भारत में UPI का इस्तेमाल करने वाले ज्यादातर लोग अब भी इसे बिल्कुल फ्री रखना चाहते हैं। अगर ट्रांजेक्शन पर कोई चार्ज लगाया गया तो तीन में से करीब दो लोग इसे छोड़ देने की बात कह रहे हैं। लोकलसर्कल्स के एक बड़े सर्वे में ये बात सामने आई है।
सर्वे में शामिल 75 प्रतिशत लोगों ने साफ कहा कि UPI पर कोई भी चार्ज नहीं लगना चाहिए और अगर लगाया गया तो वे इसका इस्तेमाल बंद कर देंगे। सिर्फ 25 प्रतिशत लोग ही चार्ज देने को तैयार दिखे। जो लोग चार्ज देने को तैयार थे, उनमें भी फिक्स्ड फीस, प्रतिशत के आधार पर चार्ज या दोनों के मिक्स मॉडल को लेकर कोई एक राय नहीं बनी।
ये नतीजे 39,000 से ज्यादा जवाबों पर आधारित हैं, जो देश के 376 जिलों के लोगों से लिए गए हैं। ये UPI पर चार्जिंग को लेकर अब तक का सबसे बड़ा कंज्यूमर ओपिनियन सर्वे माना जा रहा है। लोग UPI को इतना पसंद करते हैं कि फ्री होने की वजह से रोजमर्रा के छोटे-बड़े पेमेंट्स के लिए इसे पहली पसंद बनाया है।
UPI अब भारत के डिजिटल पेमेंट्स का सबसे बड़ा प्लेटफॉर्म बन चुका है। वित्त वर्ष 2026 में इसने 240 अरब से ज्यादा ट्रांजेक्शन हैंडल किए, जिनकी कुल वैल्यू 314 ट्रिलियन रुपये के पार चली गई। इतनी भारी-भरकम संख्या में ट्रांजेक्शन होने के बावजूद, सिस्टम को चलाने वाले बैंक और दूसरे खिलाड़ी मुनाफे की तरफ नहीं बढ़ पा रहे।
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बैंकों का कहना है कि UPI पर कोई मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) नहीं है, जिसकी वजह से उन्हें सिर्फ खर्चा उठाना पड़ रहा है। एक्सिस बैंक के MD अमिताभ चौधरी ने पहले कहा था कि बैंक UPI ट्रांजेक्शन से कुछ भी कमाई नहीं कर रहे, जबकि इंफ्रास्ट्रक्चर का खर्च लगातार बढ़ रहा है। लॉन्च हुए दस साल बाद भी इनसेंटिव की कमी और जीरो रेवेन्यू मॉडल की वजह से पूरा इकोसिस्टम दबाव में है।
सर्वे में ये भी पता चला कि 57 प्रतिशत यूजर्स को पिछले एक साल में कम से कम एक बार ऐसा जरूर हुआ जब दुकानदार ने UPI पेमेंट लेने से मना कर दिया और कैश ही मांगा। इनमें से 19 प्रतिशत लोगों के साथ ये समस्या अक्सर होती रहती है। खासकर छोटे व्यापारी इसकी वजह से परेशान नजर आ रहे हैं, क्योंकि उनके लिए फ्री UPI में कोई फायदा नहीं दिख रहा।
UPI शुरू से ही फ्री और आसान ट्रांजेक्शन की वजह से इतनी तेजी से फैला। लेकिन अब जब ट्रांजेक्शन की संख्या आसमान छू रही है, तो इंफ्रास्ट्रक्चर को बनाए रखने और आगे बढ़ाने का खर्च भी बढ़ रहा है। बैंक और पेमेंट कंपनियां कह रही हैं कि बिना किसी रेवेन्यू मॉडल के ये सिस्टम लंबे समय तक टिक नहीं सकता।