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दवा क्षेत्र को रुपये की गिरावट से लाभ होने वाला है। भारत हर साल 30 अरब डॉलर से अधिक मूल्य की दवाओं और फार्मास्युटिकल उत्पादों का निर्यात करता है और जेनेरिक दवाओं का शीर्ष आपूर्तिकर्ता है। हालांकि फॉर्मूलेशन बनाने के लिए भारत अपनी बल्क ड्रग या एक्टिव फार्मास्यूटिकल इंग्रेडिएंट (एपीआई) का लगभग 60-70 प्रतिशत आयात भी करता है।
कैपिटलाइन के आंकड़ों से पता चलता है कि सन फार्मास्यूटिकल इंडस्ट्रीज (197 करोड़ डॉलर), डॉ रेड्डीज लैबोरेटरीज (186.5 करोड़ डॉलर) और जाइडस लाइफसाइंसेज (123.8 अरब डॉलर) जैसी कंपनियों को उनके फायदे का बड़ा हिस्सा निर्यात से मिला है।
उद्योग के एक आंतरिक व्यक्ति ने नाम सार्वजनिक न करने की इच्छा जताते हुए कहा कि रुपये में 5 प्रतिशत गिरावट के कारण प्रमुख निर्यातकों को 7 से 8 प्रतिशत वृद्धि की उम्मीद है। हालांकि बढ़ते इनपुट लागत के कारण निर्यात से होने वाला लाभ बेअसर हो जाएगा। भारत हर साल करीब 10 अरब डॉलर के एपीआई और इंटरमीडिएटरीज का आयात करता है और इस पर मुद्रा अवमूल्यन का असर पड़ेगा।
एक फॉर्मा एसोसिएशन के प्रमुख ने कहा, ‘अमेरिका या अन्य विनियमित बाजारों में निर्यात के मामले में ज्यादातर कंपनियां अपने एपीआई का उत्पादन करती हैं। इसके बावजूद कुछ केमिकल इंटरमीडिएटरीज का आयात होता है। बहरहाल भारत की दवा फर्में सस्ते और कॉमन एपीआई का आयात करती हैं, लेकिन इसका असर पड़ेगा।’