प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शुक्रवार को देश के पहले स्वदेशी विमानवाहक पोत (एयरक्राफ्ट कैरियर) आईएनएस विक्रांत देश को समर्पित किया। देश में स्वदेशी तकनीक से बना यह अब तक का सबसे बड़ा युद्धपोत है। इस ऐतिहासिक मौके पर प्रधानमंत्री के साथ साथ रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, केरल के गवर्नर आरिफ मोहम्मद खान और मुख्यमंत्री पिनराई विजयन भी मौजूद थे। आईएनएस विक्रांत पर लड़ाकू विमान उतारने का परीक्षण नवंबर में शुरू होगा, जो 2023 के मध्य तक पूरा हो जाएगा। नौसेना ने 1997 में पुराने आईएनएस विक्रांत को सेवा से मुक्त कर दिया था, तब से एक नए स्वदेशी विमानवाहक पोत की जरूरत महसूस की जा रही थी। आज करीब 25 वर्ष बाद जाकर देश को पहला स्वदेशी विमानवाहक पोत मिला।
एक साथ हो सकता है 30 लड़ाकू विमानों का संचालन
स्वदेशी तकनीक से बना यह विमानवाहक पोत एक साथ 30 लड़ाकू विमान का संचालन कर सकता है। विक्रांत के सेवा में आने के साथ ही भारत उन देशों के ग्रुप में शामिल हो गया है, जिसके पास इस तरह के बड़े और जटिल वॉरशिप बनाने की क्षमता है। अभी तक अमेरिका, रूस, चीन, फ्रांस, ब्रिटेन के पास ही एयरक्राफ्ट कैरियर जितना बड़ा वॉरशिप बनाने की क्षमता थी। इस पोत का डिजाइन नौसेना के वारशिप डिजाइन ब्यूरो ने तैयार किया है जबकि इसका निर्माण सार्वजनिक क्षेत्र की शिपयार्ड कंपनी कोचीन शिपयार्ड लिमिटेड ने किया है।
दो फुटबॉल फील्ड से भी बड़ा फ्लाइंग डेक
इसका फ्लाइंग डेक भी दो फुटबॉल फील्ड से भी बड़ा है। यह युद्धपोत एक तैरता हुआ एयरफील्ड है, तैरता हुआ शहर है। इसमें इतनी बिजली पैदा होती है कि 5,000 से अधिक घरों को रोशन किया जा सकता है। INS विक्रांत एयरक्राफ्ट कैरियर समुद्र के ऊपर तैरता एक एयरफोर्स स्टेशन है जहां से दुश्मनों के फाइटर जेट्स, मिसाइलें, ड्रोन, जंगी जहाज को आसानी से नष्ट किया जा सकता है। इसपर एक साथ 1700 सैनिक रह सकते हैं जबकि इसमें 16 बेड का एक अस्पताल भी बनाया गया है।
लड़ाकू विमानों की होगी तैनाती
आईएनएस विक्रांत एक साथ 20 मिग-29 लड़ाकू विमान और दस हेलीकॉप्टरों का संचालन कर सकता है। INS विक्रांत पर 30 एयरक्राफ्ट तैनात होंगे, जिनमें 20 लड़ाकू विमान होंगे और 10 हेलीकॉप्टर होंगे। इस साल के अंत तक मिग-29 विमानों की तैनाती शुरू हो जाएगी। आईएनएस विक्रांत से एक साथ 32 बराक-8 मिसाइल फायर किया जा सकता है।
13 साल में बनकर हुआ तैयार
262 मीटर लंबे इस पोत को बनाने में कुल 13 साल का समय लगा। इसके निर्माण में 20,000 करोड़ का खर्च हुआ है। इस पोत का वजन 45,000 टन से भी अधिक है। आईएनएस विराट के नौसेना से रिटायर हो जाने के बाद नौसेना के पास एकमात्र विमानवाहक पोत आईएनएस विक्रमादित्य रह गया था, ऐसे में लंबे समय से एक और विमानवाहक पोत की जरूरत महसूस की जा रही थी।