वैश्विक स्तर पर बढ़ती आर्थिक अनिश्चितता, ऊंचे सरकारी कर्ज और जोखिम के पुनर्मूल्यांकन के बीच भारत को अपने बॉन्ड बाजार को मजबूत और व्यापक बनाने की जरूरत है। रेटिंग एजेंसी CareEdge Rating ने अपनी रिपोर्ट ‘Structural Shifts in Debt Market: Emerging Themes’ में कहा है कि भारत की लंबी अवधि की आर्थिक विकास जरूरतों को पूरा करने के लिए देश के डेट कैपिटल मार्केट (ऋण बाजार) को और मजबूत करने की जरूरत है। रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि दुनिया भर में बढ़ती आर्थिक अनिश्चितता, देशों पर बढ़ता कर्ज और जोखिम की नई कीमत तय होने जैसी स्थितियों के कारण वैश्विक पूंजी प्रवाह प्रभावित हो रहा है।
इस रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि भारत का कॉर्पोरेट बॉन्ड मार्केट (कंपनी ऋण बाजार) अपने आकार, तरलता और निवेशक विविधता के मामले में वैश्विक समकक्षों के पीछे है, भले ही पिछले दशक में बॉन्ड जारी करने में लगातार वृद्धि हुई हो। CareEdge Ratings के अनुसार भारत का कॉर्पोरेट बॉन्ड मार्केट 2016 में 360 अरब डॉलर से बढ़कर 2025 में 645 अरब डॉलर तक पहुंच गया है। हालांकि, कॉर्पोरेट कर्ज का जीडीपी के मुकाबले अनुपात 16-17% पर लगभग स्थिर बना हुआ है, जो जापान (17%), सिंगापुर (27%), चीन (36%), अमेरिका (40%), मलेशिया (55%) और दक्षिण कोरिया (76%) की तुलना में काफी कम है। जिससे संकेत मिलता है कि भारत में इस बाजार के विस्तार और गहराई बढ़ाने की अभी काफी गुंजाइश है। साथ ही यह स्थिति इस बात को दर्शाती है कि बाजार को गहरा करने और सिर्फ बैंकों या उच्च रेटेड जारीकर्ताओं तक सीमित न रहकर अधिक निवेशकों को शामिल करने के लिए तत्काल नीति उपायों की आवश्यकता है।
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CareEdge के एमडी और ग्रुप सीईओ मेहुल पांड्या (Mehul Pandya) ने कहा कि भारत को 2047 तक 30 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने के लक्ष्य को हासिल करने के लिए लंबे समय के विकास को वित्तपोषित करने हेतु अधिक गहरे और विकसित डेट मार्केट की जरूरत होगी। भारतीय डेट कैपिटल मार्केट में निवेशकों की भागीदारी बढ़ाने के लिए जागरूकता बढ़ाना, रिटायरमेंट फंड और बीमा कंपनियों के निवेश नियमों में ढील देना तथा विदेशी निवेशकों की अधिक भागीदारी को प्रोत्साहित करना जरूरी है। इसके अलावा, मार्केट-मेकिंग व्यवस्था, बॉन्ड डेरिवेटिव्स और बॉन्ड ETF के जरिए सेकेंडरी मार्केट में तरलता बढ़ाना भी बाजार विकास की प्रमुख प्राथमिकता बनी हुई है।
इस रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में बकाया कॉर्पोरेट बॉन्ड का आकार 11.4% की चक्रवृद्धि वार्षिक वृद्धि दर (CAGR) से बढ़कर लगभग 59 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया है। हालांकि, बॉन्ड जारी करने का बाजार अभी भी कुछ चुनिंदा क्षेत्रों तक सीमित है। कुल बाजार में BFSI (बैंकिंग, वित्तीय सेवाएं और बीमा) क्षेत्र की हिस्सेदारी 60% से अधिक है, जबकि AAA और AA रेटिंग वाले बॉन्ड की हिस्सेदारी 85% से ज्यादा बनी हुई है।
CareEdge Ratings की रिपोर्ट के अनुसार भारतीय कॉर्पोरेट बॉन्ड बाजार में निवेशकों की भागीदारी अभी भी मुख्य रूप से घरेलू निवेशकों तक सीमित है। विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) की हिस्सेदारी बकाया बॉन्ड में करीब 5.4% है, जो नियामकीय सीमा 15% से काफी कम है। रिपोर्ट में कहा गया है कि सेकेंडरी मार्केट में तरलता (Liquidity) भी काफी कम बनी हुई है। भारत में औसत दैनिक कारोबार बकाया बॉन्ड का केवल 0.2% है, जबकि अमेरिका में यह 4.7% है। हालांकि, FY26 में सेकेंडरी मार्केट में निपटाए गए सौदों (Trades) की संख्या 28 लाख से अधिक रही। वहीं औसत ट्रेड वैल्यू में गिरावट यह संकेत देती है कि खुदरा निवेशकों (Retail Investors) की भागीदारी धीरे-धीरे बढ़ रही है।
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बाजार में वृद्धि की संभावनाओं और इसे और गहरा बनाने के उपायों पर प्रकाश डालते हुए CareEdge Ratings ने कहा कि हाल के वर्षों में AAA, AA और A रेटिंग वाले बॉन्ड का प्रदर्शन बेहतर हुआ है। इसकी वजह इन बॉन्ड में उच्च स्थिरता और कम डिफॉल्ट दर रही है। रिपोर्ट में बॉन्ड बाजार को मजबूत बनाने के लिए सक्रिय नियामकीय कदमों की जरूरत पर जोर दिया गया है। इसमें डेट प्रोडक्ट्स पर कर बोझ कम करना और टैक्स ढांचे को सरल बनाकर उन्हें अन्य एसेट क्लास के बराबर लाना शामिल है। इसके अलावा, बाजार उधारी ढांचे को मजबूत कर जारीकर्ताओं (Issuers) का दायरा बढ़ाने, बैंकों को मध्यम अवधि (Mid-tenor) के बॉन्ड जारी करने के लिए प्रोत्साहित करने और इंफ्रास्ट्रक्चर क्षेत्र की कंपनियों को आंशिक क्रेडिट गारंटी (Partial Credit Enhancement) जैसी व्यवस्थाओं के जरिए बाजार तक बेहतर पहुंच देने जैसे उपाय सुझाए गए हैं।
CareEdge Ratings की रिपोर्ट के अनुसार दुनिया के देशों पर सरकारी कर्ज लगातार बढ़ रहा है। सामान्य सरकारी सकल कर्ज (GGG Debt) का जीडीपी के मुकाबले अनुपात इस दशक के अंत यानी 2030 तक 100 फीसदी से ऊपर पहुंच सकता है, जो कोविड महामारी के दौरान बने उच्च स्तर से भी ज्यादा होगा। रिपोर्ट में कहा गया है कि विकसित देशों में ब्याज का बोझ तेजी से बढ़ रहा है, जिससे कर्ज चुकाने की क्षमता पर जोखिम बढ़ सकता है।
इसके अलावा, सरकारी कर्ज रखने वालों की संरचना भी बदल रही है। पहले केंद्रीय बैंकों की हिस्सेदारी ज्यादा थी, लेकिन अब इसकी जगह घरेलू निवेशक, विदेशी निवेशक और हेज फंड जैसे बाजार आधारित निवेशक ले रहे हैं। इससे सरकारी बॉन्ड बाजार में उतार-चढ़ाव बढ़ने का खतरा पैदा हो गया है। रिपोर्ट के मुताबिक पिछले पांच वर्षों में कई देशों ने कम अवधि वाले कर्ज ज्यादा लिए हैं। इससे मौजूदा अनिश्चित माहौल में दोबारा कर्ज जुटाने (Refinancing) का जोखिम बढ़ गया है। CareEdge Ratings ने कहा कि इन परिस्थितियों में वैश्विक डेट मार्केट अब नीतिगत फैसलों के बजाय बाजार की ताकतों से ज्यादा प्रभावित हो रहे हैं।
CareEdge Ratings की रिपोर्ट के अनुसार वैश्विक गैर-वित्तीय कॉर्पोरेट कर्ज बाजार लगातार बढ़कर करीब 100 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच गया है। हालांकि, जीडीपी के मुकाबले इसका अनुपात लगभग स्थिर बना हुआ है। रिपोर्ट में कहा गया है कि कॉर्पोरेट कर्ज का सेक्टोरल रुझान तेजी से बदल रहा है। पारंपरिक क्षेत्र जैसे इंडस्ट्रियल और यूटिलिटी सेक्टर की संयुक्त हिस्सेदारी अभी भी करीब 60 फीसदी है। वहीं, तकनीकी क्षेत्र की हिस्सेदारी अभी केवल 11 फीसदी है, लेकिन इसकी वृद्धि सबसे तेज हो रही है। इसका मुख्य कारण आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) से जुड़ा पूंजीगत निवेश (Capex) चक्र है, जो कंपनियों को अधिक बॉन्ड जारी करने के लिए प्रेरित कर रहा है।
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CareEdge Ratings की रिपोर्ट के अनुसार भारत का बाहरी वाणिज्यिक कर्ज (External Commercial Borrowings – ECBs) 2011 के बाद से दोगुना हो गया है। जारीकर्ताओं (Issuers) की बात करें तो पिछले पांच वर्षों में गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (NBFCs) की हिस्सेदारी 25% से बढ़कर 40% हो गई है, जबकि इंफ्रास्ट्रक्चर सेक्टर की हिस्सेदारी लगभग 30% पर स्थिर बनी हुई है। ECBs के मामले में GIFT सिटी एक प्रमुख जारीकर्ता केंद्र के रूप में उभर रही है, जहां नई जारी की गई बॉन्ड का लगभग दो-तिहाई हिस्सा आता है। यह विदेशी करेंसी कर्ज की लिस्टिंग के लिए भी मुख्य केंद्र बन चुकी है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत धीरे-धीरे वैश्विक पूंजी बाजारों के साथ एकीकृत हो रहा है और GIFT IFSC पूरे इकोसिस्टम को विकसित करने में अहम भूमिका निभा रहा है। पांड्या ने कहा कि बढ़ती महंगाई और जोखिम संबंधी चिंताओं के कारण सरकारी बॉन्ड यील्ड लगातार बढ़ रही है। कड़े वित्तीय हालात और भू-राजनीतिक तनाव आगे भी डेट मार्केट और वित्तीय स्थिरता को प्रभावित कर सकते हैं। उन्होंने कहा कि कॉर्पोरेट बॉन्ड यील्ड में भी बढ़ोतरी हुई है, लेकिन स्प्रेड घटने के कारण यह बढ़ोतरी अपेक्षाकृत सीमित रही। इसलिए असली बदलाव कर्ज के स्तर में नहीं, बल्कि जोखिम की कीमत तय करने के तरीके में हो रहा है।