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बैंकिंग और फाइनैंशियल फंड्स 9.5% तक गिरे, क्या आपको करना चाहिए एग्जिट?

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यह कैटेगरी काफी बड़ी है। इसमें कुल 71 योजनाएं हैं। इन योजनाओं के तहत कुल एसेट अंडर मैनजमेंट (AUM) 1.08 लाख करोड़ रुपये है

Last Updated- March 20, 2026 | 4:18 PM IST
Banking and financial funds
Photo: Freepik

Banking and Financial Funds: बैंकिंग और फाइनैंशियल सर्विसेज फंड पिछले महीने में 9.5 फीसदी गिर गए हैं। इसके साथ ही यह इक्विटी कैटेगरी में तीसरा सबसे खराब प्रदर्शन करने वाली कैटेगरी रही। यह कैटेगरी काफी बड़ी है। इसमें कुल 71 योजनाएं हैं। इन योजनाओं के तहत कुल एसेट अंडर मैनजमेंट (AUM) 1.08 लाख करोड़ रुपये है।

हाल की गिरावट के पीछे के कारण

एक्सपर्ट्स का कहना है कि हाई फाइनैंशियल लीवरेज बैंकिंग सेक्टर को अन्य सेक्टर्स की तुलना में ज्यादा संवेदनशील बनाता है। मौजूदा युद्ध ने एनर्जी की ज्यादा लागत और सप्लाई चेन में बाधाओं के कारण व्यापक जोखिम पैदा कर दिए हैं। UTI AMC के फंड मैनेजर भावेश कनानी कहते हैं, “अगर युद्ध लंबा चलता है तो ये जोखिम ऋण वृद्धि (loan growth), तरलता की स्थिति (liquidity conditions) और संपत्ति की गुणवत्ता (asset quality) को प्रभावित कर सकते हैं।” संपत्ति की गुणवत्ता को लेकर भी चिंताएं बढ़ी हैं, क्योंकि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) आधारित बदलावों से नौकरियों में कटौती हो सकती है।

यदि भू-राजनीतिक स्थिति ऐसी ही बनी रहती है, तो मैक्रो सेटीमेंट और बिगड़ सकता है। कनानी कहते हैं, “ये फैक्टर कमाई में इजाफे (earnings growth) पर भारी असर डाल सकते हैं, जिसमें धीरे-धीरे सुधार होने की उम्मीद थी।”

दिसंबर 2025 के अंत से अग्रिम ऋणों में वृद्धि में सुधार हुआ है, लेकिन जमा राशि में वृद्धि अभी भी धीमी है। मिरे असेट के फंड मैनेजर अभिजीत वारा कहते हैं, “इससे मौजूदा वृद्धि की गति की स्थिरता को लेकर चिंताएं बढ़ जाती हैं।” उन्होंने यह भी कहा कि विदेशी संस्थागत निवेशकों (FIIs) द्वारा लगातार बिकवाली ने प्रदर्शन पर दबाव डाला है।

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इन पॉजिटव फैक्टर से मजबूती की उम्मीद

इन दबावों के बावजूद, बैंकिंग सेक्टर मौलिक रूप से मजबूत बना हुआ है, जिसमें पर्याप्त पूंजी (capitalisation), प्रावधान स्तर (provision levels), और डायवर्सिफाइड लोन मिक्स शामिल हैं।

बैंक और नॉन-बैंकिंग फाइनैंशियल कंपनियां (NBFCs) संगठित ऋण को बढ़ाने, कॉर्पोरेट पूंजीगत व्यय को फंड करने और वित्तीय समावेशन का समर्थन करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं।

कुल मिलाकर फाइनैंशियल सेवाओं का क्षेत्र काफी बढ़ गया है। वारा के अनुसार, “वेल्थ, फाइनैंशियल प्लानिंग, बीमा और फिनटेक में कई आरंभिक सार्वजनिक निर्गम पेश हुए हैं।”

कुछ सेगमेंट में आगे बढ़त तेज हो सकती है। वारा के अनुसार, “बीमा, वेल्थ टेक्नोलॉजी और फाइनैंशियल सर्विसेज एग्रीगेशन से जुड़ी कंपनियां द्वारा अगले चरण की वित्तीय सेवाओं की वृद्धि को आगे बढ़ाने की उम्मीद हैं। बैंकिंग और फाइनैंशियल सर्विसेज फंड इन नए निवेश थीम्स का हिस्सा कैप्चर कर सकते हैं।”

गिरावट के बाद, वैल्यूएशन ज्यादा आकर्षक हो गए हैं। कनानी के अनुसार, “ये लंबी अवधि के निवेशकों के लिए मूल्य प्रदान करते हैं। युद्ध की स्थिति का जल्दी समाधान कुछ चिंताओं को दूर कर सकता है और उछाल (upside potential) का रास्ता खोल सकता है।”

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मौजूदा निवेशक: बने रहें या बाहर निकलें?

फाइनैंशियल सेक्टर व्यापक अर्थव्यवस्था का एक संकेतक है। सेबी में रजिस्टर्ड निवेश सलाहकार और SahajMoney.com के फाउंडर अभिषेक कुमार के अनुसार, “यह सेक्टर अक्सर बाजार की रिकवरी में लीडर होता है और घरेलू आर्थिक विस्तार का प्रमुख लाभार्थी बना रहता है।” निवेश बनाए रखने से निवेशक उद्योग की साइक्लिक ट्रेंड को सहते हुए शॉर्ट टर्म नुकसान में फंसने से बच सकते हैं। अस्थायी उतार-चढ़ाव के दौरान बेचने से लॉन्ग टर्म कंपाउडिंग के लाभों से हाथ धोना पड़ सकता है।

जो निवेशक बैंकिंग और फाइनैंशियल सर्विसेज सेक्टर के संभावित अवसरों पर अटूट विश्वास रखते हैं, वे निवेश बनाए रख सकते हैं। कुमार कहते हैं, “अगर आपको लगता है कि भारत की क्रेडिट ग्रोथ पर आपकी मूल धारणा अभी भी बरकरार है, तो निवेश जारी रखें।”

हालांकि, यह फैसला रिसर्च और सेक्टर की अच्छी समझ पर आधारित होना चाहिए। मॉर्निंगस्टार इन्वेस्टमेंट रिसर्च इंडिया में डायरेक्टर- मैनेजर रिसर्च कौस्तुभ बेलापुरकर के अनुसार, “निवेशकों को सेक्टर की बारीकियों की गहरी समझ होनी चाहिए और एंट्री व एग्जिट का सही समय तय करने की क्षमता भी होनी चाहिए।”

कुछ मामलों में बाहर निकलना भी सही हो सकता है। कुमार कहते हैं, “अगर आपके पोर्टफोलियो में इस सेक्टर का हिस्सा बहुत ज्यादा है और आपने अपने व्यक्तिगत लक्ष्य समय से पहले हासिल कर लिए हैं, तो बाहर निकलना समझदारी हो सकती है।”

सेक्टोरल और थीमैटिक फंड स्वाभाविक रूप से काफी उतार-चढ़ाव वाले होते हैं। कई निवेशकों में इस तरह के उतार-चढ़ाव को सहने की क्षमता नहीं होती। ऐसे निवेशकों को बाहर निकलकर अपना पैसा डायवर्सिफाइड इक्विटी फंड्स में शिफ्ट करना चाहिए।

बाजार में समय-समय पर सेक्टर रोटेशन होता रहता है और अलग-अलग समय पर अलग-अलग सेक्टर आगे रहते हैं। अगर निवेशकों को इन फंड्स से मिलने वाले अस्थिर रिटर्न पसंद नहीं हैं, तो वे बाहर निकल सकते हैं।

बेलापुरकर के अनुसार, “निवेशकों को बाहर निकल जाना चाहिए, अगर उन्होंने सिर्फ इस वजह से निवेश किया था कि पिछले साल इस सेक्टर ने अच्छा प्रदर्शन किया था।”

फाइनैंशियल सर्विसेज इंडेक्स का सबसे बड़ा सेक्टर है। ज्यादातर डायवर्सिफाइड इक्विटी फंड्स पहले से ही करीब 25 से 35 फीसदी निवेश इसी सेक्टर में रखते हैं। ऐसे में अलग से बैंकिंग और फाइनैंशियल सर्विसेज फंड लेने से सेक्टर में ओवरएक्सपोजर का जोखिम बढ़ सकता है।

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क्या नए निवेशकों को अभी पैसा लगाना चाहिए?

ज्यादातर रिटेल निवेशक बैंकिंग और फाइनैंशियल सर्विसेज फंड से दूरी बना सकते हैं, क्योंकि उनके पास पहले से ही डायवर्सिफाइड इक्विटी फंड्स के जरिए इस सेक्टर में पर्याप्त एक्सपोजर होता है। जो निवेशक फिर भी निवेश करना चाहते हैं, उन्हें पहले इससे जुड़े जोखिमों को अच्छी तरह समझ लेना चाहिए।

बेलापुरकर के अनुसार, “इन फंड्स में टाइमिंग का जोखिम काफी ज्यादा होता है। निवेशक एंट्री और एग्जिट दोनों समय गलत फैसला कर सकते हैं।” उनका कहना है कि केवल वही निवेशक सेक्टोरल एक्सपोजर पर विचार करें, जिनकी इस सेक्टर को लेकर मजबूत राय हो।

ऐसे निवेशकों में उतार-चढ़ाव सहने की क्षमता भी होनी चाहिए। कुमार के अनुसार, “नए निवेशकों को सिस्टमैटिक तरीके से निवेश करना चाहिए, ताकि निकट अवधि में ब्याज दरों के उतार-चढ़ाव और वैश्विक अनिश्चितताओं के असर को कम किया जा सके।”

बेलापुरकर का कहना है कि किसी एक सेक्टर में निवेश का हिस्सा 5 फीसदी तक सीमित होना चाहिए, जबकि सभी सेक्टोरल फंड्स में कुल आवंटन पोर्टफोलियो के 10 फीसदी से ज्यादा नहीं होना चाहिए।

एक्सपर्ट्स का कहना है कि सेक्टोरल फंड्स के लिए न्यूनतम निवेश अवधि तय करना मुश्किल है, क्योंकि सफलता काफी हद तक सही समय पर एंट्री और एग्जिट पर निर्भर करती है। बेलापुरकर के अनुसार, “निवेशकों को सेक्टर में टर्नअराउंड आने से पहले प्रवेश करना चाहिए और उसके चरम (peak) पर निकलना चाहिए। लेकिन ज्यादातर निवेशक तब प्रवेश करते हैं, जब तेजी पहले ही आ चुकी होती है।”

कुमार पांच से सात साल की न्यूनतम निवेश अवधि की सलाह देते हैं, क्योंकि यह आर्थिक चक्र (economic cycle) को दर्शाती है। उनका कहना है, “इतनी अवधि निवेशकों को क्रेडिट साइकिल के उतार-चढ़ाव को सहने में मदद कर सकती है।”

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First Published - March 20, 2026 | 4:18 PM IST

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