू नजर आ रही है।

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फंड मैनेजर्स बदल रहें स्ट्रैटेजी

मिरे असेट में फिक्स्ड इनकम हेड बसंत बाफना के अनुसार, कॉरपोरेट बॉन्ड्स “जोखिम-रिटर्न (risk-reward) के नजरिये से ज्यादा आकर्षक” हो गए हैं।

बाफना ने कहा कि म्युचुअल फंड्स द्वारा सरकारी बॉन्ड्स की बिकवाली ईरान युद्ध के चलते बढ़ी सतर्कता को दर्शाती है। साथ ही, कॉरपोरेट बॉन्ड्स में बेहतर वैल्यू भी दिख रही है। उन्होंने बताया कि फंड मैनेजर्स मौजूदा बाजार परिस्थितियों का फायदा उठाने के लिए अपनी रणनीतियों में बदलाव कर रहे हैं।

UTI AMC में सीनियर एग्जीक्यूटिव वाइस प्रेसिडेंट और फिक्स्ड इनकम हेड अनुराग मित्तल ने कहा, “रणनीति मुख्य रूप से उन सेगमेंट्स की ओर शिफ्ट होने की है, जहां बेहतर कैरी (carry) और रिलेटिव वैल्यू मिल रही है।”

मित्तल ने आगे कहा कि मध्यम अवधि (moderate-duration) वाले फंड 1-3 साल की एक्रूअल रणनीति को प्राथमिकता दे रहे हैं, जबकि एक्टिव ड्यूरेशन स्ट्रैटेजी के तहत लंबी अवधि वाले राज्य ऋण (state debt) और मनी मार्केट सिक्योरिटीज में चुनिंदा निवेश किया जा रहा है।

पोर्टफोलियो को बैलेंस करने का मौका

म्युचुअल फंड मैनेजर्स का कहना है कि कॉरपोरेट बॉन्ड्स के बढ़ते स्प्रेड वित्तीय वर्ष के अंत से पहले पोर्टफोलियो को फिर से संतुलित करने का मौका दे रहे हैं।

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देश के सबसे बड़े एसेट मैनेजर, SBI MF के सीआईओ-फिक्स्ड इनकम राजीव राधाकृष्णन ने कहा कि कुछ निवेशक हाइब्रिड स्कीम्स में अन्य एसेट कैटेगरी की ओर शिफ्ट करने का विकल्प चुन सकते हैं।

उन्होंने कहा, “मौजूदा चक्र के इस चरण में बाजार की अस्थिरता और सरकारी बॉन्ड्स पर आपूर्ति दबाव का फायदा उठाने के लिए टैक्टिकल पोजिशनिंग की जा रही है। इसके अलावा, मध्यम अवधि और क्रेडिट रिस्क रणनीतियों को प्राथमिकता दी जा रही है।”

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First Published - March 20, 2026 | 6:38 PM IST

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