पेरिस में 2015 में जलवायु परिवर्तन वार्ता के दौरान जीवाश्म ईंधन के साथ बड़ी अक्षय ऊर्जा योजना की बात कहकर छा जाने वाला भारत उसी समय से ‘पॉल्यूटर पे’ पर भी जोर दे रहा है, जिसका मतलब है कि प्रदूषण फैलाने वाले उसका हर्जाना भी दें। भारत सहित कई अन्य विकासशील राष्टों ने विकसित देशों से बार-बार यह कहा है कि उनके औद्योगीकरण की वजह से जलवायु को होने वाले नुकसान का हर्जाना भी उन्हें ही भरना चाहिए। उनका यह भी कहना था कि विकसित और विकासशील देशों के लिए कार्बन उत्सर्जन का लक्ष्य एक जैसा नहीं होना चाहिए और गरीब देशों पर इसके लिए दबाव भी नहीं डाला जाना चाहिए।
भारतीय अधिकारियों और मंत्रियों का कहना है कि जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट की अंतर-सरकारी समिति (आईपीसीसी) की ताजा रिपोर्ट ने भारत के रुख को सही ठहराया है। केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेंद्र यादव ने बयान में कहा, ‘विकसित देशों ने वैश्विक कार्बन बजट में अपने उचित हिस्से से ज्यादा हिस्सा हड़प लिया है। नेट जीरो तक पहुंचना ही पर्याप्त नहीं है क्योंकि तापमान में कमी के लिए कुल कार्बन उत्सर्जन को नेट जीरो तक पहुंचाना होगा।’
सोमवार को जारी आईपीसीसी की छठी आकलन रिपोर्ट में वर्तमान जलवायु की प्रतिकूल स्थिति के लिए मानव के व्यवहार को जिम्मेदार ठहराया गया है प्रकृति को नहीं। रिपोर्ट में कहा गया है कि इनमें से कुछ जलवायु परिवर्तन के कारक ऐसे हैं, जिन्हें बदला नहीं जा सकता है।
यादव ने आगे कहा कि एआर6 भारत के इस रुख को सही बताता है कि ऐतिहासिक समेकित उत्सर्जन ही जलवायु संकट का स्रोत है, जिसका सामना वर्तमान में दुनिया को करना पड़ रहा है। एआर6 का अनुमान है कि वृद्धि के सभी परिदृश्यों में ग्रह 1.5 डिग्री सेल्सियस ज्यादा गर्म हो जाएगा। रिपोर्ट दर्शाती है कि 1850 से 1900 के बीच तापमान में करीब 1.1 डिग्री सेल्सियस बढ़ोतरी के लिए मानव गतिविधियों से उत्सर्जित ग्रीन हाउस गैस जिम्मेदार हैं। इसने कहा कि अगले 20 साल के दौरान वैश्विक तापमान सामान्य से 1.5 डिग्री सेल्सियस अधिक या उससे आगे निकलने के आसार हैं।
नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय तथा पर्यावरण मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारियों ने कहा, ‘भारत पहले जितना वादा कर चुका है, उससे अधिक उसे करने की जरूरत नहीं है।’ वर्ष 2015 में पेरिस सम्मेलन में भारत ने अपने लक्षित राष्ट्रीय निर्धारित योगदान (आईएनडीसी) के तहत ऊर्जा की कुल मांग का 40 फीसदी नवीकरणीय स्रोतों से पूरा करने का वादा किया था। वरिष्ठ सरकारी अधिकारियों ने कहा कि भारत अपने आईएनडीसी लक्ष्यों को हासिल करने की दिशा में सही जा रहा है। उन्होंने कहा कि यह लक्ष्य सरकार की तरफ से शुरू की गई बहुत सी पहलों के बदौलत संभव होगा।
एक अन्य अधिकारी ने कहा, ‘भारत 2030 तक 450 गीगावाट नवीकरणीय ऊर्जा उत्पादन बढ़ेगा। हम ईंधन के रूप में हरित हाइड्रोजन को बढ़ावा दे रहे हैं। भारत पहले ही पीएम-कुसुम योजना के जरिये कृषि के लिए स्वच्छ बिजली आपूर्ति का एक बड़ा कार्यक्रम शुरू कर चुका है।’
कई मौकों पर बिजली और पर्यावरण मंत्रलयों ने इस बात पर जोर दिया है कि भारत नेट जीरो लक्ष्य घोषित नहीं करेगा। इसके बजाय विकसित अर्थव्यवस्थाओं को नेट नेगेटिव लक्ष्य तय करने चाहिए और उन्हें भारत जैसे देशों के हरित ऊर्जा लक्ष्यों के लिए धन मुहैया कराना चाहिए।
अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी द्वारा नेट जीरो पर आयोजित अंतर-मंत्रालय सम्मेलन में केंद्रीय मंत्री आर के सिंह ने कहा कि विकसित देशों को सभी देशों पर ‘नेट जीरो’ को अपनाने का दबाव नहीं बनाना चाहिए।