प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वतंत्रता दिवस पर पांच प्रण लिए। इनमें से एक प्रण समानता विशेषकर महिलाओं की समानता से संबंधित था। इन पांच प्रणों का ध्येय स्वतंत्रता के 100वें साल 2047 तक स्वतंत्रता सेनानियों के ख्वाब को पूरा करना था। महिलाओं की समानता से संबंधित प्रण देश के समक्ष कई मोर्चों पर चुनौती खड़ी करेगा। उन्होंने कहा ‘हमारी नारी शक्ति सभी क्षेत्रों में अपनी उपस्थिति दर्ज करा रही है जैसे – पुलिस, गांव आदि। हम अपनी बेटियों को जितने अधिक अवसर मुहैया करवाएंगे, वे हमें उतना ही आगे ले जाएंगी।’
पुलिस अनुसंधान एवं विकास ब्यूरो के 2021 के नवीनतम आंकड़ों के मुताबिक असलियत में पुलिस बल में महिलाओं की हिस्सेदारी 10.5 प्रतिशत है। हालांकि साल 2006 में महिलाओं की पुलिस बल में हिस्सेदारी 5.7 प्रतिशत थी। इस तरह साल 2006 की तुलना में 2021 में महिलाओं की हिस्सेदारी तकरीबन दोगुनी बढ़ गई। ये महिला पुलिसकर्मी जब किसी मामले की जांच को न्यायपालिका में लेकर जाती हैं तो उन्हें महिलाओं से अधिक पुरुष न्यायाधीशों से रूबरू होना पड़ता है। महिला पुलिसकर्मियों को महिला से अधिक पुरुष राजनीतिज्ञों की सुरक्षा करनी पड़ती है। इसी तरह देश की सेवा करने के दौरान महिला पुलिसकर्मियों को महिलाओं से अधिक पुरुषों से रूबरू होना पड़ता है।
पुलिस बल में महिलाओं का बढ़ता अनुपात कुछ आशा की उम्मीद जगाती है जबकि महिलाओं को कमतर, धीमा और गिरते हुए विकास का सामना करना पड़ता है। इससे प्रधानमंत्री के नारी शक्ति के प्रण को पूरा करने के लिए बहुत लंबा रास्ता तय करना है और साथ ही अत्यधिक प्रयास किए जाने की भी जरूरत है।
सबसे खराब स्थितियों में से एक महिला श्रम बल भागीदारी अनुपात है। बीते डेढ़ दशक में यह अनुपात निरंतर व तेजी से गिरा है। साल 2005 में महिला श्रम बल भागीदारी 32 प्रतिशत थी जो साल 2021 में गिरकर 19.2 प्रतिशत पर आ गई थी। महामारी के पहले साल 2020 में महिला श्रम बल भागीदारी अनुपात गिरकर 32 सालों में सबसे निचले स्तर 18.6 प्रतिशत पर पहुंच गया था। हालांकि नवीनतम आंकड़े में कुछ सुधार दर्ज हुआ।महिलाओं के शिक्षित होने के बावजूद भी श्रमबल में लिंग अनुपात में महिलाएं पिछड़ी हैं। स्कूलों और कालेजों में महिलाओं का पंजीकरण बढ़ा है। इससे वे स्कूलों और कालेजों में शिक्षा पाने के मामले में पुरुषों के तकरीबन बराबर सी पहुंच गई हैं। हालांकि कानूनी शिक्षा के क्षेत्र में यह समानता दूर की कौड़ी है।
कानून के स्नातक पाठ्यक्रम में महिलाओं की 33 फीसदी भागीदारी में कोई बदलाव नहीं आया है जबकि सीटें 2014-15 से लेकर अब तक कानून की शिक्षा में सीटे तिगुनी बढ़ी हैं। यह खराब स्थिति की ओर इशारा करती है। वकालत के पेशे में महिलाओं को उचित प्रतिनिधित्व नहीं मिला है। इससे वकीलों में महिलाओं का प्रतिशत निकालना संभव सा नहीं लगता है। हालांकि जज के स्तर पर लिंग अनुपात आदर्श स्थिति से बहुत दूर है।
भारत के 75 साल के इतिहास में सर्वोच्च न्यायालय में 11 महिला न्यायाधीश नियुक्त हुईं। इन 11 महिला न्यायाधीशों में से पांच महिला न्यायाधीशों की नियुक्ति बीते तीन सालों के दौरान हुई। इस अवधि के दौरान सर्वोच्च न्यायालय में नियुक्त हुए 26 न्यायाधीशों में केवल 20 फीसदी महिलाएं थीं। इसका परिणाम यह है कि सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों में महिलाओं की हिस्सेदारी केवल 12.5 प्रतिशत है। उच्च न्यायालयों की स्थिति भी कोई बेहतर नहीं है। उच्च न्यायालयों में केवल 13 प्रतिशत न्यायाधीश महिलाएं हैं। जिला अदालतों में 35 फीसदी न्यायाधीश महिलाएं हैं।
इस साल राजनीति के क्षेत्र में महिलाओं की उपलब्धियों ने मील के पत्थर हासिल किए हैं। भारत ने इस साल अपनी दूसरी महिला राष्ट्रपति को चुना है। हालांकि संसद में महिलाओं के प्रतिनिधित्व में बढ़ोतरी हुई है। साल 2012 में संसद में महिलाओं का प्रतिनिधित्व 11 प्रतिशत था जो साल 2022 में बढ़कर 14.9 प्रतिशत हो गया है। लेकिन यह अभी भी कम है। आश्चर्य की बात यह है कि पाकिस्तान की संसद में महिलाओं की हिस्सेदारी 20.5 प्रतिशत और बांग्लादेश में 20.9 प्रतिशत है। भारत में साल 2022 में नौ प्रतिशत महिला सांसद ही मंत्री हैं जबकि साल 2012 में दस प्रतिशत महिला सांसद मंत्री थीं। बांग्लादेश व पाकिस्तान की तुलना में भारत में महिला सांसद कम ही मंत्री पद पर नियुक्त हुई हैं।
कंपनियों के निदेशक मंडल में महिला निदेशकों की संख्या में बढ़ोतरी हुई है। लेकिन नेशनल स्टॉक एक्सचेंज में सूचीबद्ध 3 प्रतिशत कंपनियों में मार्च 2021 तक एक भी महिला निदेशक नहीं थी। इससे मार्च 2015 में निदेशक मंडल में महिलाओं की भागीदारी का 8.5 प्रतिशत का आंकड़ा भी गिर चुका है। महिला निदेशक के बिना कोई कंपनी नहीं होनी चाहिए। लेकिन महिला निदेशक के बिना वाली कंपनियों का नगण्य प्रतिशत है।
बाजार नियामक भारतीय प्रतिभूति व विनिमय बोर्ड (सेबी) ने कंपनियों को उनके बोर्ड में कम से कम एक महिला निदेशक को शामिल करना अनिवार्य कर दिया था। सेबी का यह आदेश अक्टूबर, 2014 से लागू हुआ था। इसके बाद कंपनी के प्रोमोटर परिवारों की महिलाओं को बोर्ड में शामिल करने की प्रक्रिया तेजी से बढ़ी थी।
प्रोफेशनल या प्रबंधकों की कुल संख्या में महिलाओं की हिस्सेदारी महज 32.8 प्रतिशत थी। यह इस क्षेत्र में बांग्लादेश में महिलाओं की हिस्सेदारी 28 प्रतिशत से अधिक थी। लेकिन विकसित देशों के बराबरी के स्तर पर आने से कोसों दूर है।
बहरहाल स्थितियां पूरी तरह निराशावादी नहीं हैं। हाल में संपन्न हुए राष्ट्रमंडल खेलों में पदक जीतने वाले खिलाडि़यों में 40 प्रतिशत महिला खिलाड़ी थीं। हालांकि साल 2002 के इन खेलों में पदक जीतने वाली महिलाओं का प्रतिशत 46.4 प्रतिशत था। लिहाजा इन खेलों में 2002 की तुलना में इस साल पदक जीतने वाली महिलाओं का प्रतिशत गिरा है।
ब्लूमबर्ग की हालिया रिपोर्ट के मुताबिक भारत के विमानन क्षेत्र में महिलाओं की हिस्सेदारी बढ़ रही है। भारत में विश्व में महिला पायलटों का सबसे ज्यादा प्रतिशत है। द इंटरनैशनल सोसायटी फॉर वीमन एयरलाइन पायलट्स के अनुसार भारत के सभी पायलटों में महिलाओं का प्रतिशत 12.4 है। हालांकि विश्व में विमानन के सबसे बड़े बाजार अमेरिका में महिला पायलटों का प्रतिशत 5.5 है जबकि यूनाइटेड किंगडम में महिला पायलटों की हिस्सेदारी 4.7 प्रतिशत है।