देशभर के ज्यादातर हिस्से इस समय भयंकर गर्मी की चपेट में हैं। वहीं, इस साल अल-नीनो के चलते मॉनसून के कमजोर रहने की आशंका जताई जा रही है। अगर सामान्य से कम बारिश रहती है, तो महंगाई में इजाफा हो सकता है। ग्रामीण मांग पर दबाव दिख सकता है। साथ ही आम कंज्यूमर को ब्याज दरों में बढ़ोतरी का सामना करना पड़ सकता है। वहीं, सरकार यह दावा कर रही है कि वह अल-नीनो के खतरे से निपटने के लिए तैयार है।
भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने FY27 के लिए मॉनसून बारिश का अनुमान लॉन्ग पीरियड एवरेज (LPA) के 92 प्रतिशत पर लगाया है, जिसे ‘सामान्य से कम’ श्रेणी में रखा गया है। विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) ने भी मई-जुलाई के दौरान अल-नीनो की वापसी की आशंका जताई है। वहीं अमेरिकी एजेंसी NOAA ने कहा है कि मई-जून से एल नीनो की स्थिति बन सकती है और यह साल के अंत तक जारी रह सकती है।
अल-नीनो के दौरान भारत में आमतौर पर गर्म और शुष्क मौसम की स्थिति बनती है, जिससे कृषि उत्पादन प्रभावित होता है। कृषि भारत के सकल घरेलू उत्पादन (GDP) में लगभग 15-16 प्रतिशत योगदान देती है और करीब 45 प्रतिशत आबादी की आजीविका इससे जुड़ी है। ऐसे में मानसून का असर खपत, महंगाई, तरलता और कॉरपोरेट कमाई पर भी पड़ता है।
स्मालकेस मैनेजर एंड थॉटफुल इन्वेस्टर्स रिसर्च एलएलपी के फाउंडर सीए तपन दोशी की प्री-मानसून आउटलुक रिपोर्ट के अनुसार, भारत की FY27 आर्थिक स्थिति पर आने वाले मानसून का बड़ा असर पड़ सकता है। बारिश की चाल महंगाई, GDP ग्रोथ, RBI की नीतियों और मार्केट सेंटीमेंट तय करने में अहम भूमिका निभाएगा।
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रिपोर्ट बताती है कि देश में बढ़ती गर्मी की स्थिति भी चिंता का विषय है। ग्लोबल एयर क्वालिटी प्लेटफॉर्म IQAir के अनुसार 27 अप्रैल 2026 को दुनिया के 50 सबसे गर्म शहरों में सभी भारत में थे। इससे कृषि और आर्थिक स्थिरता के लिए अच्छे मानसून की अहमियत और बढ़ गई है।
हालांकि, वैश्विक अनिश्चितताओं के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था मजबूत बनी हुई है, लेकिन मानसून अब भी घरेलू आर्थिक स्थिरता का सबसे बड़ा आधार है। भारत की करीब 55 प्रतिशत कृषि भूमि अब भी वर्षा पर निर्भर है, इसलिए बारिश का पैटर्न फसल उत्पादन, फूड सप्लाई और ग्रामीण आय पर सीधा असर डालता है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि केवल कुल बारिश ही नहीं, बल्कि उसकी टाइमिंग और राज्यों में डिस्ट्रिब्यूशन भी FY27 में बेहद अहम रहेगा। चावल, दालें, गन्ना, सोयाबीन और तिलहन जैसी फसलों वाले इलाके असमान या देरी से होने वाली बारिश से ज्यादा प्रभावित हो सकते हैं। बुवाई के समय लंबे सूखे का असर उत्पादन और खाद्य उपलब्धता पर पड़ सकता है। जलवायु परिवर्तन के कारण मौसम में अस्थिरता बढ़ रही है, जिससे बारिश की गुणवत्ता और फैलाव का महत्व और बढ़ गया है।
हाल के महीनों में सब्जियों और जरूरी वस्तुओं की कीमतों में पहले ही दबाव देखा जा रहा है। दरअसल, खाने-पीने की वस्तुएं भारत की खुदरा महंगाई सूचकांक (CPI) में करीब 46 प्रतिशत हिस्सेदारी रखते हैं, इसलिए मौसम से जुड़ी कोई भी दिक्कत व्यापक महंगाई बढ़ा सकती है।
ऐतिहासिक रूप से कमजोर मानसून के दौरान सब्जियों, अनाज, दालों और खाद्य तेलों की कीमतों में तेज बढ़ोतरी देखी गई है। इससे ग्रामीण खपत और लोगों की खरीद क्षमता पर असर पड़ता है। रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि अगर मानसून के मुख्य महीनों में बारिश उम्मीद से कम रही, तो FY27 की दूसरी छमाही में महंगाई तेजी से बढ़ सकती है।
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इससे RBI के लिए महंगाई को नियंत्रित करना मुश्किल हो सकता है, खासकर तब जब बाजार ब्याज दरों में नरमी की उम्मीद कर रहा है। रिपोर्ट के अनुसार बढ़ती खाद्य महंगाई RBI को दरों में राहत देने से रोक सकती है और लंबे समय तक तरलता की स्थिति सख्त रह सकती है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि स्थिर मानसून की स्थिति में भारत की GDP वृद्धि दर 6.8 से 6.9 प्रतिशत रह सकती है। हालांकि अगर बारिश कमजोर रही तो वृद्धि दर घटकर करीब 6.5 प्रतिशत तक आ सकती है। इसकी मुख्य वजह ग्रामीण मांग में कमजोरी और कृषि उत्पादन में गिरावट होगी।
FY27 में ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रिकवरी भी मानसून पर निर्भर करेगी। अच्छा मानसून किसानों की आय बढ़ाता है और FMCG, ट्रैक्टर, टू-व्हीलर, उर्वरक, किफायती आवास और माइक्रोफाइनेंस जैसे क्षेत्रों में मांग को समर्थन देता है।
जून से सितंबर के बीच वित्तीय बाजार मानसून की प्रगति पर करीबी नजर रखेंगे। मानसून का असर महंगाई से जुड़े सेक्टर, ग्रामीण खपत वाले शेयर, बॉन्ड यील्ड और RBI की नीतिगत उम्मीदों पर पड़ता है। हालांकि रिपोर्ट में कहा गया है कि ग्रामीण क्षेत्रों से जुड़े सेक्टर बारिश के झटकों से प्रभावित हो सकते हैं, लेकिन इंफ्रास्ट्रक्चर, रक्षा, रेलवे और कैपिटल गुड्स जैसे सरकारी खर्च आधारित सेक्टर अपेक्षाकृत मजबूत रह सकते हैं।
कमजोर मॉनसून की आशंका के बीच केंद्र सरकार इस साल खरीफ फसलों पर अल-नीनो के संभावित असर से निपटने के लिए पूरी तरह तैयार है। इसके लिए कंटिजेंसी प्लान बनाने की तैयारी है। कृषि मंत्रालय उन जिलों की पहचान कर रहा है जहां अल-नीनो का असर पड़ सकता है। ऐसे क्षेत्रों में वैकल्पिक फसलें उगाने और पर्याप्त बीज उपलब्ध कराने की तैयारी की जा रही है।
दो दिवसीय राष्ट्रीय खरीफ सम्मेलन के दौरान गुरुवार (28 मई) को केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा है कि प्रभावित जिलों के लिए विशेष कंटिजेंसी प्लान तैयार किए जाएंगे और जरूरत पड़ने पर फसलों में बदलाव भी किया जाएगा। चिंता करने की नहीं, तैयारी करने की जरूरत है। जहां आवश्यकता होगी वहां वैकल्पिक फसलों की व्यवस्था की जाएगी और बीजों की उपलब्धता सुनिश्चित की जाएगी।
देश के कुछ हिस्सों में खरीफ बुवाई की शुरुआती तैयारी शुरू हो चुकी है। जहां प्री-मानसून बारिश हुई है वहां किसान दलहन, मोटे अनाज और कपास जैसी कम अवधि वाली फसलों की शुरुआती बुवाई की तैयारी कर रहे हैं। सामान्य तौर पर खरीफ बुवाई जून में शुरू होती है और जून-जुलाई में मानसून के साथ तेज होती है।