मोटर बीमा सेवा प्रदाता (एमआईएसपी) के दिशानिर्देशों की समीक्षा करने के लिए बीमा नियामक की ओर से गठित समिति ने सुझाव दिया है कि मोटर बीमा कारोबार को चलाने के लिए मोटर वाहन डीलरों को वितरक चैनलों में से एक समझा जा सकता है। वे इसी तरह से बीमा मध्यस्थ के रूप में भी कार्य कर सकते हैं जैसे कि कोई बीमा दलाल करता है लेकिन मोटर बीमा कारोबार को अलग रखना होगा। या फिर वे एक सहायक दलाल या सहायक एजेंट बनने का विकल्प चुन सकते हैं और क्रमश: दलाल या कॉर्पोरेट एजेंट के लिए काम कर सकते हैं। अलग से वितरण चैनल या सहायक दलाल बनने का विकल्प वाहन डीलर पर छोड़ दिया जाना चाहिए। यदि वे एक वितरण चैनल बनने का निर्णय लेते हैं तो उन्हें अनिवार्य रूप से बीमा कंपनियों के साथ करार करना पड़ेगा, लेकिन वे प्रीमियम नहीं वसूल पाएंगे। उन्हें उपभोक्ताओं को बीमाकर्ताओं को सीधे ऑनलाइन भुगतान करने की सुविधा प्रदान करनी होगी।
वाहन बीमा कारोबार में दलालों की मदद से एमआईएसपी कारोबार करते हैं और कुल मोटर बीमा कारोबार में बीमाकर्ताओं की भागीदारी 25 फीसदी है या समग्र सामान्य बीमा कारोबार में उनकी हिस्सेदारी 11.25 फीसदी है।
यदि वाहन डीलरों को बीमा कंपनियों का वितरण चैनल बनाया जाता है तो समिति ने एमआईएसपी दिशानिर्देशों में भी संशोधन करने का सुझाव दिया है। उसने सुझाव दिया है कि बीमा मध्यस्थ एमआईएसपी का प्रायोजन कर सकता है और उसी समय पर एक या एक से अधिक बीमा कंपनी ऐसा कर सकती है। समिति ने कहा, ‘इससे एमआईएसपी को बीमा मध्यस्थ के पैनल से बाहर की बीमा कंपनियों की बीमा पॉलिसी ग्राहकों को देने की अनुमति मिल जाएगी, जिसके लिए उसे उनके साथ करार करना होगा।’
साथ ही, यदि कोई एमआईएसपी बीमा मध्यस्थ से प्रायोजित है तो उसे सभी बीमाकर्ताओं से सौदा करना होगा और उसके ऐप्लीकेशन प्रोग्राम इंटरफेस (एपीआई) से इसका पता चलना चाहिए।
दिशानिर्देशों में कहा गया है कि एमआईएसपी को प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से प्रीमियम को तय करने में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए लेकिन समिति के अवलोकन से सामने है कि बीमा मध्यस्थों ने एक इलेक्ट्रॉनिक प्लेटफॉर्म/पोर्टल तैयार कर लिया है जिसके जरिये मोटर बीमा पॉलिसी बेची जाती है या उसका नवीनीकरण किया जाता है।