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कर व्यवस्था में सुधार पर विचार

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Last Updated- December 12, 2022 | 9:16 AM IST

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण इस बार के बजट में प्रत्यक्ष कर व्यवस्था में और सुधार लाने का विचार कर रही हैं ताकि व्यक्तिगत करदाताओं और कारोबारियों के लिए कर कानूनों का पालन करना आसान हो जाए। मौजूदा व्यवस्था में कर अधिकरी कानूनों की अलग-अलग तरह से व्याख्या करते हैं। इससे कर विवाद पैदा होता है और अक्सर सरकार को राजस्व गंवाना पड़ता है।
पिछले कुछ साल में प्रत्यक्ष कर और सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का अनुपात 5 से 6 फीसदी के दायरे में रहा है। चालू वित्त वर्ष की पहली छमाही में तो यह अनुपात गिरकर 3.7 फीसदी ही रह गया मगर पूरे साल के दौरान इसमें कुछ सुधार होने की उम्मीद है। पिछले साल अगस्त से सरकार पूरे देश में मानवीय हस्तक्षेप के बगैर आयकर रिटर्न के आकलन की व्यवस्था शुरू कर चुकी है। फिर भी कुछ समस्याएं हैं, जिनसे करदाताओं को जूझना ही पड़ता है। कर विशेषज्ञों को वर्तमान व्यवस्था में सबसे बड़ी खामी यह लगती है कि अधिकारी कर कानूनों और नियमों की अलग-अलग तरह से व्याख्या करते हैं और उनकी कोई निश्चित व्याख्या नहीं है।
केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (सीबीडीटी) के पूर्व सदस्य अखिलेश रंजन ने कहा कि कर को लेकर निश्चितता अहम मुद्दा है, जिससे कारगर ढंग से निपटना होगा। उन्होंने कहा, ‘हमने मुकदमों से निपटने के लिए विवाद से विश्वास जैसी तमाम योजनाएं पेश की हैं मगर सबसे अच्छा तरीका तो यह है कि मुकदमे होने की नहीं दो। इसमें मध्यस्थता की व्यवस्था होनी चाजिए, जो बाध्यकारी या अनिवार्य नहीं हो। अंतिम आकलन से पहले करदाता चाहें तो इसे स्वीकार करें और चाहें तो मना कर दें। इससे कारोबार को काफी मदद मिलेगी।’
अखिलेश रंजन 2019 में वित्त मंत्री को अपनी रिपोर्ट सौंपने वाले प्रत्यक्ष कर कार्यबल के अध्यक्ष भी थे। रिपोर्ट अभी सार्वजनिक नहीं की गई है मगर माना जाता है कि इसमें मध्यस्थता व्यवस्था का पूरा ब्योरा दिया गया है। उन्होंने कहा कि इस व्यवस्था में मध्यस्थ फैसला नहीं करेंगे बल्कि दोनों पक्षों को बातचीत के लिए एक साथ लाएंगे। कई विवाद ऐसे भी हैं, जहां करदाता या कर अधिकारी बेमतलब उलझ जाते हैं। इस व्यवस्था में उन्हें सही तस्वीर दिखाई जा सकती है।
रंजन ने कहा कि कर को लेकर निश्चितता अर्थव्यवस्था के डिजिटलीकरण की परियोजना का हिस्सा है और दुनिया भर में इस पर चर्चा हो रही है। उन्होंने कहा, ‘पिछले कुछ समय में भारत में ऐसा बहुत कुछ हुआ है, जो भरोसा नहीं जगाता। मसलन वोडाफोन मामले में याचिका दाखिल करना। इसी तरह ई-कॉमर्स सौदों पर इक्विलाइजेशन शुल्क के दायरे को बढ़ाने का प्रस्ताव बजट में नहीं था और इस पर सफाई भी नहीं दी गई है। इसलिए अभी काफी अनिश्यिचतता है।’ उन्होंने कहा कि निश्चितता बढ़ाने के लिए मुकदमे होने ही नहीं देने चाहिए और निवेशकों को स्थिर कर नीति का भरोसा दिलाना चाहिए। एकेएम ग्लोबल में पार्टनर अमित माहेश्वरी ने कहा कि आयकर विभाग द्वारा आकलन जोखिम पर आधारित होना चाहिए। उदाहरण के लिए विभाग 15 करोड़ रुपये से अधिक के प्रत्येक ट्रांसफर प्राइसिंग सौदे का आकलन करता है। लेकिन इसे जोखिम पर आधारित होना चाहिए। आकलन उन क्षेत्रों में किया जाना चाहिए, जहां कर चोरी का खतरा दूसरे क्षेत्रों के मुकाबले ज्यादा होता है जैसे रियल एस्टेट। माहेश्वरी ने कहा कि इससे कम अधिकारी तैनात करने होंगे और वसूली ज्यादा होगी। साथ ही आकलन के नतीजों के हिसाब से कर अधिकारियों की जवाबदेही भी तय की जानी चाहिए।
एक विशेषज्ञ ने बताया कि एक मामले में उन्होंने कर अधिकारी से पूछा कि 100 करोड़ की अतिरिक्त कर मांग क्यों की गई है? तो उसने कहा कि थोड़ी मांग तो करनी ही थी और अंत में 3 करोड़ रुपये पर वह राजी हो गया। उन्होंने कहा कि ऐसा रवैया अदालत में सही नहीं कहा जा सकता।
इसी तरह आयकर छापे या तलाशी के दौरान भी आय बढ़ा-चढ़ाकर दिखा दी जाती है। संसद के पिछले सत्र में पेश नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक की एक रिपोर्ट में पाया गया कि 2018-19 में तलाशी के दौरान 19,108.30 करोड़ रुपये की अघोषित आय पाए जाने का दावा अपील किए जाने पर टिक ही नहीं पाया।
डेलॉयट में पार्टनर नीरू आहूजा ने कहा, ‘हमें क्षमता निर्माण, प्रशिक्षण और कर प्रशासन में अन्य सुधार लाने की जरूरत है ताकि कर प्रक्रिया और सेवाओं को ज्यादा तेज और सुगम बनाया जा सके।’
रंजन ने कहा कि एडवांस रूलिंग और एडवांस प्राइसिंग समझौता व्यवस्था को श्रमबल में इजाफा करके मजबूत बनाना चाहिए।

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First Published - January 25, 2021 | 11:12 PM IST

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